सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1230, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1230

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२९

भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं; क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है, उनका स्वरूप है। अतः भगवान् के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है? प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है, पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है; क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान् का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है, पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं है।

(२) निःशोक होना —जो बात बीत चुकी है, उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है; क्योंकि जो हुआ है, वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है, वह ठीक-ठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है, फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है। प्रभुके इस मंगलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है; शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।

(३) निश्चिन्त होना —जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान् के समर्पित कर देता है, तब उसको लौकिक-पारलौकिक किंचिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कहाँ रहना होगा? मेरी क्या दशा होगी? क्या गति होगी? आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं।

भगवान् के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि 'अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी? अर्थात् नहीं आयी; क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं।' वास्तवमें 'मेरी वृत्तियाँ हैं' ऐसा मानना ही दोष है, वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिमें जो मेरापन है—यही गलती है; क्योंकि जब मैं भगवान् के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया, तो फिर मन, बुद्धि आदि मेरे कहाँ रहे? इसलिये शरणागतको मन, बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं

हैं—ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसे 'हे मेरे नाथ! हे मेरे प्रभो! बचाओ! बचाओ!! बचाओ!!!' ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये; क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं, मेरे सर्वसमर्थ प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ? और भगवान्ने भी कह दिया है कि 'तू चिन्ता मत कर' (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान् के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे—'हे नाथ! यह सब आपके हाथकी बात है, आप जानें।'

सर्वसमर्थ प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें—ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं; क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी? और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी? इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब भगवान् यह कहते हैं कि 'मैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा', तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा? मैं तो बस, आपका हूँ। हे भगवान्! मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ! शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि—ये कभी मेरे दीखें ही नहीं। परन्तु हे नाथ! सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभी-कभी मेरे दीख जाते हैं; अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये—ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।

(४) निःशंक होना —भगवान् के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान् का हुआ या नहीं? भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं? प्रत्युत इस बातको देखे कि 'मैं तो अनादिकालसे भगवान् का ही था, भगवान् का ही हूँ और आगे भी सदा भगवान् का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग—विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ, तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ?' क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है—'मम एव अंशः ' (गीता १५।७)। इस प्रकार 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शंकाएँ—सन्देह मिट जाते हैं, शंकाओं—सन्देहोंके लिये किंचिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।

१-(१) राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करे अन्यथा अस नहिं कोई॥ (मानस १।१२८।१)

(२) होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावे साखा॥ (मानस १।५२।४)

२-चिन्ता दीनदयालको, मो मन सदा अनन्द। जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोविन्द॥