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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

११११

पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूत-अवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है—‘स योगी

ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ’, ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूत-अवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है।

परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, जो अपने मतका आग्रह नहीं रखता, मुक्ति अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदको ही सर्वोपरि नहीं मानता और भक्तिका खण्डन, निन्दा नहीं करता, उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। अतः उसको मुक्ति प्राप्त होनेके बाद भक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति हो जाती है।

जो अपनी दृष्टिसे अर्थात् अपनी मान्यतासे ब्रह्मरूप बना हुआ है, ब्रह्म हुआ नहीं है, उसके लिये यहाँ ‘ब्रह्मभूतः ’ पद आया है। ब्रह्मभूत होनेके बाद जीवका ब्रह्मके साथ तात्त्विक सम्बन्ध (साधर्म्य) हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागताः ’ (गीता १४।२)। तात्त्विक सम्बन्ध होना ही मुक्ति है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मामें अपने-आपको विलीन (समर्पित) कर देनेसे परमात्माके साथ आत्मीय सम्बन्ध (अभिन्मता) हो जाता है—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ’ (गीता ७।१८)। आत्मीय सम्बन्ध होना ही पराभक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति है।

ज्ञानमार्गमें जड़ताका त्याग मुख्य है। जड़ताका त्याग विवेकसाध्य है। विवेकपूर्वक जड़ताका त्याग करनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार शेष रह सकता है, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति होनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार नहीं रहता; क्योंकि भक्त त्याग नहीं करता, प्रत्युत सबको भगवान्का स्वरूप मानता है—‘सदसच्चाहम् ’ (गीता १।१९)। प्रेमकी प्राप्ति विवेकसाध्य नहीं है, प्रत्युत विश्वाससाध्य है। विश्वासमें केवल भगवत्कृपापर ही भरोसा है। इसलिये जिसके भीतर भक्तिके संस्कार होते हैं, उसको भगवत्कृपा मुक्तिमें सन्तुष्ट नहीं होने देती, प्रत्युत मुक्तिके रस (अखण्डरस)-को फीका करके प्रेमका रस (अनन्तरस) प्रदान कर देती है।

संसारके सम्बन्धसे अशान्ति होती है, इसलिये कर्मयोगमें संसारसे सम्बन्ध छूटनेपर ‘शान्त आनन्द’ मिलता है। ज्ञानयोगमें निजस्वरूपमें स्थिति होनेसे निजानन्द अर्थात् ‘अखण्ड आनन्द’ मिलता है। भक्तियोगमें भगवान्से अभिन्मता होनेपर परमानन्द अर्थात् ‘अनन्त आनन्द’ (प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम) मिलता है।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥

भक्त्या= (उस) पराभक्तिसेअस्मि= हूँ—(इसको)तत्त्वतः= तत्त्वसे
माम्= मुझे,तत्त्वतः= तत्त्वसेज्ञात्वा= जानकर
यावान्= (मैं) जितना हूँअभिजानाति= जान लेता है,तदनन्तरम्= तत्काल
= औरततः= फिरविशते= (मुझमें) प्रविष्ट हो
यः= जोमाम्= मुझेजाता है।

व्याख्या —‘भक्त्या मामभिजानाति ’—जब परमात्-तत्त्वमें आकर्षण, अनुराग हो जाता है, तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है, उस तत्त्वसे अभिन्म हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है। ब्रह्मभूत-अवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो

सर्वथा त्याग हो जाता है, पर ‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं शान्त हूँ, मैं निर्वाकार हूँ’, ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है, तबतक परिच्छिन्मता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति ‘पर’ है; इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे, पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है*। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।

  • प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥ (मानस ७।४१।३)

१२००

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

‘यावान्’—सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको ‘समग्र’-रूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है, जिसको मेरा ही आश्रय है, वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है, उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरा-मरणसे मुक्ति पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुण-विषयको जान लेते हैं और अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुण-विषयको जान लेते हैं।

इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम, कृष्ण, शिव, गणेश, शक्ति, सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं, उनको भी जान लेना—यही पराभक्तिये ‘यावान्’ अर्थात् समग्ररूपको जानना है।

‘यश्चास्मि तत्त्वतः’—वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें, अनेक शक्तियोंको साथ लेकर, अनेक कार्य करनेके लिये बार-बार प्रकट होते हैं, और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनी-अपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ—इसे तत्त्वसे जान लेता है।

‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’—ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल’ मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था, वह सर्वथा मिट जाता है।

तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था, वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।

विशेष बात

जीवका परमात्मामें प्रेम (रति, प्रीति या आकर्षण)

स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना, स्मृहा, कामना, आशा, तुष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।

इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है, वह क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं, नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं, पर ‘कुछ मिलेगा’—इस भ्रम, वासनाके कारण यह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।

गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं—कर्मयोग, ज्ञान-योग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको ‘कर्तव्यरति’ कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्यमें होती है—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः’ (१८।४५)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ और तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं, उसकी यह रति भगवद्व्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको ‘आत्मरति’ कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है—‘योऽन्तःसुखोऽन्तरागमः’ (५।२४)। और भक्ति-योगमें उसी प्रेमको ‘भगवद्व्रति’ कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है—‘तुष्यन्ति च रमन्ति च’ (१०।१९)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें ‘भगवद्व्रति’ की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।

तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी—इन तीनोंसे भी योगी

१-जानने और प्राप्त करनेमें काल-भेद नहीं होता।

२-भगवान्में रति या प्रियता प्रकट होती है—अपनेपनसे। परमात्माके साथ जीवका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। अपनी चीज स्वतः प्रिय लगती है। अतः अपनापन प्रकट होते ही भगवान् स्वतः प्यारे लगते हैं। प्रियतामें कभी समाप्त न होनेवाला अलौकिक, विलक्षण आनन्द है। वह आनन्द प्राप्त होनेपर मनुष्यमें स्वतः निर्विकारता आ जाती है। फिर काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर आदि कोई भी विकार पैदा हो ही नहीं सकता। पारमार्थिक आनन्द न मिलनेसे ही कामादि विकार पैदा होते हैं अर्थात् आनन्द न मिलनेसे नाशवान् वस्तुओंसे सुख लेनेकी इच्छा होती है, जिससे सब विकार पैदा होते हैं।

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंके साथ अपनापन करनेसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है। विमुखता होनेपर भी भगवान्की प्रियता कभी मिट नहीं सकती। नास्तिक-से-नास्तिक भी आफत पड़नेपर पुकार उठता है कि कोई ईश्वर है तो रक्षा करे!

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०१

(समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता—छठे अध्यायका छिथालीसवों श्लोक)। तात्पर्य यह है कि जड़तासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर, बहुत-से शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञान-सम्पादन करनेपर और यज्ञ, दान, तीर्थ आदिके बड़े-बड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब अनित्य ही होता है, पर योगीको नित्य-तत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी—इन तीनोंसे ‘योगी’ श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, हठयोगी, लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने ‘भक्तियोगी’ को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवों श्लोक)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ ‘यावान्’ पदसे हुआ है।

इस प्रकरणके आरम्भमें ‘अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है’—यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूत-अवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि दृढ़ होते थे, वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है—‘विशते तदनन्तरम्।’

१-गीतामें ‘यावान्’ को ही ‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९) कहा है। उसी तत्त्वको सत्-असत्, परा-अपरा, पुरुष-प्रकृति, क्षेत्रज्ञ-क्षेत्र आदि दो रूपोंमें बताया है और उसी तत्त्वको सत्-असत्से पर भी बताया है—‘त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)। उस तत्त्वको गीतामें तीन रूपोंसे भी बताया है—अपरा, परा और अहम् (७।५-६), क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और माम् (१३।१-२) एवं क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (१५।१६-१७)। इन तीनोंके (आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके पूछनेपर) भगवान्ने छः भेद बताये हैं—‘अपरा’—क्रिया और पदार्थ, ‘परा’—सामान्य जीव और कारक पुरुष, एवं ‘अहम्’—निर्गुण और सगुण।

इन छः भेदोंको दृष्टान्तके रूपमें इस तरह समझें—जल-तत्त्व एक होनेपर भी उसके छः भेद हैं; उसमें परमाणुरूपसे जल निर्गुण ब्रह्म है, भायरूपसे जल सगुण परमात्मा है, बादलरूपसे जल कारक पुरुष (ब्रह्म) है, बूँदोंके रूपसे जल सामान्य जीव है, वर्षारूपसे जल सृष्टि-रचनारूप क्रिया है, और बर्फरूपसे जल (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदि) पदार्थ है।

२-गुणरहित कामनारहित प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतमनुभवरूपम्। (नारदभक्तिसूत्र ५४) यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।

अनन्यभक्तिके तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है, उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है, पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेक-प्रधान रही है, इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती; अतः कमी माननी नहीं चाहिये।

यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिवर्चनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है, न जाननेकी जिज्ञासा रहती है, न जीनेकी आशा रहती है, न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।

जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता, तबतक ब्रह्मभूत-अवस्थामें भी ‘मैं ब्रह्म हूँ’ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है, तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु ‘मैं ब्रह्म हूँ’ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्म-मरणका कारण नहीं बनता, जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका संग नहीं होता; क्योंकि गुणोंका संग होनेसे ही बन्धन होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)। उदाहरणार्थ—गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि ‘मैं हूँ।’ ऐसा अनुभव होते ही जब नाम, रूप, देश, काल, जाति आदिके साथ

१२०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

स्वर्यका सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब 'मैं हूँ' यह अहंभाव शुभ-अशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है, जिससे जन्म-मरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जोंका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूत-अवस्था रहती है, उसके सात्त्विक ज्ञान (इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)-में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल 'मैं ब्रह्म हूँ' अथवा 'सब कुछ एक परमात्मा ही है'—ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी, मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है, स्मृति आ गयी है।

परिशिष्ट भाव— 'मैं जितना हूँ और जो हूँ, (यावान् यश्चास्मि)—यह बात सगुणकी ही है; क्योंकि 'यावान्-तावान्' निर्गुणमें हो सकता ही नहीं, प्रत्युत सगुणमें ही हो सकता है। चतुःश्लोकी भागवतमें भी भगवान्ने 'यावान्' पदका प्रयोग करते हुए ब्रह्माजीसे कहा है—

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥

(श्रीमद्भा० २।१।३१)

'मैं जितना हूँ, जिस भाववाला हूँ, जिन रूप, गुण और कर्मोंवाला हूँ, उस मेरे (समग्ररूपके) तत्त्वका यथार्थ अनुभव तुम्हें मेरी कृपासे ज्यों-का-त्यों हो जाय।'

'यावान् यश्चास्मि' का वर्णन भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें 'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः' पदोंमें किया था। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है।

ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको जब (ज्ञानोत्तरकालमें) भक्ति प्राप्त होती है तब उसमें तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते)—ये दो ही होते हैं, दर्शन नहीं होते। उनमें कोई कमी तो नहीं रहती, पर दर्शनकी इच्छा उनमें नहीं होती। परन्तु आरम्भसे ही भक्तिमार्गसे चलनेवालेको तत्त्वसे जानने (ज्ञातुम्) और प्रविष्ट होने (प्रवेष्टुम्)-के सिवाय भगवान्के दर्शन (द्रष्टुम्) भी होते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। इसलिये ज्ञानमार्गी सन्तोंमें भगवत्प्रेम (भक्ति)-की बात तो आती है, पर दर्शनकी बात नहीं आती।

जैसे विभिन्न मार्गोंसे आनेवाले व्यक्ति दरवाजेंमें प्रविष्ट होनेपर एक साथ मिल जाते हैं, ऐसे ही विभिन्न योग-मार्गोंपर चलनेवाले साधक भगवान्में प्रविष्ट होनेपर (विशते) एक हो जाते हैं अर्थात् अहम्की सूक्ष्म गन्ध भी न रहनेसे उनमें कोई मतभेद नहीं रहता।

प्रेमकी दो अवस्थाएँ होती हैं—(१) कभी भक्त प्रेममें डूब जाता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं और (२) कभी भक्तमें प्रेमका उछाल आता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी लीलाके लिये दो हो जाते हैं। यहाँ पहली अवस्थाको बतानेके लिये 'विशते' पद आया है।

सम्बन्ध— पहले श्लोकमें अर्जुनने सन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालिसवेंसे अड़तालिसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया; और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उनचासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यान-प्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।

सर्वकर्माण्यपि सदा कूर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ ५६ ॥

श्लोक ५६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०३

मद्व्यापश्रयः = मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा = सदा सर्वकर्माणि = सब कर्म

कुर्वाणः = करता हुआ अपि = भी मत्प्रसादात् = मेरी कृपासे शाश्वतम् = शाश्वत

अव्ययम् = अविनाशी पदम् = पदको अवाज्नेति = प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—‘मद्व्यापश्रयः’ —‘कर्मिका, कर्मिक फलका, कर्मिक पूरा होने अथवा न होनेका, किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है, अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, सर्वथा मेरे आश्रित रहता है, ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); उसको अपने जीवन-निर्वाह या साधन-सम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती; सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)—यह मेरा सदाका एक विधान है, नियम है, जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)।

‘सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः’ —‘यहाँ ‘कर्मणि’ पदके साथ ‘सर्व’ और ‘कुर्वाणः’ पदके साथ ‘सदा’ पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर, वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है, उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसी पदको लौकिक, पारलौकिक, सामाजिक, शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।

हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधन-भजन करता है, उसका कल्याण हो जाता है; परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है, उसका कल्याण कैसे होगा? उसका कल्याण हो जाय, ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती; क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं, मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं, पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं! इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘मत्प्रसादात् ’। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है, उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा, कौन है मना करनेवाला!

