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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1236, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1236

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३५

एक बार एक प्रज्ञाचशु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारे-किनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमें गिर पड़े। हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं, अब तैरें तो किधर तैरें? भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चल पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है, उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय, उसीमें वह प्रसन्न रहता है।

बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरते-चरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामेंसे निकलनेमें बहुत देर लगी, तबतक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गलीली जमीनपर सिंहका एक चरण-चिह्न अंकित था। वह उस चरण-चिह्नके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया कि 'पहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ, तब मुझे खाना!' वे चिह्नको देखकर कहने लगे—'अरे, यह तो सिंहके चरण-चिह्नके शरण है, जल्दी भागो यहाँसे! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।' इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें

जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला—'तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है?' बकरीने कहा—'यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ।' सिंहने देखा कि 'ओह! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई।' सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो।

रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा—'तू इस बकरीको अपनी पीठपर चढ़ा ले। इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ? मार डालूंगा।' सिंहकी बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सँडुसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठे-बैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती।

खोज पकड़ सेंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय।

ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है, उनके चरणोंका सहारा ले लेता है, तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे, विघ्न-बाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

जो जाको शरणो गहै, ताकहैं ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज।

भगवान्के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है*। तात्पर्य यह हुआ कि काम, भय,

  • (१) कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः॥ गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्वादयो नृपाः। सम्बन्धाद् वृण्वयः स्नेहाद् यूर्यं भक्त्या वर्यं विभो॥

( श्रीमद्भागवतम् ७।१।२९-३० )

'एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप शोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिये। जैसे गोपियोंने कामसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगों- (युधिष्ठिर आदि- ) ने स्नेहसे और हमलोगों- (नारद आदि- ) ने भक्तिये अपने मनको भगवान्में लगाया है।'

(२) सत्संगेन हि दैतैया यातुधाना मृगाः खगाः। गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चाराणगृह्यकाः॥ विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्यजाः। रजस्तमः प्रकृतयस्तस्मिन्तस्मिन् युगेऽन्य॥ बहवो मत्पदं प्राप्तास्तत्त्व्याष्टकायाधवादयः। वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः॥ सुग्रीवो हनुमान्शुक्रो गजो गृध्रो वणिक्मथः। व्याधः कुब्जा ब्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे॥ ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहतमाः। अत्रातपतपसः सत्संगान्मायुपाताः॥

( श्रीमद्भागवतम् ११।१२।३-७ )

भगवान् कहते हैं—'निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संग अर्थात् मेरे सम्बन्धद्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गृह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है।'