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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1231

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

(५) परीक्षा न करना —भगवान् के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसे-ऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसे-ऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान् के शरण कहाँ हुआ?' प्रत्युत 'अद्वैष्टा ' आदि (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी!* ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी, मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वैष्टा आदि गुण जितने कम थे, उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं, वे सब बिना प्रयत्न किये आते हैं।

(६) विपरीत धारणा न करना —भगवान् के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है कि 'मैं भगवान् का नहीं हूँ'; क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान् का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है, वह अटूट है, अखण्ड है, नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया, यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी, तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती है?

जो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिकी स्वीकार कर लेता है, उसमें भय, शोक, चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है; जैसे—

  • इसे समझनेके लिये एक ग्रामीण कहानी है। एक माँके तीन लड़के थे। दो लड़के बड़े थे और काम-धंधा करते थे। तीसरा लड़का सीधा-सादा और भोला था। उनकी माँ मर गयी। दोनों बड़े भाइयोंने छोटे भाईसे कहा कि माँके फूल (अस्थियाँ) गंगाजीमें डाल दे, इतना काम तू कर दे। उसने कहा—'बहुत ठीक है।' वह माँके फूल लेकर अपने घरसे चला। घरसे गंगाजी ३०० कोस दूर थीं। पैदल रास्ता चलते-चलते वह थक गया तो किसीसे पूछा—'भैया! गंगाजी कितनी दूर हैं?' वह बोला—'तुम तो १५० कोस आये हो, अभी १५० कोस गंगाजी और आगे हैं। उसने सोचा कि गंगाजी कब पहुँचूँगा और फिर लौटकर कब आऊँगा! ऐसे दुःखी होकर उसने वे हड्डियाँ जंगलमें ही फेंक दीं और गाँवके पाससे वर्षाका मीठा जल बर्तनमें भर लिया; क्योंकि गंगाजी जाते हैं तो लौटते समय गंगाजल लाते हैं। फिर वह वहाँसे पीछे चला आया और अपने गाँव पहुँच गया। बड़े भाई सोचने लगे कि अगर यह गंगाजी जाकर आता तो इतने दिनोंमें नहीं आ सकता था, यह गंगाजी गया ही नहीं। बड़े भाइयोंने उससे पूछा—'तू गंगाजी जाकर आया है क्या? उसने कहा—हां, गंगाजी जाकर आया हूँ; ठीक गंगाजीके ब्रह्मकुण्डमें फूल डालकर वहाँसे गंगाजीका यह जल लाया हूँ। ऐसे वह झूठ बोल गया। भाइयोंने समझ लिया कि यह ठीक नहीं बोल रहा है, इसलिये वे चुप हो गये।

दूसरे दिन नींदसे उठकर एक भाई छोटे भाईसे बोला—'अरे भाई! तू सच्ची बात बता दे, क्या तू गंगाजी हो आया और फूल ठीक गंगाजीमें डाल दिये। उसने कहा—हां, बिलकुल गंगाजी जाकर आया हूँ। बड़े भाईने कहा—'देख, रातको स्वप्नमें मेरेको माँ मिली थीं और मॉने मेरेसे कहा कि इसने तो मेरेको गंगाजी पहुँचाया ही नहीं, बीचमें ही डालकर आ गया। अब तू ही बता कि माँकी बात सच्ची या तेरी बात सच्ची? छोटा भाई बोला—'माँ इधर ही क्यों आयी, उधर क्यों नहीं गयी? अर्थात् १५० कोस तो मैंने पहुँचा ही दिया था, यहाँ न आकर उधर ही चली जाती तो ठीक गंगाजी पहुँच जाती।

इस कहानीका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् के शरण होनेके बाद यह कसौटी कसते हैं—'परीक्षा करते हैं कि 'भक्तोंके, सन्तोके लक्षण मेरेमें नहीं आये तो मैं भगवान् के शरण नहीं हुआ'—यह माँ उलटी क्यों आयी, सुलटी ही क्यों नहीं गयी कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया तो अब इन लक्षणोंकी कमी क्यों रह गयी? मेरेमें ये लक्षण क्यों नहीं आये?' ऐसी मान्यतासे तो साधक शरणागत हो जायगा और पूर्णता भी हो जायगी। परन्तु यह मान्यता करेगा कि 'मेरेमें ऐसे लक्षण नहीं आये तो मैं शरण नहीं हुआ' तो धोखा हो जायगा!

विवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्ध-विच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादी-परदादी बन जाती है, तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्घण्डता करती है, खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है, तब भगवान् के ही अंश इस प्राणीका भगवान् के साथ जो नित्य सम्बन्ध है, वह दृढ़ हो जाय—इसमें आश्चर्य ही क्या है! वास्तवमें भगवान् के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धोंका त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।

सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव, आचरण आदिकी किंचित् कमी रह जाय, कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किंचित् कोई दुष्कर्म हो जाय, तो उसके हृदयमें जलन पैदा