यद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदा-सर्वदा स्वतःसिद्ध है, तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है, तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्यों-ज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है, त्यों-ही-त्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है, और ज्यों-ज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है, त्यों-ही-त्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है, तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।

‘अवाज्नेति शाश्वतं पदमव्ययम्’ —स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे, अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम, सत्यलोक, वैकुण्ठलोक, गोलोक, साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेह-कैवल्य, मुक्ति, स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न कहा जाता है (गीता—आठवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देश-विशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं, वहाँ उनका लोक भी है; क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं; अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है, तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीते-जी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देश-विशेषमें ही है, तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहीं-कहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं।

१२०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान्ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अर्हता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है (अठारहवें अध्यायका इक्यावनवाँ, बावनवाँ और तिरपनवाँ श्लोक)। परन्तु भक्तके लिये यहाँ बताया कि वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब विहित कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है—‘मद्व्यपाश्रयः ’। तात्पर्य है कि भगवान्के चरणोंका आश्रय लेनेसे सुगमतासे कल्याण हो जाता है। भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता, प्रत्युत अपने बल, विद्या आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न रखकर केवल विश्वासपूर्वक भगवान्का ही आश्रय लेना पड़ता है। फिर भगवत्कृपा ही उसका कल्याण कर देती है—‘मत्प्रसादादावप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ’। भगवान् भी केवल भक्तके आश्रयको देखते हैं* उसके दोषोंको नहीं देखते। रामायणमें आया है—

रहित न प्रभु चित् चूक किए की। करत सुरति सय बार किए की॥

(बाल० २९।३)

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

(उत्तर० १।३)

मद्व्यपाश्रयः ’ का अर्थ है—मेरा विशेष आश्रय अर्थात् अनन्य आश्रय, जिसमें दूसरे किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न हो।

एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

(मानस, अरण्य० १०।४)

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥

चेतसा= चित्तसेमत्परः= मेरे परायण होकरसततम्= निरन्तर
सर्वकर्माणि= सम्पूर्ण कर्म(तथा)मच्चित्तः= मुझमें
मयि= मुझमेंबुद्धियोगम्= समताकाचित्वाला
सन्यस्य= अर्पण करके,उपाश्रित्य= आश्रय लेकरभव= हो जा।

व्याख्या —[इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं—

(१) ‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।

(२) ‘मत्परः ’—स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।

(३) ‘बुद्धियोगमुपाश्रित्य ’—समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर ले।

(४) ‘मच्चित्तः सततं भव ’—निरन्तर मेरेमें चित्वाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि और संसारके

व्यक्ति, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं, वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओंमें जो अपनापन है, उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है; क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये

  • ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)

श्लोक ५७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०५

उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।

'मत्यरः' —भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं, उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है, मेरेको करना भी कुछ नहीं है, पाना भी कुछ नहीं है, किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे मेरा किंचिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है—ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।

एक बात खास ध्यान देनेकी है—रुपये-पैसे, कुटुम्ब, शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये, हमारा इनपर आधिपत्य है; परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है, कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है, वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है, वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो, चाहे कुटुम्बी हो, चाहे शरीर हो, चाहे विद्या-बुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं, पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।

भगवान् स्वकीय हैं, अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा, तो वे मनुष्यके वशमें हो जायेंगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है, उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं—'मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि' , परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।

'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' —गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी, ध्यानी, योगी, भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छे-अच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आने-जानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखी-दुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आने-जानेवाली

परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया, अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया, अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया, प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया, प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुख-दुःखमें, अनुकूलता-प्रतिकूलतामें, हानि-लाभमें मैं सदैव ज्यों-का-त्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता, सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपने-आपमें स्थित रहे। अपने-आपमें स्थित रहनेसे सुख-दुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है—'समत्वमाराधनमच्युतस्य' (विष्णुपुराण १। १७। ९०)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।

'मच्चित्तः सततं भव' —जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है, उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतः-स्वाभाविक अधिकार है, वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही 'मच्चित्तः' होना है।

'मच्चित्तः' पदके साथ 'सततम्' पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब 'मैं भगवान्का हूँ' इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतः-स्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे, शिष्य बननेपर 'मैं गुरुका हूँ' इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है; क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है; परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।

साधक कोई भी सांसारिक काम-धंधा करे, तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस काम-धंधेमें द्रवित न होने दे, चित्तको संसारके साथ घुलने-मिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे, प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवान्नामका जप, कीर्तन, भगवत्कथा,

१२०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

भगवच्चिन्तन आदि भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें चित्तको द्रवित करता रहे, तल्लीन करता रहे, उस रसमें चित्तको तरातर करता रहे। इस प्रकार करते रहनेसे साधक बहुत जल्दी भगवान्में चित्वाला हो जायगा।

प्रेम-सम्बन्धी विशेष बात

चित्तसे सब कर्म भगवान्के अर्पण करनेसे संसारसे नित्य-वियोग हो जाता है और भगवान्के परायण होनेसे नित्ययोग (प्रेम) हो जाता है। नित्ययोगमें योग, नित्ययोगमें वियोग, वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें वियोग—ये चार अवस्थाएँ चित्तकी वृत्तियोंको लेकर होती हैं। इन चारों अवस्थाओंको इस प्रकार समझना चाहिये—

जैसे, श्रीराधा और श्रीकृष्णका परस्पर मिलन होता है, तो यह 'नित्ययोगमें योग' है। मिलन होनेपर भी श्रीजीमें ऐसा भाव आ जाता है कि प्रियतम कहीं चले गये हैं और वे एकदम कह उठतीं हैं कि 'प्यारे! तुम कहाँ चले गये।' तो यह 'नित्ययोगमें वियोग' है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं, पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं, तो यह 'वियोगमें नित्ययोग' है। श्यामसुन्दर थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये, पर मनमें ऐसा भाव है कि बहुत समय बीत गया, श्यामसुन्दर मिले नहीं, क्या करें? कहाँ जाऊँ? श्यामसुन्दर कैसे मिलें? तो यह 'वियोगमें वियोग' है।

वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें भगवान्के साथ नित्ययोग ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वियोग कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होनेकी संभावना भी नहीं। इसी नित्ययोगको 'प्रेम' कहते हैं; क्योंकि प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों अभिन्न रहते हैं। वहाँ भिन्नता कभी हो ही नहीं सकती। प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये ही भक्त

और भगवान्में संयोग-वियोगकी लीला हुआ करती है।

यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान किस प्रकार है? जब प्रेमी और प्रेमास्पद परस्पर मिलते हैं, तब 'प्रियतम पहले चले गये थे, उनसे वियोग हो गया था; अब कहीं ये फिर न चले जायें!'13 इस भावके कारण प्रेमास्पदके मिलनेमें तृप्ति नहीं होती, सन्तोष नहीं होता। वे चले जायेंगे—इस बातको लेकर मन ज्यादा खिंचता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान बताया है।

'प्रेम'—(भक्ति-में) चार प्रकारका रस अथवा रति होती है—दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। इन रसोंमें दास्यसे सख्य, सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्य—रस श्रेष्ठ है; क्योंकि इनमें क्रमशः भगवान्के ऐश्वर्यकी विस्मृति ज्यादा होती चली जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक भी रस पूर्णतामें पहुँच जाता है, तब उसमें दूसरे रसोंकी कमी नहीं रहती अर्थात् उसमें सभी रस आ जाते हैं। जैसे, दास्यरस पूर्णतामें पहुँच जाता है तो उसमें सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—तीनों रस आ जाते हैं। यही बात अन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं, उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है। इसलिये भगवान्के साथ किसी भी रीतिसे रति हो जायगी तो वह पूर्ण हो जायगी, उसमें कोई कमी नहीं रहेगी।

'दास्य' रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक हूँ। मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। वे चाहे जो करें, चाहे जैसी परिस्थितिमें रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें। मेरेपर अत्यधिक अपनापन होनेसे ही वे बिना मेरी सम्मति

१-काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्यदे। उपायैः शास्त्रनिर्दिष्टैरनुक्षणमतो बुधः ॥ (भक्तिसायन १।३२)

२-वास्तवमें संसारके साथ कभी संयोग हो नहीं सकता। उसका तो नित्य ही वियोग रहता है। जैसे, मनमें किसी वस्तुका चिन्तन होता है, तो वह उस वस्तुका माना हुआ संयोग है, जिससे उस वस्तुके न मिलनेका दुःख होता है। जब वस्तु (बाहरसे) मिल जाती है, तब उस वस्तुका भीतरसे वियोग हो जाता है, जिससे सुख होता है। ऐसे ही किसी कारणसे बाहरसे वस्तु चली जाय, नष्ट हो जाय, तो मनसे उस वस्तुका संयोग होनेपर दुःख होता है और विवेक-विचारके द्वारा 'यह वस्तु हमारी थी ही नहीं, हमारी हो सकती ही नहीं' इस प्रकार वस्तुको मनसे निकाल देनेपर सुख होता है। तात्पर्य यह है कि भीतरसे संयोग माना तो बाहरसे वियोग है और बाहरसे संयोग माना तो भीतरसे वियोग है। अतः वास्तवमें संसारके साथ नित्य वियोग ही रहता है। मनुष्य केवल भूलसे संसारके साथ संयोग मान लेता है।

३-योग और वियोगमें प्रेम-रसकी वृद्धि होती है। यदि सदा योग ही रहे, वियोग न हो, तो प्रेम-रस बढ़ेगा नहीं, प्रत्युत अखण्ड और एकरस रहेगा। अतः प्रेम-रसको बढ़ानेके लिये भगवान् अन्तर्धान भी हो जाते हैं।

श्लोक ५७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०७

लिये ही मेरे लिये सब विधान करते हैं।

'सख्य' रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ, तो मेरी भी बात उनको माननी पड़ेगी।

'वात्सल्य' रतिमें भक्तका अपनेमें स्वामिभाव रहता है कि मैं भगवान्की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वह तो हमारा बच्चा है अथवा शिष्य है; इसलिये उसका पालन-पोषण करना है। उसकी निगरानी भी रखनी है कि कहीं वह अपना नुकसान न कर ले; जैसे—नन्दबाबा और यशोदामैया कन्हैयाका खयाल रखते हैं और कन्हैया बनमें जाता है तो उसकी निगरानी रखनेके लिये दाऊजीको साथमें भेजते हैं!

'माधुर्य' * रतिमें भक्तको भगवान्के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है; अतः इस रतिमें भक्त भगवान्के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है। अभिन्नता माननेसे 'उनके लिये सुखदायी सामग्री जुटानी है, उन्हें सुख-आराम पहुँचाना है, उनको किसी तरहकी कोई तकलीफ न हो'—ऐसा भाव बना रहता है।

प्रेम-रस अलौकिक है, चिन्मय है। इसका आस्वादन करनेवाले केवल भगवान् ही हैं। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों ही चिन्मय-तत्त्व होते हैं। कभी प्रेमी प्रेमास्पद बन जाता है और कभी प्रेमास्पद प्रेमी हो जाता है। अतः एक चिन्मय-तत्त्व ही प्रेमका आस्वादन करनेके लिये दो रूपोंमें हो जाता है।

प्रेमके तत्त्वको न समझनेके कारण कुछ लोग सांसारिक कामको ही प्रेम कह देते हैं। उनका यह कहना बिलकुल गलत है; क्योंकि काम तो चौरासी लाख

योनियोंके सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है और उन जीवोंमें भी जो भूत, प्रेत, पिशाच होते हैं, उनमें काम (सुखभोगकी इच्छा) अत्यधिक होता है। परन्तु प्रेमके अधिकारी जीवन्मुक्त महापुरुष ही होते हैं।

काममें लेने-ही-लेनेकी भावना होती है और प्रेममें देने-ही-देनेकी भावना होती है। काममें अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करने—उनसे सुख भोगनेका भाव रहता है और प्रेममें अपने प्रेमास्पदको सुख पहुँचाने तथा सेवा-परायण रहनेका भाव रहता है। काम केवल शरीरको लेकर ही होता है और प्रेम स्थूलदृष्टिसे शरीरमें दीखते हुए भी वास्तवमें चिन्मय-तत्त्वसे ही होता है। काममें मोह (मूढ़भाव) रहता है और प्रेममें मोहकी गन्ध भी नहीं रहती। काममें संसार तथा संसारका दुःख भरा रहता है और प्रेममें मुक्ति तथा मुक्तिसे भी विलक्षण आनन्द रहता है। काममें जडता-(शरीर, इन्द्रियाँ आदि-) की मुख्यता रहती है और प्रेममें चिन्मयता-(चेतन स्वरूप-) की मुख्यता रहती है। काममें राग होता है और प्रेममें त्याग होता है। काममें परतन्त्रता होती है और प्रेममें परतन्त्रताका लेश भी नहीं होता अर्थात् सर्वथा स्वतन्त्रता होती है। काममें 'वह मेरे काममें आ जाय' ऐसा भाव रहता है और प्रेममें 'मैं उसके काममें आ जाऊँ' ऐसा भाव रहता है। काममें कामी भोग्य वस्तुका गुलाम बन जाता है और प्रेममें स्वयं भगवान् प्रेमीके गुलाम बन जाते हैं। कामका रस नीरसतामें बदलता है और प्रेमका रस आनन्दरूपसे प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। काम खिन्नतासे पैदा होता है और प्रेम प्रेमास्पदकी प्रसन्नतासे प्रकट होता है। काममें अपनी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है और प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। काम-मार्ग नरकोंकी तरफ ले जाता है और प्रेम-मार्ग

  • लोग प्रायः माधुर्यभावमें स्त्री-पुरुषका भाव ही समझते हैं; परन्तु यह भाव स्त्री-पुरुषके सम्बन्धमें ही होता है—यह नियम नहीं है। माधुर्य नाम मधुरता अर्थात् मिठावका है और वह मिठास आती है भगवान्के साथ अभिन्नता होनेसे। वह अभिन्नता जितनी अधिक होगी, मधुरता भी उतनी ही अधिक होगी। अतः दास्य, सख्य और वात्सल्यभावमेंसे किसी भी भावमें पूर्णता होनेपर उसमें मधुरता कम नहीं रहेगी। भक्तिके सभी भावोंमें माधुर्यभाव रहता है।

