श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1244, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६७ ]
- साधक-संजीवनी *
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अर्जुन पापोंसे छूटना चाहते थे, इसलिये भगवान्ने भी पापोंसे मुक्त करनेकी बात कही है; क्योंकि भगवान्का स्वभाव है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)। वास्तवमें केवल पापोंसे मुक्ति ही शरणागतिका फल नहीं है। अन्य शरणागतिसे मनुष्य भगवान्से अभिन्न होकर अनन्तरसको प्राप्त कर सकता है! इसलिये साधकको पापोंसे अथवा दुःखोंसे मुक्ति पानेकी इच्छा न रखकर केवल भगवान्के शरणागत हो जाना चाहिये। कुछ भी चाहनेसे कुछ (अन्तवाला) ही मिलता है, पर कुछ भी न चाहनेसे सब कुछ (अनन्त) मिलता है! भगवान् भी शरणागत भक्तके वशमें हो जाते हैं, उसके ऋणी हो जाते हैं।
यह शरणागति गीताका सार है, जिसको भगवान्ने विशेष कृपा करके कहा है। इस शरणागतिमें ही गीताके उपदेशकी पूर्णता होती है। इसके बिना गीता अधूरी रहती! इसलिये अर्जुनके द्वारा ‘करिष्ये वचनं तव’ कहकर पूर्ण शरणागति स्वीकार करनेपर फिर भगवान् नहीं बोले।
सम्बन्ध—अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करते हैं।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
| इदम् | = यह सर्वगुह्यतम | कदाचन | = कभी | कहना चाहिये |
|---|---|---|---|---|
| वचन | न | = नहीं कहना | च | |
| ते | = तुझे | चाहिये | यः | |
| अतपस्काय | = अतपस्वीको | च | = तथा | माम् |
| न | = नहीं | अशुश्रूषवे | = जो सुनना | अभ्यसूयति |
| (उसको भी) | ||||
| वाच्यम् | = कहना | नहीं | चाहता, | न |
| चाहिये; | चाहिये। | |||
| अभक्ताय | = अभक्तको | न | = (उसको) नहीं |
व्याख्या—‘इदं ते नातपस्काय’—पूर्वश्लोकमें आये ‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’—इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ ‘इदम्’ पद आया है।
अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय, विपरीत परिस्थिति आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम ‘तप’ है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होती। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है, उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।
जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है, वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है—
(१) द्रुन्द्रसहिष्णुता—राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि द्रुन्द्रोंसे रहित
हो जाना—‘ते द्रुन्द्रमोहनिर्मुक्ताः’ (गीता ७।२८); ‘द्रुन्दैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ज्ञैः’ (गीता १५।५)।
(२) वेगसहिष्णुता—काम, क्रोध, लोभ, द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना—‘कामक्रोधोद्भव वेगम्’ (गीता ५।२३)।
(३) परमतसहिष्णुता—दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्भिन्न न होना*—‘एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति’ (गीता ५।५)।
(४) परोल्लक्षसहिष्णुता—अपनेमें योग्यता, अधिकार, पद, त्याग, तपस्या आदिकी कमी है, तो भी दूसरोंकी योग्यता, अधिकार आदिकी प्रशंसा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना—‘विमत्सरः’ (गीता ४।२२); ‘हर्षामर्षभयोद्भोगैर्मुक्तः’ (गीता १२।१५)।
- आपसमें मतभेद होना और अपने मतके अनुसार साधन करके जीवन बनाना दोष नहीं है, प्रत्युत दूसरोंका मत बुरा लगना, उनके मतका खण्डन करना, उनके मतसे घृणा करना ही दोष है।