श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों, वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों, वही अतपस्वी है।
ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है कि 'सम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अन्यभावसे मेरी शरण आ जा'—इस बातको सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय, तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा, जिससे उसका पतन हो जायगा।
दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों, आचरणों, भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है, वह यदि मेरी 'तू मेरी शरणमें आ जा, तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर'—इन बातोंको सुनेगा तो 'मैं चिन्ता क्यों करूँ? चिन्ता भगवान् करेगे' ऐसा उलटा समझकर दुर्गुण-दुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।
'नाभक्ताय कदाचन '—जो भक्तिसे रहित है, जिसका भगवान्पर भरोसा, श्रद्धा-विश्वास नहीं है, उसको भी यह बात मत कहना; क्योंकि श्रद्धा-विश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है कि 'भगवान् तो आत्मश्लाधी हैं, स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है, वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा? उसके शरण होनेसे क्या लाभ?' आदि-आदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे अभक्तको कभी मत कहना।
'न चाशुश्रूषवे वाच्यम् '—जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता, इसकी उपेक्षा करता है, उसको भी कभी मत
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अभक्तको और दोषदृष्टिवालेको सर्वगुह्यतम वचन न कहनेपर विशेष जोर दिया है। अभक्त और दोषदृष्टिवालेको कहनेमें जितना दोष है, उतना दोष अतपस्वी और सुनना न चाहनेवालेको कहनेमें नहीं है; क्योंकि अभक्त और दोषदृष्टिवालेमें विपरीत बुद्धि है।
'अभक्त ' का अर्थ है—भक्तिका विरोधी। जिसमें भक्तिका अभाव है, उसको यहाँ 'अभक्त' नहीं कहा गया है। जो भक्त है, उसमें भी बेसमझीसे असूया-दोष आ सकता है, पर भक्तिके कारण वह दोष स्वतः मिट जाता है।
'अशुश्रूषवे ' का अर्थ है—जो अहंकारके कारण नहीं सुनना चाहता। जो बेसमझीसे नहीं सुनना चाहता, उसको यहाँ 'अशुश्रूषवे' नहीं कहा गया है।
१-असहिष्णुता और असूयामें थोड़ा अन्तर है। दूसरोंकी विशेषताको न सहना 'असहिष्णुता' है और दूसरोंके गुणोंमें दोष देखना 'असूया' है।
२-श्रद्धा होनेपर भी साथमें असूया-दोष रह सकता है, इसीलिये भगवान्ने श्रद्धाके साथ-साथ असूया-दोषसे रहित होनेकी बात भी कही है—'श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तः' (गीता ३।३१), 'श्रद्धावानसूयश्च' (गीता १८।७१)।
सुनाना; क्योंकि बिना रुचिके, जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा, उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा, उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत सुनाना।
'न च मां योऽभ्यसूयति '—जो गुणोंमें दोषारोपण करता है, उसको भी मत सुनाना; क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।
दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वंचित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है।
इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता—तीसरे अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें) जहाँ अपना मत बताया, वहाँ
'श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः ' पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कभीसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (इसी अध्यायके इकहत्तरवें श्लोक)-में भी 'श्रद्धावानसूयश्च' पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुनेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।
इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना—यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वंचित रखना नहीं है, प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं), भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय, इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है।