अभेद और अभिन्नतामें भेद है। जिसमें केवल एक तत्त्व ही रह जाय, द्वैतभाव सर्वथा समाप्त हो जाय, उसका नाम 'अभेद' है और दो होते हुए भी एक रहनेका नाम 'अभिन्नता' है; जैसे—दो मित्रोंमें भीतरसे घनिष्ठता होनेसे अभिन्नता रहती है। अभिन्नता जितनी गाढ़ होती है, उतना ही माधुर्यरस प्रकट होता है। इसीको प्रेम-रस कहते हैं। भगवान् भी इस प्रेम-रसके लोभी हैं। इस प्रेम-रसका आस्वादन करनेके लिये ही भगवान् एकसे अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—'एकाकी न रमते' (बृहदारण्यक० १।४।३), 'सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छान्दोग्य० ६।२।३)।

१२०८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी

हैं अर्थात् द्वैधभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं मिटती नहीं*।

परिशिष्ट भाव—पूर्वश्लोकमें शाश्वत पदकी प्राप्ति बताकर अब उसकी विधि बताते हैं कि वह कैसे प्राप्त

होगा। साधकके लिये दो ही खास काम हैं—संसारके सम्बन्धका त्याग और भगवान्के साथ सम्बन्ध (प्रेम)। पूर्वश्लोकमें

आये 'मद्व्यपाश्रयः' पदमें भगवान्के साथ सम्बन्धकी मुख्यता है और इस श्लोकमें आये 'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' पदमें

संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी मुख्यता है।

'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' कहनेका तात्पर्य है कि संसारका सूक्ष्म सम्बन्ध भी न रहे—'दूरेण ह्यवरं कर्म

बुद्धियोगाद्धनंजय' (गीता २। ४९), किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष न रहे।

एकमात्र भगवान्का चिन्तन करनेसे समता (बुद्धियोग) स्वतः आ जाती है, इसलिये 'मच्चित्तः सततं भव' कहा है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे दृढ़ करते हैं।

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥

मच्चित्तः = मुझमें चित्तवाला होकर (तू) अथ = और चेत् = यदि न = नहीं श्रोष्यसि = सुनेगा

मत्प्रसादात् = मेरी कृपासे त्वम् = तू (तो) विनङ्क्ष्यसि = तेरा पतन हो

सर्वदुर्गाणि = सम्पूर्ण विघ्नों अहङ्कारात् = अहंकारके कारण (मेरी बात) जायेगा।

तरिष्यसि = तर जायगा

व्याख्या—'मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादा- दोषोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेदारी

त्तरिष्यसि'—भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं—

तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न, बाधा, शोक, दुःख आदिको 'मत्प्रसादात्तरिष्यसि' अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न-

तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी बाधाओंको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि

प्रयास नहीं करना पड़ेगा। भक्त अपनी तरफसे, उसको जितना समझमें आ जाय,

भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले, उसके बाद जो कुछ

कर दिये, स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया, समताके कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।

आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही

गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया

सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर

कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें करने लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर

कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ

प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ, तो उन दोषोंको दूर कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।

करनेकी साधकपर कोई जिम्मेदारी नहीं रहती, प्रत्युत उन अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ

  • द्वैतं मोहय बोधात्प्राजाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतदपि सुन्दरम्॥

पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात्सा तु मुक्तिस्ताधिका॥

(बोधसार भक्ति० ४२-४३)

'बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डाल सकता है। परन्तु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर

होता है।'

'वास्तविक तत्त्व तो अद्वैत ही है, पर भजनके लिये द्वैत है। ऐसी यदि भक्ति है तो वह भक्ति मुक्तिसे भी सौगुनी श्रेष्ठ है।'

श्लोक ५८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०९

कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किंचित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना—यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपने-आप करा देगी।

जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है, उसपर ही शास्त्रोंका विधि-निषेध, अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उन-उन नियमोंका पालन जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पाप-पुण्य होते हैं और उनका फल सुख-दुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, वह शास्त्रीय विधि-निषेध और वर्ण-आश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधि-निषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधि-निषेध लागू नहीं होते; क्योंकि विधि-निषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है।

जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव, ऋषि, प्राणी, माता-पिता आदि आप्तजन और दादा-परदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता*; क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है, जब वह जड़ शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है; नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं, तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है? यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना है!

साधन-कालमें जीवन-निर्वाहकी समस्या, शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्न-बाधाएँ आती हैं; परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्न-बाधाओंमें भगवान्की विशेष

कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्न-बाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं, प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं।

परमार्थिक साधनमें विघ्न-बाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।

‘अथ चैत्त्वमहंकारान् श्रोष्यसि विनइक्ष्यसि’—

भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि ‘अथ’—पश्चात्तरमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् ‘मैं भी कुछ जानता हूँ, करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ, कुछ कर सकता हूँ’ आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा, मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा, मेरा कहना नहीं मानेगा, तो तेरा पतन हो जायगा—‘विनइक्ष्यसि’।

यद्यपि अर्जुनके लिये यह किंचिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने, तथापि भगवान् कहते हैं कि ‘चेत्’—अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने, तो यह सब क्षय है; परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा; क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा, जो सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका मूल है।

पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति’ (४।३) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता—‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति’ (९।३१)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं; अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेगे तो भगवान्से विमुख हो जायेंगे और भगवान्से विमुख होनेके

  • देवर्षिभूताप्लुनां पितृनां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिह्वय कर्तव्यम्॥

(श्रीमद्भा० ११।५।४९)

‘राजन्! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान्की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी, कुटुम्बीजन और पितृगण—इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक नहीं रहता।’

१२१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणीका पतन होता है अर्थात् वह जन्म-मरणके चक्रमें पड़ता है (गीता—नवें अध्यायका तीसरा और सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।

विशेष बात

इसी अध्यायके छ्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष 'अवाप्नोति ' का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है, और यहाँ मध्यम पुरुष 'तरिष्यसि ' का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्न-बाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है, वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये; क्योंकि मनुष्य-जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्य-जन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता, वह यदि ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय, तो भी उसे लौटकर संसार-(जन्म-मरण-में आना ही पड़ेगा* (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। इसलिये जब यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, तो फिर मनुष्यको जीते-जी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्म-मरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवित-अवस्थामें ही पुण्य और पाप—दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका पचासवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्म-बन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्म-मरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका

परम ध्येय है।

दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ, और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विरारूप दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (इसी अध्यायका छ्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (इसी श्लोकमें)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा; युद्धके कारण कुल-परम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थ-परम्परा बढ़ती ही जायगी; हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं, इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें, तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता—पहले अध्यायके छ्तीसवेंसे छ्ज्यालीसवें श्लोकतक)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको, पापोंको तर जायगा—'सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादातरिष्यसि ।' भगवान्ने बहुवचनमें 'दुर्गाणि ' पद देकर भी उसके साथ 'सर्व ' शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा; कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।

परिशिष्ट भाव —भक्तका काम केवल भगवान्का आश्रय लेना है, भगवान्का ही चिन्तन करना है। फिर उसके सब काम भगवान् ही करते हैं। भगवान् भक्तपर विशेष कृपा करके उसके साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर देते हैं और अपनी प्राप्ति भी करा देते हैं—'योगक्षेमं वहाय्यहम् ' (गीता ९।२२)। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—'विशेषानुग्रहश्च ' (३।४।३८) 'भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है। ' वास्तवमें मनुष्यपर भगवान्की कृपा तो है ही, पर भगवान्का आश्रय लेनेसे भक्तको उसका विशेष अनुभव होता है।

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यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्यस्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥

  • येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन्सत्व्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्ग्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३२)

श्लोक ५१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२११

अहङ्कारम्= अहंकारकान, योत्स्ये= युद्ध नहीं करूँगा,(क्योंकि)
आश्रित्य= आश्रय लेकरते= तेराप्रकृतिः
यत्= (तू) जोएषः= यहत्वाम्
इति= ऐसाव्यवसायः= निश्चयनियोध्यति
मन्यसे= मान रहा है कि (मैं)मिथ्या= मिथ्या (झूठा) है;

व्याख्या—‘यदहंकारमाश्रित्य’ —प्रकृतिसे ही महत्त्व और महत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है—‘मैं शरीर हूँ।’ इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है, बदलेनेवाली है, इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है, तो फिर वह यह कैसे कह सकता है कि मैं अमुक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना—इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो ‘करना’ भी कर्म है और ‘न करना’ भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता, उससे निलिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है), तो फिर उसके लिये करना और न करना—ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे, ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है, उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।

‘न योत्स्य इति मन्यसे’ —दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की—‘शिष्यस्तेऽहं साधि मां त्वां प्रपन्म ’ (२।७) और उसके बाद अर्जुनने साफ-साफ कह दिया कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्स्ये ’ (२।९)। यह बात भगवान्को अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी

तरफसे साफ-साफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही? यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी! कारण कि वास्तविक शरणागति होनेपर ‘मैं यह करूँगा, यह नहीं करूँगा’ ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागति होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे, वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया, नहीं तो भगवान् वहीँपर यह कह देते कि ‘जैसा चाहता है, वैसा कर’—‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ (१८।६३) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों—‘न योत्स्ये ’ का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है, मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो ‘युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो ‘मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा’ इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागति होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है, जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।

यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं, उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं, पर हो जाते हैं उनके गुलाम! परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते, उन पदार्थोंके

‘हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंके शरण नहीं हैं और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायें, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।’

१२१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थ और क्रियाओंको अपनी मानता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है, और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती—यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं, वे मौतके मार्ग—(संसार—)में बह जाते हैं—‘निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्तनिं’ (९।३)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तेरा यह कहना, तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्र-प्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।

‘मिथ्यैष व्यवसायस्ते’—व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है—वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है, उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है, उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती

परिशिष्ट भाव—पूर्वश्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण ‘फल’ ठीक नहीं होगा और इस श्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण ‘क्रिया’ ठीक नहीं होगी। तात्पर्य है कि सुनने या न सुननेसे पतन नहीं होगा, प्रत्युत अहंकारके कारण पतन होगा। कर्म करना या न करना बाधक नहीं है, प्रत्युत अहंकार बाधक है।

भगवान्ने कहा कि मैं अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा और तेरे विघ्नोंको भी दूर कर दूँगा (अठारहवें अध्यायका छप्पनवाँ और अड़ान्वीं श्लोक)। परन्तु इतना कहनेपर भी अर्जुन बोले नहीं, जब कि उनको वहाँ ‘करिष्ये वचनं तव’ कह देना चाहिये था। तब भगवान् कहते हैं कि अगर तू भूलसे मेरी बात न सुने तो कोई बात नहीं, पर तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। भगवान्का भाव है कि जैसे भक्तका सब काम (साधन और सिद्धि) मैं कर देता हूँ, ऐसे ही भक्तको भी चाहिये कि वह सब प्रकारसे मेरा ही आश्रय ले। परन्तु मेरा आश्रय न लेकर वह अहंकारका आश्रय लेगा तो उसका पतन हो जायगा। अहंकारका आश्रय लेनेसे ‘मद्व्यप्याश्रय’ नहीं होगा; क्योंकि मेरे आश्रयकी जगह मेरी अपरा प्रकृति ‘अहंकार’ का आश्रय ले लिया। कर्तव्य कर्म (युद्ध)—में एक तो मैं लगाता हूँ और एक प्रकृति लगाती है। अगर तू मेरी बात नहीं मानेगा तो तेरी क्षात्र प्रकृति तेरेको युद्धमें लगायेगी। प्रकृति लगायेगी तो जिम्मेवारी तेरी होगी और मेरी बात सुनकर कर्तव्यमें लगेगा तो जिम्मेवारी मेरी होगी। तेरी जिम्मेवारी होनेसे तू बद्ध हो जायगा और मेरी जिम्मेवारी होनेसे तू मुक्त हो जायगा।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी, अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।

कर्तु नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥

है और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है, उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा तेरा (क्षात्र-प्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है, झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये, प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।

यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है, नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारी—से—दुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये, क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।

‘प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति’—इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्र-स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है—शूरवीरता, युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता—इसी अध्यायका तैंतालिसवाँ श्लोक)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा।

श्लोक ६० ]

  • साधक-संजीवनी *

१११३

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !मोहात्= मोहके कारणतत्= उसको
स्वेन= अपनेयत्= जिस युद्धकोअपि= भी (तू)
स्वभावजेन= स्वभावजन्य= नहींअवशः= (क्षत्र प्रकृतिके)
कर्मणा= कर्मसेकर्तुम्= करनापरवश होकर
निबद्धः= बँधा हुआ (तू)इच्छसि= चाहता,करिष्यसि= करेगा।

व्याख्या—‘स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा’— पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं, इस जन्ममें जैसे माता-पितासे पैदा हुए हैं अर्थात् माता- पिताके जैसे संस्कार रहे हैं, जन्मके बाद जैसा देखा-सुना है, जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं—उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है, उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं—‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि’ (गीता २।३१)। ‘कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यत्यवशोऽपि तत्’— स्वभावजन्य क्षत्र प्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्य-पालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कर्मियाँ अथवा दोष दीखते हों, तो भी वे दोष बाधक (पाप-जनक) नहीं होते—‘श्रेयान्स्वधर्मा विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्’ (गीता ३।३५; १८।४७)। उस स्वभावज कर्म (क्षत्र-धर्म)-के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है।

जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते; फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं, तो अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं, इसलिये उनका स्वभाव उनको जबरदस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता—तीसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षत्र-स्वभाव भी तुझे जबरदस्ती युद्धमें लगा देगा; परन्तु उसका फल तेरे लिये बढ़िया नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्त-महापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा, तो

वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे, उन कर्मोंमें जो राग-द्वेष हैं, वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायेंगे; क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी, राग-द्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे।

विशेष बात

गीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ, आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ और नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक आदि); परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है—‘प्रकृतिं यान्ति भूतानि’ (३।३३) और यहाँ ‘प्रकृतिस्त्वां नियोश्यति’ (१८।५९)*। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है; क्योंकि कोई भी प्राणी जिस-किसी योनियें भी जन्म लेता है, उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असंगता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा? यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी ही मुख्याता रहेगी—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)। जब स्वभावकी ही मुख्याता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी, तो फिर शास्त्रोंका विधि-निषेध किसपर लागू होगा? गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी? और मनुष्य दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सदगुण-सदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगा?

उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गंगाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता, पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है, घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता, पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको राग-द्वेषसे रहित परम शुद्ध, निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि

  • ज्ञानयोगमें ज्ञानी प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, इसलिये उसके लिये प्रकृतिकी परवशताकी बात नहीं आयी है।

१२१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

स्वभावको शुद्ध बनानेमें मनुष्यमात्र सर्वथा सबल और स्वतन्त्र है, निर्बल और परतन्त्र नहीं है। निर्बलता और परतन्त्रता तो केवल राग-द्वेष होनेसे प्रतीत होती है।

अब इस स्वभावको सुधारनेके लिये भगवान्ने गीतामें कर्मयोग और भक्तियोगकी दृष्टिसे दो उपाय बताये हैं—

(१) कर्मयोगकी दृष्टिसे —तीसरे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि मनुष्यके खास शत्रु राग-द्वेष ही हैं। अतः राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये अर्थात् राग-द्वेषको लेकर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये, प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। शास्त्रके आज्ञानुसार अर्थात् शिष्य गुरुकी, पुत्र माता-पिताकी, पत्नी पतिकी और नौकर मालिककी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक सब कर्म करता है तो उसमें राग-द्वेष नहीं रहते। कारण कि अपने मनके अनुसार कर्म करनेसे ही राग-द्वेष पुष्ट होते हैं। शास्त्र आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेसे और कभी दूसरा नया कार्य करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा न होनेसे हम वह कार्य नहीं करते तो उससे हमारा 'राग' मिट जायगा; और कभी कार्यको न करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे हम वह कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उससे हमारा 'द्वेष' मिट जायगा।

(२) भक्तियोगकी दृष्टिसे —जब मनुष्य ममतावाली

परिशिष्ट भाव —स्वभाव दो तरहका होता है—(१) विहित कर्मोंका स्वभाव और (२) निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव। इनमें विहित कर्मोंका स्वभाव तो स्वतः होनेसे 'स्व-स्वभाव' है, पर निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव आगन्तुक होनेसे 'पर-स्वभाव' है। विहित कर्मोंका स्वभाव तो सजातीय होनेसे जन्म नहीं है, पर निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव विजातीय होनेसे जन्म (आसक्तिजन्म, कुसंगजन्म) है। मनुष्यका खास कर्तव्य है—अपना स्वभाव ठीक करना अर्थात् निषिद्ध कर्मोंके स्वभावका त्याग करके विहित कर्मोंके स्वभावके अनुसार आचरण करना। भगवान्ने विहित कर्मोंके स्वभावके अनुसार ही अपने वर्ण-धर्मका पालन करनेकी आज्ञा दी है।

भगवान् कहते हैं कि चाहे कर्तव्यमात्र समझकर युद्ध कर, चाहे मेरी आज्ञा मानकर युद्ध कर, युद्ध तो तरेको करना ही पड़ेगा। मेरा आश्रय न लेनेसे तेरा अहंकार रहेगा, जिससे विहित कर्म भी बाँधनेवाला हो जायगा। परन्तु मेरा आश्रय लेनेसे अहंकार नहीं रहेगा। अहंकार ही बाँधनेवाला होता है। जो प्रकृतिके परवश नहीं होता, जिसकी प्रकृति महान् शुद्ध होती है, ऐसा ज्ञानी महापुरुष भी जब प्रकृतिके अनुसार क्रिया करता है, फिर प्रकृतिके परवश हुआ तथा अशुद्ध प्रकृतिवाला मनुष्य प्रकृतिके विरुद्ध कर्म कैसे कर सकता है?

सम्बन्ध—जीव स्वयं परमात्माका अंश है और स्वभाव प्रकृतिका अंश है; स्वयं स्वतःसिद्ध है और स्वभाव खुदका बनाया हुआ है; स्वयं चेतन है और स्वभाव जड है—ऐसा होनेपर भी जीव स्वभावके परवश कैसे हो जाता है? इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृदयेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥

वस्तुओंके सहित स्वयं भगवान्ने शरण हो जाता है, तब उसके पास अपना करके कुछ नहीं रहता। वह भगवान्ने हाथकी कटपुतली बन जाता है। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार, उनकी इच्छाके अनुसार ही उसके द्वारा सब कार्य होते हैं, जिससे उसके स्वभावमें रहनेवाले राग-द्वेष मिट जाते हैं।

तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगमें राग-द्वेषके वशीभूत न होकर कार्य करनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक) और भक्तियोगमें भगवान्ने सर्वथा अपित होनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बासठवाँ श्लोक)। स्वभाव शुद्ध होनेसे बन्धनका कोई प्रश्न ही नहीं रहता।

मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वह कभी राग-द्वेषके वशीभूत होकर करता है और कभी सिद्धान्तके अनुसार करता है। राग-द्वेषपूर्वक कर्म करनेसे राग-द्वेष दृढ़ हो जाते हैं और फिर मनुष्यका वैसा ही स्वभाव बन जाता है। सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे उसका सिद्धान्तके अनुसार ही करनेका स्वभाव बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर शास्त्र और महापुरुषोंके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करते हैं और जो परमात्माको प्राप्त हो गये हैं—उन दोनों—(साधकों और सिद्ध महापुरुषों—) के कर्म दुनियाके लिये आदर्श होते हैं, अनुकरणीय होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

श्लोक ६१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१५

अर्जुन= हे अर्जुन !तिष्ठति= रहता है (और)सर्वभूतानि= सम्पूर्ण प्राणियोंको
ईश्वरः= ईश्वरमायया= अपनी मायासे(उनके स्वभावके
सर्वभूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेयन्त्रारूढानि= शरीररूपी यन्त्रपरअनुसार)
हृदेशे= हृदयमेंआरूढ हुएभ्रामयन् = भ्रमण करता रहता है।

व्याख्या—‘ईश्वरः सर्वभूतानां ..... यन्त्रारूढानि मायया’ —इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक, नियामक, सबका भरण-पोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है, वह अपनी शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है, जिन्होंने शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान रखा है।

जैसे, विद्युत्-शक्तिसे संचालित यन्त्र—रेलपर कोई आरूढ हो जाता है, चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ नहीं रहता, नीचे उतर जाता है, तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ ‘मैं’ और ‘मेरे’-पनका सम्बन्ध रखता है, तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभावके* अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्म-मरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है।

शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं, जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर जब स्वभाव राग-द्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है, तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति-(स्वभाव-)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती।

अब यहाँ यह शंका होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है, क्रिया करवाता है, तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये—ऐसी स्वतन्त्रता कहाँ रही? क्योंकि यन्त्रारूढ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये, परतन्त्र हो गये, तो फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा, वैसा ही होगा? इसका समाधान इस प्रकार है—

