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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1247

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृतमः ।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६१ ॥

तस्मात्= उसके समान= नहीं हैअन्यः= दूसरा
मे= मेरा= औरकोई
प्रियकृतमः= अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवालाभुवि= इस भूमण्डलपरप्रियतरः= प्रियतर
मनुष्येषु= मनुष्योंमेंतस्मात्= उसके समानभविता= होगा
कश्चित्= कोई भीमे= मेरा= भी
= नहीं ।

व्याख्या— ‘न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रिय-कृतमः’—‘जो अपनेमें लौकिक-पारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता, लिप्सा, आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है, वह पराभक्ति (इसी अध्यायका अड़सठवाँ श्लोक)—के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत वही आ सकता है, जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किंचिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति, भगवद्दर्शन, भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मान-बड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं; क्योंकि मान-बड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।

भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही ‘तस्मात्’ पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृतम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है; क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।

‘प्रियकृतमः’ पदमें जो ‘कृत’ पद आया है, उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है; केवल भगवत्प्रतीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृतम—भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।

मनुष्योंमें प्रियकृतम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी, बहादुरीकी बात नहीं है। देवता, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है; परन्तु कामनाका त्याग

करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें, परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।

‘भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि’—जिसमें अपनी मान-बड़ाईकी वासना है, कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृतमके समान) नहीं बना है; परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना, गीता कण्ठस्थ करवाना, गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है, उसके समान पृथ्वी-मण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।

अपने धर्म, सम्प्रदाय, सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है, पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।

भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसी-ऐसी विलक्षण, सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं, जिनको मनुष्य-मात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है, ऐसा मनुष्य हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो; किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो; अपनी रूचिके अनुसार किसी भी शैली, उपाय, सिद्धान्त, साधनको माननेवाला क्यों न हो, वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर, पक्षपात-विषमताको छोड़कर, किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके, मनमें किसी भी लौकिक-पारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर, अपना