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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1240

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३१

लगाना बिलकुल फालतू बात है, बड़े नीचे दर्जेंकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझाये। वे सत्संगके नजदीक ही नहीं आये, इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है? शरणागति क्या होती है? वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है, उसका संसारमें अपमान होता ही है, उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दा-प्रशंसा, रोग-निरोग-अवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं, बस। अब संसारमें क्या है, क्या नहीं है, त्रिलोकोंमें क्या है, क्या नहीं है, प्रभु ऐसे हैं, वे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं—इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।

किसीने एक सन्तसे पूछा—‘आप किस भगवान्के भक्त हैं? जो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करते हैं, उनके भक्त हैं क्या?’ तो उस सन्तने उत्तर दिया—‘हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका एक ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है।’ शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।

ऋषिकेशमें गंगाजीके किनारे शामको सत्संग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गंगाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा—‘कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है!’ पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा—‘हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया? यह ठण्डी हवा आयी, यह गरम हवा आयी—इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया?’ भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डी आयी या गरम आयी, सुख आया या दुःख आया—इस तरफ जबतक खयाल है, तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ? इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेंकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।

एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटी-छोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है

यह! इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया! वह वहाँ बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी, तब मौलवीने उसको धमकाया कि ‘कैसी बेअक्ल हो तुम! हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे, नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयीं!’ तब वह बोली—

मैं नर-राची ना लखी, तुम कस लख्यो सुजान।

पढ़ि कुरान बीरा भया, राच्यो नहीं रहमान॥

अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है, पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था, फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी? तू केवल कुरान पढ़-पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता? कौन आया, कैसे आया, मनुष्य था कि पशु-पक्षी था, क्या था, क्या नहीं था, कौन ऊपर आया, कौन नीचे आया, किसने पैर रखा—इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता? तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय? दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे? जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है, तबतक वह शरण कहाँ हुआ?

कौरव-पाण्डव जब बालक थे, तब वे अस्त्र-शस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये, तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एक-एक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलग-अलग पूछते कि बताओ, तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है? कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है, कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है, कोई कहता कि हमें तो चिड़िया दीखती है, चौंच भी दीखती है, पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी, तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है, तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है, और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ वेध दिया; क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है, वृक्ष, टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है? अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा, जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है, तबतक