जैसे, बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी

यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे, प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है, उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं, सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलग-अलग शरीरोंमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है, उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैं-मेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है, उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है, प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है।

जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है, ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं, कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु, पक्षी, देवता, आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं, उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्य-शरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है, इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार है, पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका

  • स्वभाव कारणशरीरमें रहता है। वही स्वभाव सूक्ष्म और स्थूल-शरीरमें प्रकट होता है।

१२१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है—यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है, वहीसे जल प्राप्त होता है; ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ-(निष्काम-कर्म-) में स्थित बताया गया है—‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्’ (गीता ३।१५)।

विशेष बात

साधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन, कीर्तन, ध्यान आदि करते हुए भी ‘भगवान् दूर हैं; वे अभी नहीं मिलेंगे; यहाँ नहीं मिलेंगे; अभी मैं योग्य नहीं हूँ; भगवान्की कृपा नहीं है’ आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं; मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं; मेरे मनमें भी भगवान् हैं, बुद्धिमें भी भगवान् हैं; मैं जो ‘मैं-मैं’ कहता हूँ, उस ‘मैं’ में भी भगवान् हैं। उस ‘मैं’ का जो आधार है, वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् ‘मैं’-पन तो दूर है, पर भगवान् ‘मैं’-पनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन, जप, ध्यान आदि करने चाहिये।

अब शंका यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलग-अलग) हैं—यह

परिशिष्ट भाव—‘भ्रामयन्’ का तात्पर्य है कि संसारमात्रका संचालन भगवान्की ही शक्तिसे हो रहा है—‘मतः सर्वं प्रवर्तते’ (गीता १०।८)। भगवान् प्राणियोंको उनके स्व-स्वभावके अनुसार कर्म करनेकी प्रेरणा तो करते हैं, पर उसमें अपना आग्रह नहीं रखते। भगवान्का आग्रह न होनेके कारण ही मनुष्य अपनी कामना-ममता-आसक्तिके वशीभूत होकर पुण्य अथवा पाप करता है और उनका फल भोगनेके लिये स्वर्गादि लोकोंमें अथवा नरकों और नीच योनियोंमें जाता है। परन्तु जो भगवान्के शरण हो जाता है, उसको भगवान् विशेष प्रेरणा करते हैं। अहंकार न रहनेसे वह जो कुछ करता है, भगवान्की प्रेरणाके अनुसार ही करता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परं शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥

द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती, प्रत्युत अहंकार-(‘मैं’-पन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है, उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है, जिससे प्रेम प्रकट होता है।

जैसे, गंगाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है; परन्तु उसका जो जल गड़ढेमें रह जाता है अर्थात् गंगाजीसे अलग हो जाता है, उसको ‘गंगोज्झ’ कहते हैं। उस गंगोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गंगाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं, जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है, तो वह गंगोज्झ वापस गंगाजीमें मिल जाता है। गंगाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता, अपवित्रता, अशुद्धि आदि सभी दोष चले जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गंगजल बन जाता है।

ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है, तब इसमें परिच्छिन्नता, पराधीनता, जडता, विषमता, अभाव, अशान्ति, अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है, उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता, तब उसमें आये हुए भिन्नता, पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप-) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता-(मैं-पन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं।

श्लोक ६२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१७

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! (तू) | शरणम् | = शरणमें | शान्तिम् | = शान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति)-को ---|---|---|---|---|--- सर्वभावनेन | = सर्वभावसे | गच्छ | = चला जा। | शाश्वतम् | = (और) अविनाशी तम् | = उस ईश्वरकी | तत्प्रसादात् | = उसकी कृपासे (तू) | स्थानम् | = परमपदको एव | = ही | पराम् | = परम | प्राप्यसि | = प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या —[मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संत-महापुरुष विद्यमान रहते हैं, तब उसका उनपर श्रद्धा-विश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती*]; परन्तु जब वे चले जाते हैं, तब पीछे वह रोता है, पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है; और तू भी मेरेमें चितवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा, तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]

‘तमेव शरणं गच्छ’ —भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है, तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले।

पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं-मेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ ‘एव’ पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किंचिन्मात्र भी मैं-मेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।

‘सर्वभावेन’ —सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो, शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो, उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिके अनुकूल हो, चाहे

प्रतिकूल हो, उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो! भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही, मेरे मन, बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे, मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया है!

‘तत्प्रसादात्परं शान्तिं स्थानं प्राप्यसि शाश्वतम्’ —भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (छप्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (अढ़ावनवाँ श्लोक)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान-(पद-)को प्राप्त कर लेगा।

गीतामें अविनाशी परमपदको ही ‘परा शान्ति’ नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भगवान्ने ‘परा शान्ति’ और ‘शाश्वत स्थान’ (परमपद)—दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँ ‘परा शान्ति’ का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति और ‘शाश्वत स्थान’ का अर्थ परमपद लेना चाहिये।

भगवान्ने ‘तमेव शरणं गच्छ’ पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शंका हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं? क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते, तो अर्जुनको ‘उसीकी शरणमें जा’—ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते।

इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो ‘गुह्यादगुह्यतरम्’ (१८।६३) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है, पर अपनी शरणागतिको ‘सर्वगुह्यतमम्’ (१८।६४) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए।

भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको

  • ‘अतिपरिचयादवज्ञा’ अर्थात् जहाँ किसीसे अति परिचय होता है, वहाँ उसकी अवज्ञा होती है।

१२१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (चौथे अध्यायका छठा श्लोक); मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् हूँ—ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (पाँचवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते, उनका पतन होता है (नवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्ध हो जाता है।

इस अध्यायमें 'ईश्वरः सर्वभूतानां ह्देशऽर्जुन तिष्ठति' (१८।६१) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' (१५।१५) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं, एक ही हैं।

जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं, तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको 'तमेव शरणं गच्छ' क्यों कहा? इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें

परिशिष्ट भाव—जीव ईश्वरका ही अंश है, इसलिये भगवान् ईश्वरकी ही शरणमें जानेके लिये कहते हैं। ईश्वरके शरण होनेसे अहंकार नहीं रहता। जबतक जीव ईश्वरके वश (शरण)-में नहीं होता, तभीतक वह प्रकृतिके वशमें रहता है। वह जितना-जितना जड़ताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी आसुरी-सम्पत्ति आती है और जितना-जितना चिन्मयताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी दैवी-सम्पत्ति आती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यादगुह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

इति= यहते= तुझेविमृश्य= विचार
गुह्यात्= गुह्यसे भीआख्यातम्= कह दिया।करके
गुह्यतरम्= गुह्यतरएतत्= (अब तू)यथा= जैसा
ज्ञानम्= (शरणागतिरूप)इसपरइच्छसि= चाहता है,
ज्ञानअशेषेण= अच्छीतथा= वैसा
मया= मैंनेतरहसेकुरु= कर।

व्याख्या—'इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यादगुह्यतरं मया'—पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है, उसीका लक्ष्य यहाँ 'इति'

पदसे कराया गया है। भगवान् कहते हैं कि यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग 'गुह्य' है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी