सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1229, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1229

१२२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

(४) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोक-परलोक, सद्गत-दुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है—

दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।

अवधीरितशरदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥

‘हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें, चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें, वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें, वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद्-ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्यु-जैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ; आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।’

शरणागति-सम्बन्धी विशेष बात

शरणागत भक्त ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है, स्वीकार कर लेता है तो उसके भय, शोक, चिन्ता, शंका आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखातापर ही टिके रहते हैं।

भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं, जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।

सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है? भय, शोक, चिन्ता, शंका, परीक्षा और विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।

(१) निर्भय होना —आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे

भय पैदा होता है और साँप, बिच्छू, बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं, पतंजलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है और जो बड़े-बड़े विद्वानोंको भी होता है, वह भय भी सर्वथा मिट जाता है।

अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी!—ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये; क्योंकि ‘मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ, अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका; क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है—‘ममता मल जरि जाड् ’ (मानस ७।११७ क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका? अब तो केवल भगवान्की कृपा-ही-कृपा है! भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है! यह बड़ी खुशीकी, बड़ी प्रसन्नताकी बात है।’

कई ऐसी शंका करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त—ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है—‘द्वितीयद्वै भयं भवति ’ (बृहदारण्यक १।४।२)। पर यह शंका निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है, पर आत्मीयसे भय नहीं होता अर्थात् भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर-संसार द्वितीय है, इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है; क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्न-भिन्न है; जैसे एक जड़ है और एक चेतन, एक विकारी है और एक निर्विकारी, एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील, एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक, इत्यादि।

१-भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर जब संसार-शरीरका आश्रय सर्वथा नहीं रहता, तब जीनेकी आशा, मरनेका भय, करनेका राग और पानेका लालच—ये चारों ही नहीं रहते।

२-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (योगदर्शन २।३)

३-स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः। (योगदर्शन २।९)

४-तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धम् प्रभो॥

(श्रीमद्भा १०।२।२३३)

‘भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकते।’