श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1242, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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यशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं—‘देख दाऊ! यह कन्हैया बहुत भोला-भाला है, तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय।’ दाऊजी कहते हैं—‘मैया! यह कन्हैया बड़ा चंचल है। जंगलमें मेरे साथ चलते-चलते कोई साँपका बिल देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है, अब इसे कोई साँप काट ले तो?’ मैया कहती है—‘बेटा! अभी वह छोटा-सा अबोध बालक है, तू बड़ा है, इसलिये इसकी निगाह रखा कर।’ अब दाऊ भैया और सब ग्वाल-बाल कन्हैयाकी निगाह रखते हैं। ग्वाल-बालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है, तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा, जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटा-सा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगा?
एक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करते-करते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं, उनका इतना माधुर्य है, उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है, आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं—‘महाराज! उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है! कन्हैयाके पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहोसे देगा?’ इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैयाके पास न जाये। कन्हैयाके पास, उसकी शरणमें तो वही जाये, जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति, मौत आदिकी अवस्थामें भी ‘मेरी थोड़ी सहायता कर दो, रक्षा कर दो’ ऐसा भाव भी नहीं हो!
भगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं—
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥
(मानस २। १३१)
कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं—‘तुम्ह सन सहज सनेहु।’ जिसमें चाह नहीं है, वह भगवान्का खास घर है—‘सो राउर निज गेहु।’ यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथ ‘सहज’ स्नेह हो, स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय, वहाँ प्रेम कैसा? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई
कहती हैं—
मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां
दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः।
विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बविम्बे
धृतः समाकर्षति चित्तवितम्।।
‘अरे पथिको! उस गलीसे मत जाना, वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंगका एक नंग-धड़ंग बालक खड़ा है, वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमेंसे होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।’
वह जो काला-काला नंग-धड़ंग बालक खड़ा है न? उससे तुम लुट जाओगे, रीते रह जाओगे! वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत, पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके लिये ही चले गये! इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न? कृष्ण कहते हैं खींचने-वालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो, तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामके नहीं रहोगे, त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे!
‘नारायन’ बौरी भई डोलै, रही न काहू काम की।
जाहि लगन लगी घनस्याम की॥
हाँ, जो किसी कामका नहीं होता, वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उसको किसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।
शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता।
उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा, प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धंधा नहीं है, इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया, उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता, महान् छटपटाट होने लगती है—‘तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति’ (नारदभक्तिसूत्र १९)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा, तो वह इसे भी ठुकरा