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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है, तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायेंगे, भगवान्के अपने हो जायेंगे। पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी* अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले, वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है, उसे तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है, उस मैयाको भगवान् क्या दें? तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये, उन्हें अपने-आपको ही दे दिया! मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने लग जाते हैं! कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्ने मुक्ति चाहता है, उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं, पर जो कुछ भी नहीं चाहता, उसे भगवान् अपने-आपको ही दे देते हैं।

सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है, इन्द्रियाँ वशमें हैं, मन शुद्ध-निर्मल है, बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं, हम पढ़े-लिखे हैं, हम यशस्वी हैं, हमारा संसारमें मान है—इस प्रकार ‘हम भी कुछ हैं’ ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये; हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये; हमारा मन ऐसा होना चाहिये; हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये; हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये; हमारे जीवनमें ऐसे-ऐसे लक्षण आने चाहिये; हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये; हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथा-कीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगे, कण्ठ गद्गद हो जाय; पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए? आदि-आदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण

हो जाता है, वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है? मन चंचल है कि स्थिर है? बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है? अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है? योग्यता है कि अयोग्यता है? आदि। इस सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ा-करकट हैं, जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया, पर भक्तोंके गुण (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराश हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैर-विरोध करें, चाहे द्वेष करें, चाहे ममता करें, चाहे जो कुछ करें? यह अर्थ बिल्कुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सब-के-सब गुण अपने-आप ही आयेंगे, पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।

सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं, तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं।

प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया? भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया? उसपर दुःख क्यों आ गया? उसका बेटा क्यों मर गया? उसका धन क्यों चला गया? उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया? उसका निरादर क्यों हो गया? आदि-आदि। ऐसी कसौटी

  • (१) अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिधांसयापाययदप्यासन्धी। लेभे गतिं धान्युचित्तां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं ब्रजेम॥

(श्रीमद्भा० ३। २। २३)

‘अहो! इस पापिनी पूतनाने जिन्हें मार डालनेकी इच्छासे गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उनके अलावा अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायें?’

(२) गई मारन पूतना कुछ कालकूट लगाई। मातुकी गति दर्द ताहि कृपालु जादवराइ॥ (विनय-पत्रिका २१४। २)