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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 1237

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

द्रेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह गये! भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा है— नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः।

(नारदभक्तिसूत्र ७२)

‘उन भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदिका भेद नहीं है।’

तात्पर्य यह है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति, विद्या आदि भेद हो सकते हैं, वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं— ‘यत्तत्तदीयाः’ (नारदभक्तिसूत्र ७३), संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वे ‘अच्युत गोत्र’ के ही कहलाते हैं।

शरणागतिका रहस्य

शरणागतिका रहस्य क्या है—इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे

समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं, इसलिये ऐसी बातको कहने-सुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।

भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं—

(१) ‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) ‘अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा।’

(२) ‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ’ (१५।१९) ‘वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है’, ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ’ (१८।६२) ‘तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।’

हम भगवान्के शरण कैसे हो जायें? केवल एक भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् भगवान्के गुण, ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।

केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं, प्रभाव हैं, तत्त्व हैं, रहस्य हैं, महिमा हैं, लीलाएँ हैं, नाम हैं, धाम हैं; भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है, माधुर्य है, सौन्दर्य है—इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है कि ‘मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं।’ अगर वह गुण, प्रभाव आदिकी तरफ देखकर

मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, ब्रजकी गोपियाँ, यज्ञपतियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं।

उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना ही की थी। इसी प्रकार उन्होंने कुछचूडामन्त्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संग—मेरे सम्बन्धके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये।

१-(१) पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनाश्चाम्नादयः। न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम्॥ (अध्यात्म०, अरण्य० १०।२०)

‘मेरे भजनमें पुरुष-स्त्रीका भेद अथवा जाति, नाम और आश्रम कारण नहीं है, प्रत्युत मेरी भक्ति ही एकमात्र कारण है।’

(२) किं जन्मना सकलवर्णजोन्मतेन किं विद्यया सकलशास्त्रविचारवत्या।

यस्यास्ति चेत्सि सदा परमेशभक्तिः कोऽन्यततस्त्रिभुवने पुरुषोऽस्ति धन्यः॥ (ब्र० सं० भ० १७)

‘सम्पूर्ण वर्णोंमें उत्तम वर्ण (ब्राह्मण-कुल)-में जन्म होनेसे क्या हुआ? सम्पूर्ण शास्त्रोंके गहरे अध्ययनसे क्या हुआ? अर्थात् कुछ नहीं हुआ जिसके हृदयमें भगवान्की भक्ति विराजमान है, इस त्रिलोकीमें उसके समान दूसरा कौन मनुष्य धन्य हो सकता है?’

(३) व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषम्।

कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः॥

(पद्मावली ८)

‘व्याधका कौन-सा श्रेष्ठ आचरण था? ध्रुवकी कौन-सी बड़ी उम्र थी? गजेन्द्रके पास कौन-सी विद्या थी? विदुरकी कौन-सी ऊँची जाति थी? यदुपति उग्रसेनका कौन-सा पराक्रम था? कुब्जाका कौन-सा सुन्दर रूप था? सुदामाके पास कौन-सा धन था? फिर भी उन लोगोंको भगवान्की प्राप्ति हो गयी। कारण कि भगवान्को केवल भक्ति ही प्यारी है। वे केवल भक्तिये ही सन्तुष्ट होते हैं, आचरण, विद्या आदि गुणोंसे नहीं।

१-पितृगोत्री यथा कन्या स्वामिगोत्रेण गोत्रिका। श्रीरामभक्तिमात्रेणाच्युतगोत्रेण गोत्रकः॥ (नारदपंचरात्र)