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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1248

श्लोक ७० ]

  • साधक-संजीवनी *

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सम्प्रदाय, अपनी टोली बनानेका उद्देश्य न रखकर, केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ, निष्कामभावपूर्वक पालन करता है), तो वह भी जीविका-सम्बन्धी और खाना-पीना, सोना-जागना आदि शरीर-सम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है, महान् आनन्द, महान् सुखको (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक) प्राप्त कर सकता है।

गीता वेश, आश्रम, अवस्था, क्रिया आदिका परिवर्तन

परिशिष्ट भाव —गीताकी शिक्षासे मनुष्यमात्रका प्रत्येक परिस्थितिमें सुगमतासे कल्याण हो सकता है, इसलिये भगवान् इसके प्रचारकी विशेष महिमा कहते हैं। गीताने युद्ध-जैसी परिस्थितिमें भी कल्याण होनेकी बात कही है—‘सुखदुःखे समे कृत्वा०’ (२।३८), ‘यत्करोषि यदश्नासि०’ (९।२७), ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य०’ (१८।४६) आदि। जब युद्ध-जैसी परिस्थिति (घोर कर्म)—में भी कल्याण हो सकता है, तो फिर अन्य परिस्थितिमें कैसे नहीं होगा? जो मनुष्य भगवान्का प्यारा हो जाता है, उसको कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योग प्राप्त हो जाते हैं।

सम्बन्ध—जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है, वह क्या करे? इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥

यः= जो मनुष्यअध्येष्यते= अध्ययन करेगा,इष्टः= पूजित
आवयोः= हम दोनोंकेतेन= उसके द्वारास्याम्= होऊँगा—
इमम्= इस= भीइति= ऐसा
धर्म्यम्= धर्ममयअहम्= मैंमे= मेरा
संवादम्= संवादकाज्ञानयज्ञेन= ज्ञानयज्ञसेमतिः= मत है।

व्याख्या —‘अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवाद-मावयोः’—तुम्हारा और हमार यह संवाद शास्त्रों, सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारे-हमारे बहुत वर्ष बीत गये; परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ! ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण, अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है।

जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो, वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो, तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है, जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता, बिना समाधानके और कोई

करनेके लिये नहीं कहती, प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा, उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी, शंकाओंका समाधान होगा, साधनकी उलझनें सुलझेंगी, पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी, जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा; क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं, प्रसन्न होते हैं।

सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि किंचिन्मात्र भी अच्छी नहीं लगती, एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है, एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है, तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है, वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है, प्रार्थना करता है, शरण हो जाता है, शिष्य हो जाता है।

पूछनेवालेके मनमें जैसी-जैसी उत्कण्ठा बढ़ती है, कहनेवालेके मनमें वैसी-वैसी बड़ी विचित्रता और विलक्षणतासे समाधान करनेवाली बातें पैदा होती हैं। जैसे दूध पीनेके समय बछड़ा जब गायके थनोंपर मुँहसे बार-बार धक्का मारता है और थनोंसे दूध खींचता है, तब गायके शरीरमें रहनेवाला दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें