भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

वाणीका जो फल—स्वर्गादिका भोग है, वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है, उसमें स्थायीपना नहीं है।

‘जन्मकर्मफलप्रदाम्’—वह पुष्पित वाणी जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है; क्योंकि उसमें सांसारिक भोगोंको ही महत्व दिया गया है। उन भोगोंका राग ही आगे जन्म होनेमें कारण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

‘क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति’—वह पुष्पित

अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जिन सकाम अनुष्ठानोंका वर्णन करती है, उनमें क्रियाओंकी बहुलता रहती है अर्थात् उन अनुष्ठानोंमें अनेक तरहकी विधियाँ होती हैं, अनेक तरहकी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, अनेक तरहके पदार्थोंकी जरूरत पड़ती है एवं शरीर आदिमें परिश्रम भी अधिक होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां

तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥

तया | = उस पुष्पित वाणीसे | | | भोगैश्वर्य- | खिंच गया है (और जो) | | | समाधौ | = परमात्मामें ---|---|---|---|---|---|---|--- अपहृतचेतसाम् | = जिसका अन्तः-करण हर लिया गया है अर्थात् | प्रसक्तानाम् | = भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, (उन मनुष्योंकी) | व्यवसायात्मिका | = एक निश्चयवाली | भोगोंकी तरफ | | | बुद्धिः | = बुद्धि | | | | न | = नहीं | | | | | | विधीयते | = होती।

व्याख्या—‘तयापहृतचेतसाम्’—पूर्वश्लोकोंमें जिस पुष्पित वाणीका वर्णन किया गया है, उस वाणीसे जिनका चित्त अपहृत हो गया है अर्थात् स्वर्गमें बड़ा भारी सुख है, दिव्य नन्दनवन है, अप्सराएँ हैं, अमृत है—ऐसी वाणीसे जिनका चित्त उन भोगोंकी तरफ खिंच गया है।

‘भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्’—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय, शरीरका आराम, मान और नामकी बड़ाई—इनके द्वारा सुख लेनेका नाम ‘भोग’ है। भोगोंके लिये पदार्थ, रुपये-पैसे, मकान आदिका जो संग्रह किया जाता है, उसका नाम ‘ऐश्वर्य’ है। इन भोग और ऐश्वर्यमें जिनकी आसक्ति है, प्रियता है, खिंचाव है अर्थात् इनमें जिनकी महत्त्वबुद्धि है, उनको ‘भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्’ कहा गया है।

जो भोग और ऐश्वर्यमें ही लगे रहते हैं, वे आसुरी सम्पत्तिवाले होते हैं। कारण कि ‘असुर’ नाम प्राणोंका है और उन प्राणोंको जो बनाये रखना चाहते हैं, उन प्राणपोषण-परायण लोगोंका नाम ‘असुर’ है। वे शरीरकी प्रधानताको लेकर यहकि अथवा स्वर्गके भोग भोगना चाहते हैं*।

‘व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते’—जो मनुष्यजन्मका असली ध्येय है, जिसके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, उस परमात्माको ही प्राप्त करना है—ऐसी व्यवसायात्मिका बुद्धि उन लोगोंमें नहीं होती। तात्पर्य यह है कि जो भोग भोगे जा चुके हैं, जो भोग भोगे जा सकते हैं, जिन भोगोंको सुन रखा है और जो भोग सुने जा सकते हैं, उनके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता रहती है, उस मलिनताके कारण संसारसे सर्वथा विरक्त होकर एक परमात्माकी तरफ चलना है—ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं होता। ऐसे ही संसारकी अनेक विद्याओं, कलाओं आदिका जो संग्रह है, उससे ‘मैं विद्वान् हूँ’, ‘मैं जानकार हूँ’—ऐसा जो अभिमानजन्य सुखका भोग होता है, उसमें आसक्त मनुष्योंका भी परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय नहीं होता।

विशेष बात

परमदयालु प्रभुने कृपा करके इस मनुष्यशरीरमें एक ऐसी विलक्षण विवेकशक्ति दी है, जिससे वह सुख-दुःखसे ऊँचा उठ जाय, अपना उद्धार कर ले, सबकी सेवा करके भगवान्तकको अपने वशमें कर ले! इसीमें मनुष्य-शरीरकी

  • यहाँ जिन राजसी मनुष्योंका वर्णन हो रहा है, उनको भगवान्ने सोलहवें अध्यायमें आसुरी सम्पत्तिवालोंके प्रकरणमें ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (१६।११), ‘प्रसक्ताः कामभोगेषु’ (१६।१६) आदि पदोंसे कहा है। अतः जो केवल भोग भोगना चाहते हैं, वे आसुरी सम्पत्तिवाले ही हैं।