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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बार-बार प्रश्न करता है, तब कहनेवालेके मनमें नये-नये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्यों-ज्यों नयी बातें मिलती हैं, त्यों-त्यों उसमें सुननेकी नयी-नयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता—इन दोनोंका संवाद बढ़िया होता है।

अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक ‘स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ’’ (२।५४)—यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया, वहीसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है, जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकर-से-भयंकर परिस्थितियों में भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं, प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे; क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्यों-ज्यों त्याग होता जायगा, त्यों-त्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय—दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी है और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, प्राणायाम आदिकी विलक्षण-विलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है।

‘अध्येष्यते’ का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्यों-ज्यों पढ़ेगा, पाठ करेगा, याद करेगा, उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा, त्यों-ही-त्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्यों-ज्यों समझेगा, त्यों-त्यों उसकी शंकाका समाधान होगा। ज्यों-ज्यों समाधान होगा, त्यों-त्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्यों-ज्यों रुचि अधिक पैदा होगी, त्यों-त्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें, क्रियाओंमें, बर्तावोंमें आने

लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा, उसका जीवन गीतारूपी सौंचमें ढल जायगा अर्थात् वह चलती-फिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी; जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है*।

‘ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम्’—यज्ञ दो प्रकारके होते हैं—द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है, वह ‘द्रव्ययज्ञ’ कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं, विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है, उनपर गहरा विचार किया जाता है, विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है, वह ‘ज्ञानयज्ञ’ कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारे-हमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये, उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है, ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे, अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी, उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ, अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ, अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।

‘इति मे मतिः’—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ; क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ—‘मया तत्तमिदं सर्वम्’ (गीता १।४) और सब जगह ही मेरे कान हैं—‘सर्वतः-श्रुतिमल्लोके’ (गीता १३।१३)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान, प्रेम, दया आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है—ऐसी बात नहीं है, वह तो पाठ करता है; परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है।

  • जानि लखन सम देहि असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥

निरिख निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥ (मानस २।१९६।३)

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