श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1243, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
देगा। भागवतमें आया है—
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ-
स्मृतिरजितात्मसुरादिर्भिर्विभूष्यात् ।
न चलति भगवत्पदारविन्दा-
त्त्वनिनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रचः ॥
(श्रीमद्भ० ११।२।५३)
‘तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चरणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते, वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।’
न पारमेष्ट्यं न महेन्द्रधिण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत् ॥
(श्रीमद्भ० ११।१४।१४)
भगवान् कहते हैं कि ‘स्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य, पातालादि लोकोंका राज्य, योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।’
भरतजी कहते हैं—
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥
(मानस २।२०४)
परिशिष्ट भाव —भगवान्के साथ कर्मयोगीका ‘नित्य’ सम्बन्ध होता है, ज्ञानयोगीका ‘तात्त्विक’ सम्बन्ध होता है और शरणागत भक्तका ‘आत्मीय’ सम्बन्ध होता है। नित्य सम्बन्धमें संसारके अनित्य सम्बन्धका त्याग है, तात्त्विक सम्बन्धमें तत्त्वके साथ एकता (तत्त्वबोध) है और आत्मीय सम्बन्धमें भगवान्के साथ अभिन्नता (प्रेम) है। नित्य-सम्बन्धमें शान्तरस है, तात्त्विक सम्बन्धमें अखण्डरस है और आत्मीय सम्बन्धमें अनन्तरस है। अनन्तरसकी प्राप्ति हुए बिना जीवकी भूख सर्वथा नहीं मिटती। अनन्तरसकी प्राप्ति शरणागतिसे होती है। इसलिये शरणागति सर्वगृह्णात्म एवं सर्वश्रेष्ठ साधन है।
‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य’ पदका अर्थ ‘सम्पूर्ण धर्मोंका स्वरूपसे त्याग’ नहीं है, प्रत्युत ‘सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग’ है। तात्पर्य है कि किसी भी धर्म (कर्तव्य कर्म)-का आश्रय न हो। जैसे, पहले अध्यायमें आया है—‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ (१।३३)। वहाँ भी ‘प्राणांस्त्यक्त्वा’ का अर्थ ‘प्राणोंका त्याग’ न लेकर ‘प्राणोंके आश्रय (आशा)-का त्याग’ ही लिया जा सकता है; क्योंकि प्राणोंका त्याग करके कोई युद्धमें कैसे खड़ा होगा? असम्भव बात है। इसी तरह पहले अध्यायके नवें श्लोकमें आया है—‘अन्ये च बहवः शूरा मदर्थं त्यक्तजीविताः’ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि बहुत-से अन्य शूरवीर अपने जीवनका त्याग करके खड़े हैं। इसका अर्थ है कि वे शूरवीर अपने जीवनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् उनको अपने जीवनकी परवाह नहीं है। अतः यहाँ भी ‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य’ पदका अर्थ ‘धर्मोंके आश्रयका त्याग’ लेना चाहिये। जैसे शूरवीरोंको अपने प्राणोंकी अथवा अपने जीवनकी परवाह नहीं है, ऐसे ही भक्तको दूसरे धर्मोंकी परवाह नहीं है। उसकी दृष्टिमें दूसरे धर्मों (कर्तव्य कर्मों)-का महत्त्व नहीं है। कारण कि भगवान्की शरणागतिकी जितना महत्त्व है, उतना धर्मोंका महत्त्व नहीं है। धर्म (कर्तव्य-कर्म)-में जड़ताका और शरणागतिमें चिन्मयताका सम्बन्ध रहता है। कर्तव्य कर्म अपने वर्णाश्रमको लेकर होता है; अतः उसमें शरीरकी मुख्यता रहती है। परन्तु शरणागति स्वयंको लेकर होती है; अतः उसमें भगवान्की मुख्यता रहती है।
‘मामेकं शरणं व्रज’ का तात्पर्य है—बाहरसे (व्यवहारमें) सबके साथ प्रेम, आदर-सत्कारका व्यवहार करनेपर भी भीतरसे किसीकी गरज न हो, किसीका आश्रय न हो, केवल भगवान्का ही आश्रय हो—
यह बिनती रघुबीर गुसाई।
और आस-बिस्वास-भरोसो, हर्षी जीव-जड़ताई ॥
(विनय-पत्रिका १०३)
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥
(दोहावली २७७)
वास्तवमें पूर्ण शरणागति भगवान् ही प्रदान करते हैं। जैसे छोटा बालक अपना हाथ ऊँचा करता है तो माँ उसको उठा लेती है, ऐसे ही भक्त अपनी शक्तिसे भगवान्के सम्मुख होता है, शरणागतिकी तैयारी करता है तो भगवान् उसको पूर्ण शरणागति दे देते हैं।