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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1234

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३३

जैसे, कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ, सकोरा बनाओ, मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये, उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी, मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है, भगवत्कृपा उसको अपने-आप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है, अपना बल मानता है, उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण, विचित्र, अखण्ड, अटूट कृपा आती है, अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।

जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं; परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है, वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया-(संसार-) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मते-मरते रहते हैं; परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं, वे मायाको तर जाते हैं—‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ’ (गीता ७।१४)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है; परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है, तभी तो वे कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज। ’ जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायामें फँस जाते हैं।

जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं;* परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है, उस कीलके आस-पास रहनेवाले दाने ज्यों-के-त्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्म-मरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सब-के-सब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं; परन्तु जिसके आधारपर संसार-चक्र चलता है, उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है—‘कोई हरिजन ऊबरे, कील माकड़ी

पास। ’ परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता; क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है, वही जन्म-मरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।

संसार और भगवान्—इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है, गुलाम बनाता है, पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है, चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिक!

किसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है, यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, त्याग, वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता, दासता ही है। जैसे, कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई, खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है, पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।

संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है, उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं, पद-दलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है, उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं, प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता, विलक्षणता, विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें, तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती, अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसी-किसीमें यहाँतक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जड़ताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये, अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें

  • चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। दो पाटनमें

आयके साबूत बचा न कोय।