श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४२-४३ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —वास्तविक उद्देश्य एक ही होता है। जबतक मनुष्यका एक उद्देश्य नहीं होता, तबतक उसके अनन्त उद्देश्य रहते हैं और एक-एक उद्देश्यकी अनेक शाखाएँ होती हैं। उसकी अनन्त कामनाएँ होती हैं और एक-एक कामनाकी पूर्तिके लिये उपाय भी अनेक होते हैं।
सम्बन्ध—अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त क्यों होती हैं—इसका हेतु आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | इति | = ऐसा | जन्मकर्म- | ---|---|---|---|---|--- कामात्मानः | = जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, | वादिनः | = कहनेवाले हैं, | फलप्रदाम् | = जन्मरूपी कर्म-फलको देनेवाली है (तथा) स्वर्गपराः | = स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, | अविपश्चितः | = (वे) अविवेकी मनुष्य | भोगैश्वर्यगतिम्, | वेदवादरताः | = वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, | इमाम् | = इस प्रकारकी | प्रति | = भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये अन्यत् | = (भोगोंके सिवाय) और कुछ | पुष्यिताम् | = पुष्यित (दिखाऊ शोभायुक्त) | क्रियाविशेष- | न, अस्ति | = है ही नहीं— | वाचम् | = वाणीको | बहुलाम् | = बहुत-सी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। | | प्रवदन्ति | = कहा करते हैं, (जो कि) | |
व्याख्या —‘कामात्मानः’—वे कामनाओंमें इतने रचे-पचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता, कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता, कामनाके बिना आदमी पत्थरकी तरह जड़ हो जाता है, उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष ‘कामात्मानः’ हैं।
स्वयं तो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती, पर कामना आती-जाती रहती है और घटती-बढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना—ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं। परन्तु कामनामें रचे-पचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता।
‘स्वर्गपराः’ —स्वर्गमें बढ़िया-से-बढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं, इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रात-दिन लगे रहते हैं।
यहाँ ‘स्वर्गपराः’ पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी
है, जो वेदोंमें, शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं।
‘वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः’ —वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं, इसलिये वे ‘वेदवादरताः’ हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है।
‘यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः’ —जिनमें सत्-असत्, नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशीका विवेक नहीं है, ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है, उस पुष्यित वाणीको कहा करते हैं।
यहाँ ‘पुष्यिताम्’ कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूल-पत्ती ही है, फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है, फूल-पत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस