श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बार-बार प्रश्न करता है, तब कहनेवालेके मनमें नये-नये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्यों-ज्यों नयी बातें मिलती हैं, त्यों-त्यों उसमें सुननेकी नयी-नयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता—इन दोनोंका संवाद बढ़िया होता है।
अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक ‘स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ’’ (२।५४)—यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया, वहीसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है, जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकर-से-भयंकर परिस्थितियों में भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं, प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे; क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्यों-ज्यों त्याग होता जायगा, त्यों-त्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय—दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी है और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, प्राणायाम आदिकी विलक्षण-विलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है।
‘अध्येष्यते’ का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्यों-ज्यों पढ़ेगा, पाठ करेगा, याद करेगा, उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा, त्यों-ही-त्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्यों-ज्यों समझेगा, त्यों-त्यों उसकी शंकाका समाधान होगा। ज्यों-ज्यों समाधान होगा, त्यों-त्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्यों-ज्यों रुचि अधिक पैदा होगी, त्यों-त्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें, क्रियाओंमें, बर्तावोंमें आने
लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा, उसका जीवन गीतारूपी सौंचमें ढल जायगा अर्थात् वह चलती-फिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी; जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है*।
‘ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम्’—यज्ञ दो प्रकारके होते हैं—द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है, वह ‘द्रव्ययज्ञ’ कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं, विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है, उनपर गहरा विचार किया जाता है, विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है, वह ‘ज्ञानयज्ञ’ कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारे-हमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये, उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है, ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे, अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी, उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ, अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ, अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।
‘इति मे मतिः’—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ; क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ—‘मया तत्तमिदं सर्वम्’ (गीता १।४) और सब जगह ही मेरे कान हैं—‘सर्वतः-श्रुतिमल्लोके’ (गीता १३।१३)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान, प्रेम, दया आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है—ऐसी बात नहीं है, वह तो पाठ करता है; परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है।
- जानि लखन सम देहि असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥
निरिख निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥ (मानस २।१९६।३)
श्लोक ७१ ]
- साधक-संजीवनी *
१२४९
दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता, केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुए गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठी-मीठी स्मृति बार-बार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है, ऐसा मैं मान लेता हूँ।
विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुत-से लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दस-पन्द्रह मिनटका एक बहुत बढ़िया व्याख्यान सिखाया। साथ ही दंगसे उठना, बैठना, खड़े होना, इधर-उधर ऐसा-ऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जोंकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायें-बायें देखने लगा और बोलनेकी जैसी-जैसी रिवाज है, वैसे-वैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था, उसको
परिशिष्ट भाव —भगवान् ज्ञानयज्ञको द्रव्यमय यज्ञसे भी श्रेष्ठ मानते हैं—‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप’ (गीता ४।३३)। जब गीताके अध्ययनका ही इतना माहात्म्य है तो फिर उसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या?
सम्बन्ध —जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके, वह क्या करे? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभौल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्म्मणाम् ॥ ७१ ॥
| श्रद्धावान् | = श्रद्धावान् | नरः | = मनुष्य (इस गीता-ग्रन्थको) | मुक्तः | = शरीर छूटनेपर |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | शृणुयात्, अपि | = सुन भी लेगा, | पुण्यकर्म्मणाम् | = पुण्यकारियोंके |
| अनसूयः | = दोषपूर्वितसे रहित | सः | = वह | शुभान् | = शुभ |
| यः | = जो | अपि | = भी | लोकान् | = लोकोंको |
| प्राप्नुयात् | = प्राप्त हो जायगा। |
- गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै ॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।
गोपाला गोपिका वापि नारदोद्भवपार्षदैः। सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥
यत्र गीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम्। तत्राहं निश्चितं पृथिवि निवसामि संदेव हि ॥
१२५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
व्याख्या —‘श्रद्धावाननसूयश्च ..... पुण्य-कर्मणाम्’—गीताकी बातोंको जैसा सुन ले, उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसा-का-वैसा मानने-वालेका नाम ‘श्रद्धावान्’ है और उन बातोंमें कहीं भी, किसी भी विषयमें किंचिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम ‘अनसूयः’ है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो वह भी शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोको प्राप्त कर लेता है।
यहाँ दो बार ‘अपि’ पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है, अध्ययन करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है! पर जो सुन भी लेता है, वह मनुष्य भी शरीर छूटनेपर शुभ लोकोको प्राप्त हो जाता है।
मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम, प्रमाद, लिप्सा और करणापाटव—ये चार दोष होते हैं*। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता; क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये, विचारद्वारा कोई बात न जँचें, तो समझना चाहिये कि इस विषयकी समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ—इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूया-दोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूया-दोष नहीं रहता।
चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था, गदगद हो जाता था और राने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य
परिशिष्ट भाव —‘शुभौल्लोकान्प्राप्नुयात्युण्यकर्मणाम्’—श्रद्धा-भक्तिके तारतम्यसे गीताको सुननेमें तारतम्य रहता है और सुननेके तारतम्यसे श्रोताका स्वर्गादि लोकोसे लेकर भगवल्लोकतक अधिकार हो जाता है अर्थात् अधिक श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह भगवान्के धामको प्राप्त हो जायगा और कम श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह अन्य लोकोको प्राप्त हो जायगा। गीताके अध्ययन और श्रवणकी तो बात ही क्या है, गीताको रखनेमात्रका भी बड़ा माहात्म्य है! एक सिपाही था।
- (१) वक्ता जिस विषयका प्रतिपादन करता है, उस विषयमें वह बिलकुल निःसन्देह न हो, इसे ‘भ्रम’ कहते हैं; (२) वक्ता विवेचनमें आलय्य, उपेक्षा, उदासीनता, तत्पराताकी कमी, लोग समझें या न समझें—इसकी बेपरवाह करता है, इसे ‘प्रमाद’ कहते हैं; (३) वक्ताकी रुपये-पैसे, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार, सुख-आराम आदि लौकिक-पारलौकिक कुछ भी पानेकी इच्छा है, इसे ‘लिप्सा’ कहते हैं और (४) वक्ता जिन इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, वाणी आदिसे अपने भाव प्रकट करता है, उन करणोंमें पटुता, कुशलता नहीं है और वह श्रोताकी भाषा, भाव, योग्यताको नहीं जानता, इसे ‘करणापाटव’ कहते हैं।
महाप्रभुसे शिकायत कर दी कि ‘देखिये प्रभु! वह बड़ा पाखण्ड करता है; पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है।’ चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा—‘तुम गीताका पाठ करते हो, तो क्या उसका अर्थ जानते हो!’ उसने कहा—‘नहीं प्रभु!’ फिर पूछा—‘तो फिर तुम रोते क्यों हो!’ उसने कहा—‘मैं जब ‘अर्जुन उवाच’ पढ़ता हूँ; तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं—‘ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं ‘श्रीभगवान्वाच’ पढ़ता हूँ, तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं—ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है—ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है; परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं, यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन कर-करके राजी होता हूँ।’ उसकी ऐसी श्रद्धा-भक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धा-भक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोको प्राप्त हो जाता है।
यहाँ ‘पुण्यकर्मणाम्’ पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ, अनुष्ठान आदि पुण्य-कर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है, प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बार-बार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता—नवै अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये, जिनको भगवान्का प्रेम, दर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपने-अपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक, कैलास आदि जिन दिव्य लोकोकी प्राप्ति होती है, असूया-दोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोकी प्राप्ति हो जाती है।
श्लोक ७२ ]
- साधक-संजीवनी *
१२५१
वह रातके समय कहींसे अपने घर आ रहा था। रास्तेमें उसने चन्द्रमाके प्रकाशमें एक वृक्षके नीचे एक सुन्दर स्त्री देखी। उसने उस स्त्रीसे बातचीत की तो उस स्त्रीने कहा—मैं आ जाऊँ क्या? सिपाहीने कहा—हाँ, आ जा। सिपाहीके ऐसा कहनेपर वह स्त्री, जो वास्तवमें चुड़ैल थी, उसके पीछे आ गयी। अब वह रोज रातमें उस सिपाहीके पास आती, उसके साथ सोती, उसका संग करती और सबेरे चली जाती। इस तरह वह उस सिपाहीका शोषण करने लगी अर्थात् उसका खून चूसकर उसकी शक्ति क्षीण करने लगी। एक बार रातमें वे दोनों लेट गये, पर बत्ती जलती रह गयी तो सिपाहीने उससे कहा कि तू बत्ती बन्द कर दे। उसने लेटे-लेटे ही अपना हाथ लम्बा करके बत्ती बन्द कर दी। अब सिपाहीको पता लगा कि यह कोई सामान्य स्त्री नहीं है, यह तो चुड़ैल है! वह बहुत घबराया। चुड़ैलने उसको धमकी दी कि अगर तू किसीको मेरे बारेमें बतायेगा तो मैं तेरेको मार डालूँगी। इस तरह वह रोज रातमें आती और सबेरे चली जाती। सिपाहीका शरीर दिन-प्रतिदिन सूखता जा रहा था। लोग उससे पूछते कि भैया! तुम इतने क्यों सूखते जा रहे हो? क्या बात है, बताओ तो सही! परन्तु चुड़ैलके डरके मारे वह किसीको कुछ बताता नहीं था। एक दिन वह दुकानसे दवाई लाने गया। दुकानदारने दवाईकी पुड़िया बाँधकर दे दी। सिपाही उस पुड़ियाको जेबमें डालकर घर चला आया। रातके समय जब वह चुड़ैल आयी, तब वह दूसरे ही खड़े-खड़े बोली कि तेरी जेबमें जो पुड़िया है, उसको निकालकर फेंक दे। सिपाहीको विश्वास हो गया कि इस पुड़ियामें जरूर कुछ करामात है, तभी तो आज यह चुड़ैल मेरे पास नहीं आ रही है! सिपाहीने उससे कहा कि मैं पुड़िया नहीं फेंकूँगा। चुड़ैलने बहुत कहा, पर सिपाहीने उसकी बात मानी नहीं। जब चुड़ैलका उसपर वश नहीं चला, तब वह चली गयी। सिपाहीने जेबमेंसे पुड़ियाको निकालकर देखा तो वह गीताका फटा हुआ पन्ना था! इस तरह गीताका प्रभाव देखकर वह सिपाही हर समय अपनी जेबमें गीता रखने लगा। वह चुड़ैल फिर कभी उसके पास नहीं आयी।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है, क्या दशा है, आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीता-श्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | चेतसा | = चित्तसे | कच्चित् | = क्या |
|---|---|---|---|---|---|
| कच्चित् | = क्या | एतत् | = इसको | ते | = तुम्हारा |
| त्वया | = तुमने | श्रुतम् | = सुना ? (और) | अज्ञानसम्मोहः | = अज्ञानसे उत्पन्न मोह |
| एकाग्रेण | = एकाग्र- | धनञ्जय | = हे धनञ्जय! | प्रनष्टः | = नष्ट हुआ ? |
व्याख्या—‘कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा’—‘एतत्’ शब्द अत्यन्त समीपका वाचक होता है और यहाँ अत्यन्त समीप इकहत्तरवाँ श्लोक है। उनहत्तरवें-सत्तरवें श्लोकोंमें जो गीताका प्रचार और अध्ययन करनेवालेकी मेहिमा कही है, उस प्रचार और अध्ययनका तो अर्जुनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं था। इसलिये पीछेके (इकहत्तरवें) श्लोकका लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि ‘मनुष्य ब्रह्मापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुने’—यह बात तुमने ध्यानपूर्वक सुनी कि नहीं? अर्थात् तुमने ब्रह्मापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुनी कि नहीं? ‘एकाग्रेण चेतसा’ कहनेका तात्पर्य है कि गीतामें भी
जिस अत्यन्त गोपनीय रहस्यको अभी पहले चौंसठवें श्लोकमें कहनेकी प्रतिज्ञा की, सड़सठवें श्लोकमें ‘इदं ते नातपस्काय’ कहकर निषेध किया और मेरे वचनोंमें जिसको मैंने परम वचन कहा, उस सर्वगुह्यतम शरणगतिकी बात (छाछठवाँ श्लोक)—को तुमने ध्यानपूर्वक सुना कि नहीं? उसपर खयाल किया कि नहीं? ‘कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय’—भगवान् दूसरा प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं? अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रतासे सुना ही नहीं;
१२५२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८
क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टि से रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है, उसका मोह नष्ट हो ही जाता है।
'पार्थ' सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे, बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं? पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये 'पार्थ' सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये इकट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो
कौटुम्बिक मोह है, वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय, जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् 'पार्थ' सम्बोधन देते हैं।
'धनंजय' सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनंजय (राजाओंके धनको जीतनेवाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमें 'धनंजय' बन जाओ।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं।
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
अर्जुन बोले—
अच्युत = हे अच्युत! मया = मैंने स्थितः = स्थित
त्वत्प्रसादात् = आपकी कृपासे स्मृतिः = स्मृति अस्मि = हूँ।
(मेरा) लब्धा = प्राप्त कर तव = (अब मैं)
मोहः = मोह ली है। आपकी
नष्टः = नष्ट हो गया गतसन्देहः = (मैं) सन्देहरहित वचनम् = आज्ञाका
है (और) होकर करिष्ये = पालन करूँगा।
व्याख्या—'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत'—अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये 'अच्युत' सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है; परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार 'अच्युत' सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें) 'अच्युत' सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। दूसरी बार (ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुति-प्रार्थना की, तो भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (तिहत्तरवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुन सन्देहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी
आज्ञाका पालन करूँगा, तो भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि, मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ हुईं, पर भगवान्की आदि, मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे।
दूसरे अध्यायमें अर्जुनने 'शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्' (२।७) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है।
दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कि 'तेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है, मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ!' इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी कि 'मेरा मोह चला गया'—'मोहोऽयं विगतो मम' (११।१)।
श्लोक ७३ ]
- साधक-संजीवनी *
१२५३
परन्तु भगवान्के विराट् रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी, तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढभाव है, तुम व्यथित और मोहित मत होओ—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावः’ (११।४९)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’। अन्तःकरणकी स्मृति और तत्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सब-का-सब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है।
प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं; कई प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति, अनुपलब्धि और ऐतिह्य—ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं; परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं; परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता, वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है।
अब इस ‘स्मृति’ शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है, वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं—
१-यहाँ अर्जुनका सांसारिक (गीता—दूसरे अध्यायका बावनवाँ श्लोक) और शास्त्रीय (गीता—दूसरे अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक) —दोनों प्रकारका मोह नष्ट हुआ है।
२-हमें जो संसारका ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके द्वारा ही होता है; क्योंकि संसार विवेक-विचारका विषय है। परन्तु जो विवेक-विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत विवेक-विचारका प्रकाशक है, उसको विवेक-विचारद्वारा नहीं जान सकते। कारण कि जो वस्तु प्रकाश्य होती है, वह प्रकाशकको प्रकाशित करनेमें असमर्थ होती है। इसलिये जो सबका प्रकाशक और आश्रय है, वह परमात्मतत्त्व श्रद्धा-विशवासका विषय है, विचारका नहीं।
जिन लोगोंकी शास्त्रीय श्रद्धा होती है, वे शास्त्रोंसे परमात्माको मान लेते हैं अथवा जिनकी तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त अनुभववी भगवत्प्रेमी सन्त-महापुरुषोंपर श्रद्धा होती है, वे उनके वचनोंसे परमात्माको मान लेते हैं, स्वीकार कर लेते हैं। इसमें उनका अन्तःकरण और इन्द्रियों प्रमाण नहीं हैं। इसमें तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण हैं। जो श्रद्धालु और आस्तिक हैं, उनके लिये तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष प्रमाण हो सकते हैं, पर जो अश्रद्धालु और नास्तिक हैं, उनके लिये शास्त्र और सन्त-महापुरुष प्रमाण नहीं हो सकते। तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियों और अन्तःकरणका जो विषय है, वह तो प्रत्यक्ष-प्रमाण है और अनुमान आदि जो प्रमाण हैं, वे प्रत्यक्षमूलक युक्ति-प्रमाण हैं। परन्तु सन्त-महापुरुष और शास्त्र-प्रमाणमें तो केवल श्रद्धा ही मुख्य हेतु है।
३-जिससे जाना जाता है, वह ‘प्रमाण’ होता है; जिसका ज्ञान होता है, वह ‘प्रमेय’ होता है और जो जाननेवाला है, वह ‘प्रमाता’ होता है अर्थात् इन्द्रियाँ एवं अन्तःकरण ‘प्रमाण’ हैं, संसार ‘प्रमेय’ है और स्वयं (चेतन) ‘प्रमाता’ है।
(१) अनुभूतविषयसाम्प्रमोषः स्मृतिः।
(योगदर्शन १।११)
‘अनुभूत विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है।’
(२) संस्कारमात्रजन्म ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह)
‘संस्कारमात्रसे जन्म हो और ज्ञान हो, उसको स्मृति कहते हैं।’
यह स्मृति अन्तःकरणकी एक ‘वृत्ति’ है। यह वृत्ति प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं—किलष्ट और अकिलष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृति ‘किलष्ट’ होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृति ‘अकिलष्ट’ होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारण ‘अविद्या’ है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृति ‘स्वयं’ से ही होती है, वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती, जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति—दोनों होती हैं।
परमात्मतत्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है, तब इसको ‘स्मृतिर्लब्धा’ कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी, वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है—इन दोनोंमें महान् अन्तर है, ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृति-विस्मृति दोनों ही मुर्दकी तरह जड़ हैं, पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है, जड़ नहीं। केवल जड़का आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे ‘स्मृतिलब्धा’ कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है, उसका प्रकट होना ‘स्मृति’ है और आवरण हटनेका नाम ‘लब्धा’ है।
साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं—(१) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति, (२) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (३) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है; क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं, तब ये साधन कहलाते हैं; परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है, अभाव नहीं हुआ है।
असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ—यह ‘कर्मयोग’ की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ—यह ‘ज्ञान-योग’ की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया—यह ‘भक्तियोग’ की विस्मृति है।
स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँ ‘स्मृति’ है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है, प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है; क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है; क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है।
इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझना ‘विस्मृति’ है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करना ‘स्मृति’ है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती; जैसे—
मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान होता है, उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है, वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है।
स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया, तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालन-पोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है, तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अब ‘मैं कुन्तीका पुत्र हूँ’—ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा? कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा? कितना जोर आया? पहले उधर लक्ष्य नहीं था, अब उधर लक्ष्य हो गया—केवल इतनी ही बात है।
स्वरूप निष्काम है, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम, बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी, जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वार अपने-आपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जड़ताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता, जबकि स्वरूपके साथ जड़ताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है, अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती।
स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—‘करिष्ये वचनं तव’, ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे कि ‘हे नाथ! अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।’
तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधकोंकी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपार-अटूट-अखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है।
श्लोक ७३ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘त्वत्प्रसादात् मयाच्युत’ पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया, उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था, आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है, यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है, प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ, तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये, वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ; परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये, वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (इसी अध्यायका चौंसठवाँ, पैंसठवाँ, छाछठवाँ श्लोक)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।
‘स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव’—अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (‘न चैतद्विद्यः कतरनो गरीयः’ २।६), वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें, वैसा मैं करूँ अर्थात् अब तो बस, आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—‘करिष्ये वचनं तव।’ अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किंचिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्य-कर्म होगा, वह करूँगा।
अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति, आसक्तिसे कामना, कामनासे क्रोध, क्रोधसे मोह, मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है, वह स्मृति मिल गयी है—‘नष्टो मोहः
स्मृतिर्लब्धा।’ स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है, इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है—‘गतसन्देहः।’ बुद्धिनाशसे पतन होता है, उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ—‘स्थितोऽस्मि।’ इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है, तभी तो आपने सम्मोहका कहीं प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहीं कही है, वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है।
यद्यपि वहाँका और यहाँका—दोनोंका विषय भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है; क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है, फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है।
दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है; क्योंकि यह आसुरी-सम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है; क्योंकि यह दैवी-सम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है।
भगवत्कृपासे जो काम होता है, वह श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है, उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है।
मार्मिक बात
अर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी—‘स्मृतिर्लब्धा।’ तो विस्मृति किसी कारणसे हुई? जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली, इसीसे अपने सत्-स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीकी अपनी कमी मान ली, अपनेको शरीर
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
मानने (मैं-पन) तथा शरीरको अपना मानने (मेरापन-) के कारण इसने असत् शरीरकी उत्पत्ति और विनाशको अपनी उत्पत्ति और विनाश मान लिया एवं जिससे शरीर पैदा हुआ, उसीको अपना उत्पादक मान लिया!
अब कोई प्रश्न करे कि भूल पहले हुई कि असत्का सम्बन्ध पहले हुआ? अर्थात् भूलसे असत्का सम्बन्ध हुआ कि असत्के सम्बन्धसे भूल हुई? तो इसका उत्तर है कि अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए जीवको जन्म-मरणसे छुड़ाकर सदाके लिये महान् सुखी करनेके लिये अर्थात् केवल अपनी प्राप्ति करानेके लिये भगवान्ने जीवको मनुष्य-शरीर दिया। भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा—‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक १।४।३), इसलिये उन्होंने अपने साथ खेलनेके लिये मनुष्यशरीरकी रचना की। खेल तभी होता है, जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र होते हैं। अतः भगवान्ने मनुष्यशरीर देनेके साथ-साथ इसे स्वतन्त्रता भी दी और विवेक (सत्-असत्का ज्ञान) भी दिया। दूसरी बात, अगर इसे स्वतन्त्रता और विवेक न मिलता, तो यह पशुकी तरह ही होता, इसमें मनुष्यताकी किंचिन्मात्र भी कोई विशेषता नहीं होती। इस विवेकके कारण असत्को असत् जानकर भी मनुष्यने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया और असत्में (संसारके भोग और संग्रहके सुखमें) आसक्त हो गया। असत्में आसक्त होनेसे ही भूल हुई है।
असत्को असत् जानकर भी यह उसमें आसक्त क्यों होता है? कारण कि असत्के सम्बन्धसे प्रतीत होनेवाले तात्कालिक सुखकी तरफ तो यह दृष्टि रखता है, पर उसका परिणाम क्या होगा, उस तरफ अपनी दृष्टि रखता ही नहीं। (जो परिणामकी तरफ दृष्टि रखते हैं, साधक होते हैं और जो परिणामकी तरफ दृष्टि नहीं रखते, वे संसारी होते हैं।) इसलिये असत्के सम्बन्धसे ही भूल पैदा हुई है। इसका पता कैसे लगता है? जब यह अपने अनुभवमें आनेवाले असत्की आसक्तिका त्याग करके परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब यह भूल मिट करके स्मृति जाग्रत् हो जाती है, इससे सिद्ध हुआ कि परमात्मासे विमुख होकर जाने हुए असत्में आसक्ति होनेसे ही यह भूल हुई है।
परिशिष्ट भाव —लौकिक स्मृति तो विस्मृतिकी अपेक्षासे कही जाती है, पर अलौकिक तत्त्वकी स्मृति विस्मृतिकी अपेक्षासे नहीं है, प्रत्युत अनुभवरूप है। इस तत्त्वकी निरपेक्ष स्मृति अर्थात् अनुभवको ही यहाँ ‘स्मृतिर्लब्धा’ कहा गया है।
असत्को महत्त्व देनेसे होनेवाली भूल स्वाभाविक नहीं है। इसको मनुष्यने खुद पैदा किया है। जो चीज स्वाभाविक होती है, उसमें परिवर्तन भले ही हो, पर उसका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु भूलका अत्यन्त अभाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस भूलको मनुष्यने खुद उत्पन्न किया है; क्योंकि जो वस्तु मिटनेवाली होती है, वह उत्पन्न होनेवाली ही होती है। इसलिये इस भूलको मिटानेका दायित्व भी मनुष्यपर ही है, जिसको वह सुगमतापूर्वक मिटा सकता है। तात्पर्य है कि अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई इस भूलको मिटानेमें मनुष्यमात्र समर्थ और सबल है। भूलको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने पूरी दे रखी है। भूल मिटते ही अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति अपने-आपमें ही जाग्रत् हो जाती है और मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है।
अबतक मनुष्यने अनेक बार जन्म लिया है और अनेक बार कई वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों, अवस्थाओं, घटनाओं आदिका मनुष्यको संयोग हुआ है; परन्तु उन सभीका उससे वियोग हो गया और वह स्वयं वही रहा। कारण कि वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है, पर संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है। इससे सिद्ध हुआ कि संसारसे वियोग-ही-वियोग है, संयोग है ही नहीं। अनादिकालसे वस्तुओं आदिका निरन्तर वियोग ही होता चला आ रहा है, इसलिये वियोग ही सच्चा है। इस प्रकार संसारसे सर्वथा वियोगका अनुभव हो जाना ही ‘योग’ है—‘तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्’ (गीता ६।२३)। यह योग नित्यसिद्ध है। स्वरूप अथवा परमात्माके साथ हमारा नित्ययोग है* और शरीर-संसारके साथ नित्यवियोग है। संसारके संयोगकी सद्भावना होनेसे ही वास्तवमें नित्ययोग अनुभवमें नहीं आता। सद्भावना मिटते ही नित्ययोगका अनुभव हो जाता है, जिसका कभी वियोग हुआ ही नहीं।
संसारसे संयोग मानना ही ‘विस्मृति’ है और संसारसे नित्यवियोगका अनुभव होना अर्थात् वास्तवमें संसारके साथ मेरा संयोग था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं—ऐसा अनुभव होना ही ‘स्मृति’ है।
- कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें स्वरूपके साथ नित्ययोग है और भक्तियोगमें भगवान्के साथ नित्ययोग है।
श्लोक ७३ ]
- साधक-संजीवनी *
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वास्तवमें तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती, प्रत्युत विमुखता होती है। तात्पर्य है कि पहले ज्ञान था, फिर उसकी विस्मृति हो गयी—इस तरह तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती। अगर ऐसी विस्मृति मानें तो स्मृति होनेके बाद फिर विस्मृति हो जायगी! इसलिये गीतामें आया है—‘यज्ञात्मा न पुनर्मोहम् ’ (४।३५) अर्थात् उसको जान लेनेके बाद फिर मोह नहीं होता। अभावरूप असत्को भावरूप मानकर महत्त्व देनेसे तत्त्वकी तरफसे वृत्ति हट गयी—इसीको विस्मृति कहते हैं। वृत्तिका हटना और वृत्तिका लगना—यह भी साधककी दृष्टिसे है, तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं। तत्त्वकी तरफसे वृत्ति हटनेपर अथवा विमुखता होनेपर भी तत्त्व ज्यों-का-त्यों ही है। अभावरूप असत्को अभावरूप ही मान लें तो भावरूप तत्त्व स्वतः ज्यों-का-त्यों रह जायगा।
विचार दो तरहका होता है। एक विचार करना होता है और एक विचार उदय होता है। जो विचार किया जाता है, उसमें तो क्रिया है, पर जो विचार उदय होता है, उसमें क्रिया नहीं है। विचार करनेमें तो बुद्धिकी प्रधानता रहती है, पर विचार उदय होनेपर बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अतः तत्त्वबोध विचार करनेसे नहीं होता, प्रत्युत विचार उदय होनेसे होता है। तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्तिके उद्देश्यसे सत्-असत्का विचार करते-करते जब असत् छूट जाता है, तब ‘संसार है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं’—इस विचारका उदय होता है। विचारका उदय होते ही विवेक बोधमें परिणत हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है और तत्त्व प्रकट हो जाता है; मानी हुई चीज मिट जाती है और वास्तविकता रह जाती है। विचारका उदय होनेको यहाँ ‘स्मृतिर्लब्धा ’ कहा गया है।
अपरा प्रकृति भगवान्की है। परन्तु हमने गलती यह की है कि अपराके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् उसको अपना और अपने लिये मान लिया। यह सम्बन्ध हमने ही जोड़ा है और इसको छोड़नेकी जिम्मेवारी भी हमारेपर ही है। अपराके साथ सम्बन्ध माननेसे ही भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी विस्मृति हुई है और हम बन्धनमें पड़े हैं। इसलिये अपराके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही हमारा कल्याण होगा। अपरासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ‘शरीर मेरा और मेरे लिये नहीं है’—इस विवेकको महत्त्व देना है। विवेकको महत्त्व देनेसे ‘अपरा मेरी और मेरे लिये है ही नहीं’—यह स्मृति प्राप्त हो जाती है।
अर्जुनको द्वैत अथवा अद्वैत तत्त्वका अनुभव नहीं हुआ है, प्रत्युत द्वैत-अद्वैतसे अतीत वास्तविक तत्त्वका अनुभव हुआ है। कारण कि द्वैत-अद्वैत तो मोह हैं, जबकि अर्जुनका मोह नष्ट हो गया है।
जीव अनादिकालसे स्वतः परमात्माका है, केवल संसारके आश्रयका त्याग करना है। अर्जुनको मुख्य रूपसे भक्तियोगकी स्मृति हुई है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। इसलिये भक्तियोगकी स्मृति ही वास्तविक है। भक्तियोगकी स्मृति है—‘वासुदेवः सर्वम् ’ अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं। ‘वासुदेवः सर्वम् ’ का अनुभव करना ‘स्मृतिर्लब्धा ’ है। यह अनुभव केवल भगवत्कृपासे ही होता है—‘त्वघ्रासादात् ’। वचन सीमित होते हैं, पर कृपा असीम होती है।
चिन्तनमें तो कर्तृत्व होता है, पर स्मृतिमें कर्तृत्व नहीं है। कारण कि चिन्तन मनसे होता है, मनसे परे बुद्धि है, बुद्धिसे परे अहम् है और अहम्से परे स्वरूप है, उस स्वरूपमें स्मृति होती है। चिन्तन तो हम करते हैं, पर स्मृतिमें केवल उधर दृष्टि होती है। विस्मृतिके समय भी तत्त्व तो वैसा-का वैसा ही है। तत्त्वमें विस्मृति नहीं है, इसलिये उधर दृष्टि होते ही स्मृति हो जाती है।
‘स्थितोऽस्मि गतसन्देशः ’—‘पहले क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना ठीक दीखता था, फिर गुरुजनोंके सामने आनेसे युद्ध करना पाप दीखने लगा; परन्तु स्मृति प्राप्त होते ही सब उलझनें मिट गयीं। मैं क्या करूँ? युद्ध करूँ कि नहीं करूँ?—यह सन्देश, संशय, शंका कुछ नहीं रही। मेरे लिये अब कुछ करना बाकी नहीं रहा, प्रत्युत केवल आपकी आज्ञाका पालन करना बाकी रहा—‘करिष्ये वचनं तव ’। यही शरणागति है।
१-ज्ञान होनेपर न्यायपन कुछ नहीं दीखता अर्थात् पहले अज्ञान था, अब ज्ञान हो गया—ऐसा नहीं दीखता। ज्ञान होनेपर ऐसा अनुभव होता है कि ज्ञान तो सदासे ही था, केवल मेरी दृष्टि उधर नहीं थी। अगर पहले अज्ञान था, पीछे ज्ञान हो गया—ऐसा मानें तो ज्ञानमें सादियना आ जायगा, जबकि ज्ञान सादि नहीं है, अनादि है। जो सादि होता है, वह सान्त होता है और जो अनादि होता है, वह अनन्त होता है।
२-‘द्वैताद्वैतमहामोहः’ (माहेश्वरतन्त्र)
‘अहो माया महामोही द्वैताद्वैतविकल्पना॥’ (अवधूतगीता १।६१)
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[ अध्याय १८ ]
सम्बन्ध—पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘अथ’ पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था, अब आगेके श्लोकमें ‘इति’ पदसे उसकी समाप्ति करते हुए संजय इस संवादकी महिमा गाते हैं।
सज्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रीषमद्भुतं
रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजय बोले—
| इति | = इस प्रकार | च | = और | रोमहर्षणम् | = रोमांचित करनेवाला |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैंने | महात्मनः | = महात्मा | अद्भुतम् | = अद्भुत |
| वासुदेवस्य | = भगवान् | पार्थस्य | = पृथानन्दन | संवादम् | = संवाद |
| वासुदेव | अर्जुनका | अश्रीषम् | = सुना। | ||
| इमम् | = यह |
व्याख्या—‘इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः’— संजय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना, जो कि अत्यन्त अद्भुत, विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमांचित करनेवाली है।
यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘अथ व्यवस्थितानुष्टुवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः’ पदोंसे संजय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ ‘इति’ पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।
अर्जुनके लिये ‘महात्मनः’ विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं, जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं! अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता—पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता—पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। गीतामें अर्जुन जहाँ-जहाँ प्रश्न करते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने
सुना है।
‘संवादमिममश्रीषमद्भुतं रोमहर्षणम्’—इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है? शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारणा बैठी हुई है कि घर, कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधु-संन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति, अवस्था, घटना, देश, काल आदि क्यों न हो, उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं, वह परिस्थिति बढ़िया-से-बढ़िया हो या घटिया-से-घटिया, सौम्य-से-सौम्य हो या घोर-से-घोर विहित युद्ध-जैसी प्रवृत्ति हो, जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है, उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है, मुक्ति हो सकती है*। कारण कि जन्म-मरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें राग-द्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। यही इस संवादमें
- जब हर एक परिस्थितिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे ही कल्याण होता है, तब तो प्राकृत परिस्थितिका घटिया या बढ़िया होना कोई महत्त्व नहीं रखता। हाँ, उससे अलग होनेके उपाय (कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि) अलग-अलग हो सकते हैं। परन्तु इनमें राग मिटाना ही खास उपाय है; क्योंकि राग मिटनेसे द्वेष मिट जाता है और राग-द्वेषके मिटनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होना ही मुक्ति है। वास्तवमें जो बद्ध होता है, वह मुक्त नहीं होता और जो मुक्त होता है, वह मुक्त क्या होगा? क्योंकि वह तो मुक्त ही है। तो फिर मुक्त होना क्या है? वास्तवमें मुक्त होते हुए भी जिस बन्धनको स्वीकार किया है, उस बन्धनसे छूटनेका नाम ही मुक्त होना है।
श्लोक ७५ ] * साधक-संजीवनी * १२५९
अद्भुतपना है।
भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य-जैसा काम करते हुए अपने-आपको प्रकट कर देना और 'मेरी
शरणमें आ जा' यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना-यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला, प्रसन्न करनेवाला, आनन्द देनेवाला है।
परिशिष्ट भाव-गीतामें 'महात्मा' शब्द केवल भक्तोंके लिये आया है। यहाँ संजयने अर्जुनको भी 'महात्मा' कहा है; क्योंकि वे अर्जुनको भक्त ही मानते हैं। भगवान्ने भी कहा है-'भक्तोऽसि मे' (गीता ४। ३)।
सम्बन्ध-पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिस-किसीसे लाभ होता है, उसकी वह कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः संजय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ ७५॥
व्यासप्रसादात् = व्यासजीकी कृपासे
अहम् = मैंने
स्वयम् = स्वयं
एतत् = इस
परम् = परम
गुह्यम् = गोपनीय
योगम् = योग (गीता-ग्रन्थ)-को
कथयतः = कहते हुए
साक्षात् = साक्षात्
योगेश्वरात् = योगेश्वर
कृष्णात् = भगवान् श्रीकृष्णसे
श्रुतवान् = सुना है।
व्याख्या-'व्यासप्रसादात् श्रुतवान्'-संजयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना, तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना! व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्ने 'यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया' (१०।१), 'इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्' (१८।६४), 'मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे' (१८। ६५), 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः' (१८। ६६) आदि-आदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं, उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् वे सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।
'एतद् गुह्यं परं योगम्'-समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्र 'योग' अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखने-सुननेमें नहीं आता।
जीवका भगवान्के साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, उसका नाम 'योग' है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भी 'योग' अर्थात् योगशास्त्र है।
'योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्'-संजयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगको मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। संजयको 'योगेश्वरात्, कृष्णात्, साक्षात्, कथयतः, स्वयम्'-ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी? संजय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परासे नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हो-ऐसी बात भी नहीं है; इसको तो मैंने खुद भगवान्के कहते-कहते सुना है!
परिशिष्ट भाव-अर्जुनने 'त्वत्प्रसादात्' कहा है (१८।७३) और संजयने 'व्यासप्रसादात्' कहा है। अर्जुनको भगवान्की कृपासे दिव्य दृष्टि मिली थी और संजयको व्यासजीकी कृपासे।
१२६०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिमद्भूतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्महुः ॥ ७६ ॥
| राजन् | = हे राजन् ! | पुण्यम् | = पवित्र | संस्मृत्य, संस्मृत्य | = याद कर- |
|---|---|---|---|---|---|
| केशवार्जुनयोः | = भगवान् श्रीकृष्ण | च | = और | करके (में) | |
| और अर्जुनके | अद्भुतम् | = अद्भुत | मुहुर्महुः | = बार-बार | |
| इमम् | = इस | संवादम् | = संवादको | हृष्यामि | = हर्षित हो रहा हूँ । |
व्याख्या—‘राजन्संस्मृत्य’ ‘‘‘ मुहुर्महुः ’’—‘संजय कहते हैं कि हे महाराज ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक, विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोर-से-घोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँची-से-ऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है ! मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद कर-करके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ, प्रसन्न हो रहा हूँ।
श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये; क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य
समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर, एक मतपर स्थिति नहीं होती, तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है। अर्जुन भी ‘युद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है’—इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिंच गये, उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना, उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेम-तत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलाषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादकी क्या महिमा कहे ? उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
परिशिष्ट भाव— भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस संवादमें जो तत्त्व भरा हुआ है, वह किसी ग्रन्थ, महात्मा आदिसे सुननेको नहीं मिला। यह भगवान् और उनके भक्तका बड़ा विलक्षण संवाद है। इतनी स्पष्ट बातें और जगह पढ़ने-सुननेको मिलती नहीं। इस संवादमें युद्ध-जैसे घोर कर्मसे भी कल्याण होनेकी बात कही गयी है। हरेक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य हरेक परिस्थितिमें अपना कल्याण कर सकता है—यह बात इस संवादसे मिलती है। इसलिये यह संवाद बड़ा अद्भुत है—‘संवादमिमद्भूतम्’। केवल संवादमें ही इतनी विलक्षणता है, फिर इसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या है !
भगवान् श्रीकृष्णकी वाणी बड़ी विचित्र है१, उसमें भी भगवान्ने योगमें स्थित होकर गीता कही है२, फिर इसकी विचित्रता-विलक्षणताका तो कहना ही क्या है ! भगवान्के द्वारा कौरव-सभामें होनेवाले राजनीतिक व्याख्यानमें भी इतनी
१-आजकल मनुष्योंमें पारमार्थिक बातोंको जाननेकी जो विशेष व्याकुलता नहीं दिखायी देती, उसका कारण है कि वे धन, कुटुम्ब, मान, बड़ाई, वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, भोग, ऐश्वर्य आदि क्षणिक सुखोंको लेकर संतोष करते रहते हैं। इससे उनकी ( वास्तविकताको जाननेकी ) व्याकुलता दब जाती है।
२-वाचं तां वचनाहंस्त्य शिक्षाक्षरसमन्विताम्। अश्रीषमहमिष्टार्थां पश्चादधृदयहरिणीम् ॥
(महाभारत, उद्योगो ५९। १७)
‘(संजय बोले—) तत्पश्चात् मैंने बातचीतमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णकी वह वाणी सुनी, जिसका एक-एक अक्षर शिक्षाप्रद था। वह अभीष्ट अर्थका प्रतिपादन करनेवाली तथा मनको आकर्षित कर लेनेवाली थी।’
३-न शक्यं तमया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः। परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तमया ॥
(महाभारत, आश्वो १६। १२-१३)
‘(भगवान् बोले—) वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है। उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।’
श्लोक ७७ ] * साधक-संजीवनी * १२६१
विलक्षणता थी कि ऋषि-मुनि उसको सुननेके लिये जाते हैं*, फिर यह (गीता) तो पारमार्थिक संवाद है! श्रीमद्भागवतमें भी जब उद्धवजीने देखा कि भगवान् प्रश्नोंका उत्तर बड़ी विलक्षण रीतिसे देते हैं, तब उन्होंने एक साथ पैंतीस प्रश्न कर दिये (श्रीमद्० ग्यारहवाँ स्कन्ध, उन्नीसवाँ अध्याय, अट्ठाइसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)!
‘हृष्यामि च मुहुर्मुहुः’ — कर्म-ज्ञान-भक्तिकी ऐसी विलक्षण बातें और जगह सुननेको मिली ही नहीं, इसलिये इनको सुनकर संजय बार-बार हर्षित होते हैं।
संजय भगवान्को जाननेवाले थे। धृतराष्ट्रके द्वारा इसका कारण पूछे जानेपर संजयने उनको बताया था—
मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्माचरे।
शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम्॥
(महाभारत, उद्योग० ६९।५)
‘महाराज! आपका कल्याण हो। मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता। व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता। भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ।’
इस प्रकार पहले तो संजय शास्त्रके वचनोंसे भगवान्को जानते थे, पर अब वे साक्षात् भगवान्के वचनोंसे उनको जान गये!
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥ ७७॥
राजन् = हे राजन्!
हरेः = भगवान् श्रीकृष्णके
तत् = उस
अति = अत्यन्त
अद्भुतम् = अद्भुत
रूपम् = विराटरूपको
च = भी
संस्मृत्य, संस्मृत्य = याद कर-करके
मे = मुझे
महान् = बड़ा भारी
विस्मयः = आश्चर्य (हो रहा है)
च = और (मैं)
पुनः, पुनः = बार-बार
हृष्यामि = हर्षित हो रहा हूँ।
व्याख्या—‘तच्च संस्मृत्य ...... पुनः पुनः’—संजयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तो ‘अद्भुत’ बताया, पर यहाँ भगवान्के विराटरूपको ‘अत्यन्त अद्भुत’ बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं, उसपर विचार कर सकते हैं, पर उस विराटरूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।
याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात, अर्जुनको तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया, पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गया!
यद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराटरूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरव-सभामें दुर्योधन आदिको विराटरूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़े-बड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओंका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके संजय कहते हैं कि राजन्! यह सब तो व्यासजी महाराजकी
ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें संजयने भगवान्को ‘महायोगेश्वरः’ कहा था। यहाँ ‘विस्मयो मे महान्’ पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको
- धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव॥ त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परन्तप।
(महाभारत, उद्योग० ८३।६८-६९)
‘(परशुरामजी बोले— ) शत्रुओंको संताप देनेवाले माधव! वहाँ कौरव तथा अन्य राजाओंकी मण्डलीमें आपके द्वारा कही जानेवाली धर्म और अर्थसे युक्त बातोंको हम सुनना चाहते हैं।’
१२६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप | मेरे-जैसेको कहाँ देखनेको मिलता?
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपना विराट् रूप सीमित दिखाया था। अगर अर्जुन न घबराते तो भगवान् और भी रूप दिखाते। पर उतनेसे ही संजय बड़ा आश्चर्य कर रहे हैं।
भगवान्के विषयमें पहले तो संजयने शास्त्रमें पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट् रूप देखा। तात्पर्य है कि शास्त्रकी अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवादकी अपेक्षा भी विराट् रूप अद्भुत था। इसलिये संजयने संवादको अद्भुत कहा—‘संवादमिममदभुतम्’ (१८।७६) और विराट् रूपको अत्यन्त अद्भुत कहा—‘रूपमत्यदभुतम्’।
सम्बन्ध—गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गृह्णाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणाम क्या होगा? अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी? आगेके श्लोकमें संजय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
| यत्र | = जहाँ | धनुर्धरः | = गाण्डीव-धनुषधारी | भूतिः | = विभूति (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| योगेश्वरः | = योगेश्वर | पार्थः | = अर्जुन हैं, | धृवा | = अचल |
| कृष्णः | = भगवान् श्रीकृष्ण हैं | ||||
| (और) | तत्र | = वहाँ ही | नीतिः | = नीति है— | |
| यत्र | = जहाँ | श्रीः | = श्री, | मम | = (ऐसा) मेरा |
| विजयः | = विजय, | मतिः | = मत है। |
व्याख्या—‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः’ —संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले, उनको सम्मति देनेवाले, सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले, भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्त गाण्डीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।
भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी, उस समय संजयने भगवान्को ‘महायोगेश्वरः’ कहा था, अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ ‘योगेश्वरः’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं।
गीतामें भगवान्के लिये ‘महायोगेश्वर’, ‘योगेश्वर’ आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता; क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण
हैं, वे सब-के-सब भगवान्में स्वतः रहते हैं, वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं, असीम रहते हैं। जैसे पिताका पिता, फिर पिताका पिता—यह परम्परा अन्तमें जाकर परम-पिता परमात्मामें समाप्त होती है, ऐसे ही जितने भी गुण हैं, उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।
पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसंग आया, तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शंख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे, इसलिये उनका शंख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डव-सेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शंख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं! लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शंख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शंख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डव-सेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि संजयने जैसे आरम्भमें (शंखवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की, ऐसे ही यहाँ अन्तमें भी इन दोनोंका नाम लेकर
- योगीश्वर अर्थात् योगियोंके ईश्वर होना तो सरल बात है पर योगेश्वर अर्थात् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर होना आखिरी हद है—‘सा काष्ठा सा परा गतिः।’
श्लोक ७८ ]
- साधक-संजीवनी *
१२६३
दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।
गीताभरमें 'पार्थ' सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को 'पार्थ' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी 'कृष्ण' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें 'कृष्ण' सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई है। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए संजयने भी 'कृष्ण' और 'पार्थ' ये दोनों नाम लिये हैं।
'तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम'—लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति—ये सब 'श्री' शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं, वहाँ श्री रहेगी ही।
'विजय' नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षत्र-ऐश्वर्य रहेगे ही।
ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे, वहाँ
'विभूति'—ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामर्थ्य आदि सबके-सब भगवदगुण रहेंगे ही; और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे, वहाँ 'धृवा नीति'—अटल नीति, न्याय, धर्म आदि रहेंगे ही।
वास्तवमें श्री, विजय, विभूति और धृवा नीति—ये सब गुण भगवान्में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन—ये दोनों जहाँ रहेंगे, वहाँ अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त माधुर्य, अनन्त सौशील्य, अनन्त सौजन्य, अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।
धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है, उसका उत्तर संजय यहाँ सम्यक् रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अंगीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः॥ नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे*। संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्त्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'मोक्षसन्त्यासयोग' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
जिसमें मोक्षका भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्तिका वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायका नाम 'मोक्षसन्त्यासयोग' रखा गया है।
अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (१) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके आठ, श्लोकोंके नौ सौ नवासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग एक हजार तेरह है।
(२) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके पचीस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ छियाने और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ छिहत्तर है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें चार उवाच हैं—दो 'अर्जुन उवाच', एक 'श्रीभगवानुवाच' और एक 'संजय उवाच'।
अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके अठहत्तर श्लोकोंमेंसे बारहवें, छियालीसवें और बावनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तेईसवें, बत्तीसवें, सैंतीसवें, इकतालीसवें, पैतालीसवें, छप्पनवें और सत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; तैंतीसवें, छत्तीसवें, सैंतालीसवें और पचहत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; तेरहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'रण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; अड़तीसवें और चौंसठवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; उनचासवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; और तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनसठ श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
- विक्रमसंवत्सरे २०४२ (दो हजार बयालीस)।
आरती
जय भगवद्गीते, जय भगवद्गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि सुन्दर सुपुनीते ॥ जय० ॥ कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि कामासक्तिहरा। तत्त्वज्ञान-विकाशिनि विद्या ब्रह्म परा ॥ जय० ॥ निश्चल-भक्ति-विधायिनि निर्मल मलहारी। शरण-रहस्य-प्रदायिनि सब विधि सुखकारी ॥ जय० ॥ राग-द्वेष-विदारिणि कारिणि मोद सदा। भव-भय-हारिणि तारिणि परमानन्दप्रदा ॥ जय० ॥ आसुर-भाव-विनाशिनि नाशिनि तम-रजनी। दैवी सद्गुणदायिनि हरि-रसिका सजनी ॥ जय० ॥ समता, त्याग सिखावनि हरि-मुख की बानी। सकल शास्त्रकी स्वामिनि श्रुतियोंकी रानी ॥ जय० ॥ दया-सुधा बरसावनि मातु! कृपा कीजै। हरि-पद-प्रेम दान कर अपनो कर लीजै ॥ जय० ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
साधक-संजीवनी-कोश
विषयानुक्रमणिका
( अध्याय एवं श्लोकके अनुसार देखें )
अ
अकेला होना—८।१९ परि.
अक्षौहिणी सेना—१।३
अच्युतगोत्र—१८।६६ वि.
अज्ञान अनादि है—७।१३; १५।४ परि.
अध्यात्मविद्या और राजविद्या—१०।३२
अनन्त, असीम और अगाध—१०।४०
अन्न—३।१४
अन्नके चार प्रकार (भोज्य-पेय-चोष्य-लेह्य)—१५।१४
मिट्टीका अनाजमें रूपान्तरण—१३।३०
अभिमान—६।९ वि.; १३।८; १६।३, ४; १८।४४, ४५ परि.
अभिमान और स्वाभिमान—१७।३ परि.
अभेद और अभिन्नता—६।३२ परि.; ७।१८ परि.; ८।४ परि.; ९।३४; १२।२ परि.; १८।५७ टि.
अभ्यास और अभ्यासयोग—८।८; १२।९, १२
अमरता स्वतःसिद्ध है—१३।१२; १४।२० परि.
अर्जुन—जीव (साधक)-मात्रके प्रतिनिधि अर्जुन—१०।१, १७ परि. १६।५ मा.; १८।६५
अर्जुनके प्रति 'पार्थ' सम्बोधनकी महत्ता—२।३ टि.; १८।७८
प्रथम अध्यायमें कथित अर्जुनकी दलीलोंके उत्तर—२।३८ वि., ५३; ३।२४, २६, २९ परि., ३५; ४।१, ३४; ५।३; ६।१; ११।७, २७, ३४; १६।२४; १८।१७ परि., ५८ वि., ६६
अर्जुन पापका हेतु किसे मानते हैं?—१।४५
अर्जुनमें वैराग्यका अभाव—५।१
अर्जुन और भगवान्की मित्रताका वर्णन—११।४१-४२
अर्जुन भगवान्के विशेष कृपापात्र थे—११।२४
अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष—१८।१२ वि.
अर्पण—३।३०, ३१; ५।१०, १५; ६।४; ७।१४; ९।१६—१८, २८; १२।२, ६, १०
अर्पण-सम्बन्धी विशेष बात—३।३० वि.; ९।२७ वि.
अर्पण और त्याग—९।२७ परि.
मदर्पण कर्म, मदर्थ कर्म और मत्कर्म—१२।६
निषिद्ध क्रिया भगवान्के अर्पण नहीं होती—९।२७ वि.
असुर—१६।४, ५
अहम्—अहमके दो प्रकार—३।२७ वि., ३३; ५।८-९ परि.; ७।४, ५ परि.; १५।११
अहम्-सम्बन्धी विशेष बात—७।५ वि.; ९।६ वि.; १२।८ वि.; १३।१ मा., २
कारणशरीर ही अहम्का जड़-अंश है—३।४२ मा.
अहंकार-नाशके उपाय—१३।८; १५।३
'अहम्' से परे स्वरूपको कैसे जानें?—३।२८
अहंताको मिटाना, शुद्ध करना और बदलना—९।३०
अहंता-परिवर्तनसे लाभ—२।६६ टि.; ६।१५, ३६; ९।३०, ३१, ३४; १५।७; १६।२, ५; १७।२२ वि.; १८।६५
अहंकार और अभिमान—१३।८
अहंवृत्ति और अहंकर्ता—१३।२०
अहंस्फूर्ति और अहंकृति—१८।१७, ५५ वि.
अहंता-ममता—२।१८, ४९, ५२, ७२; ३।३५ मा.; ४।२३; ५।१६; ६।६ परि., १४; ७।५, १३, २९; ९।३, ४-५, ८, १०, ३०, ३१ मा., ३४ वि.; ११।४९; १२।१३-१४ परि., १६; १३।१ मा., ३१ परि.; १४।५ वि.; १५।५, ७, ११; १६।४, ५ मा. ६; १८।११ मा., १३, ६१, ७३ मा.
अहंता-ममतासे रहित होनेके उपाय—२।७१; ३।३५; ६।१; ७।५; १०।३; १२।३-४; १८।१२, १३
अहंता-ममता-सम्बन्धी विशेष बात—६।१ वि.; १४।५ वि.
निर्मम-निष्काम-निरहंकार—२।७२ परि.
अहिंसा—१०।५; १३।७; १६।२; १७।१४
चार प्रकारकी अहिंसा—१३।७
आ
आकर्षण और मिलन सजातीयतामें ही होता है—३।२८ मा., ४२ मा.; ७।३ परि.; १२।८ परि.; १३।१ मा., २६ परि.; १५।११ मा.
विजातीय जड़में चेतनका आकर्षण कैसे?—१३।२६ परि.
आकृति और भाव—२।१८ परि.
आततायी—१।३६
आत्महत्या—७।२६; १३।२८; १८।१२ वि.
आत्यन्तिक प्रलय—१४।२ परि.; १५।३ वि.
आधि और व्याधि—७।१६ टि.; १८।१२ वि.
१२६६ * साधक-संजीवनी-कोश *
आनन्द (दे. रस)-१३।८
आर्जव-१३।७; १६।१; १७।१४; १८।४२
आर्जव और मार्दव-१६।२ टि.
आश्रम (ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यास)-४।१, २१;
७।३०; ८।११ परि.; १७।१४; १८।५३ टि., ५८
आश्रय और आकर्षण-४।१०
आसक्ति, विरक्ति और अनुरक्ति-१२।१८ मा.
आसन-६।११-१३
आस्तिक-नास्तिक-४।४०; ५।१८ वि.; ९।४-५ परि.,
२९; १६।५ परि., ७ टि., ८, ९; १७।३ मा., २६;
१८।४२, ५५, ७३ टि.
इ
इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ)-२।२९; ३।६;
५।८-९; ८।२२; १२।१४; १३।५, १७, २०;
१५।९, १२
श्रवणेन्द्रियकी महिमा-१०।१९ टि.; १५।९
ई
ईर्ष्या-४।२२
उ
उदारता गुण भी है, स्वरूप भी-५।७ टि.
उदासीन-६।९; १२।१६; १४।२३
उद्देश्य-उद्देश्य और फलेच्छा-३।२० मा., ३०;४।१ वि.;
५।७
उद्देश्य और कामना-३।३० वि.; ४३ टि.
उद्देश्य और रुचि-५।७
दुःखका उद्देश्य नहीं होता-७।११ परि.
उपासना-८।२१; ९।१५, २३, २४, २६ परि., अ.सा.;
१२।१, २, ३-४; १५।५ वि.; १८।१६ परि.
निर्गुणोपासनाके दो प्रकार-१२।३-४
सगुणोपासना और निर्गुणोपासना-७।१९ मा., २४
वि., ३० वि.; ८।२१; १२।३-४, ५, ६
सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और निर्गुण-उपासनाकी
कठिनताएँ-१२।५ वि.
भगवान्की तथा देवताओंकी उपासना-७।२३;
९।२२ परि., २३, २५, २६ परि., अ.सा.
उपेक्षा, उदासीनता और उपरति-२।४५; ६।२५
ऋ
ऋण-न. नि.; ३। ११, १२ मा., १९, २०, २५;
४।१८; ६।४; १२।२०; १८।१२ वि., ५८
मनुष्य देवता, पितर, पशु-पक्षी आदिका ऋणी
है-३।१२ वि., २०
भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता-१८।५८
ऋषि-५।२५
सप्तर्षि-१०।६
ए
एकता-तात्त्विक और आत्मीय एकता-७।१८ परि.
जगत्, जीव और परमात्माकी एकता-
१२।३-४ परि.; १५।७ परि.
ज्ञान और प्रेमकी एकता-१२।२ परि.
एकान्त-२।३८ परि.; ३।४ मा., ४१; ४। १६ मा.,
२६;६।९, १०, १४, २५, २६;१२।३-४;१३।१०;
१६।१; १८।११, २४, ३०, ५१-५३, ५६
क
'करना' और 'होना'-६।२५ मा.;८।१४ परि.;१०।१०
परि.; १३।३० टि.; १४।२२ वि.; १८।१२ वि.
'करना', 'होना' और 'है'-१४।२३ परि.
'करना' और 'न करना'-(दे. प्रवृत्ति और निवृत्ति)
करनेका राग (वेग)-३।४ परि.; ४।२ टि., ९ मा.,
१८, ३० वि.; ५।२; ६।१,
३, ४;७।१९; १२।१९; १४।९; १८।६, ४५, ५९
करनेका राग, पानेकी लालसा, जीनेकी इच्छा और
मरनेका भय-३।१८; ४।३; ५।५ वि.;
१८।५५ वि.
करनेका राग और पानेकी कामना-४।३० वि.
जीनेकी इच्छा और मरनेका भय-३।१२ वि.; १०।९
करण (अन्तःकरण और बहिःकरण)-प्रा.; ३।४२ मा.;
९। ३०; १२। ८; १३। २, २०, ३१ परि.;
१५।१२; १६।१; १८।१४, ७३
करणनिरपेक्ष और करणासापेक्ष-न. नि.; प्रा.; २।२९;
४। ३३ परि., ३५, ३८; ५।२०; ६।१० परि.,
२० परि., ३७ परि.; ७।३० परि.; १०।१५, १९ टि.;
१२।३-४, १२ परि.; १३।१२, २४; १५।११
मा., १५
कर्तव्य-कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात-३।१२, २३-२४
वि., २५-२६ वि.
कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता-३।४ वि., ८,
३०; ४।१५
कर्तव्य और अधिकार-न. नि.; ३।१०-११ मा.
कर्तव्य-कर्ममें शिथिलता आनेका कारण-३।९
कर्तव्य-कर्म छोड़कर भगवद्भजनमें लगनेका
फल-१८।८
भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करे-
१८।९ टि.
कर्ता-कर्ता और करण-प्रा.; ९।३०; १०।९; १८।१४, १८
कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं-५।३
जैसा कर्ता, वैसी क्रिया-९।३१ मा.; १४।१६;
१७।११; १८।२८ वि., ४८ परि.
- विषयानुक्रमणिका *
१२६७
कर्ता सात्त्विक-राजस-तामस होता है, कर्म नहीं—१४।१६
कर्ता और भोक्ता (कर्तृत्व और भोक्तृत्व)—२।२०; ३।१९, २७ परि., २८ मा., ४२-४३; ४।१३, १७ परि., १८ परि., २० परि., २३ वि., ३७; ५।२, ८-९, १३, १४, २०, २९; ६।१; ७।५ परि., १९, २७; ९।२४; १०।८ परि.; १३।२०, २१, २३, ३१, ३२, ३३-३४; १४।२२, २३ परि.; १५।१०; १६।५ मा.; १८।१३, १५, १६, १७
कर्ता और भोक्ता कौन है?—५।८-९; १३।३१ परि.; १८।१६ परि.
कर्म —संचित, प्रारब्ध व क्रियमाण कर्म—३।१३ टि., ३७ परि.; ४।१९, ३७; ५।१२; १८।१२ वि. तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका उपाय—१८।१२ वि. शुभ (वहित) और अशुभ (निषिद्ध) कर्म—३।३८ वि.; ८।४; ९।२८; ११।२९ परि.; १२।१२ वि., १७; १८।१०, १२ वि., ४७ लौकिक और पारमार्थिक कर्म—१७।२७ सात्त्विक कर्म और अकर्म—१८।२३ भगवत्सम्बन्धी कर्म—८।७ वि.; १२।६; १८।४४ जनार्मभक कर्म और भोगदायक कर्म—१८।४१ वि. वहित तथा नियत कर्म—३।८; १८।७, २३, ४७ विहितकी अपेक्षा निषेधकी मुख्यता—१२।१२ वि. बिना इच्छाके कर्म क्यों करें?—५।१२ कर्मके पाँच प्रकार (नित्य, नैमित्तिक, काम्य, प्रायश्चित और आवश्यक)—१८।२-३ टि. कर्म, क्रिया (चेष्टा) और लीला—३।२९ टि., ३३; ४।९ परि., १३-१४ परि., २३ परि.; ५।८-९; १८।१२, १५, १८
क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—१८।१६ टि. क्रिया, कर्म और कर्मयोग—१४।७ टि.; ४।२३ परि. कर्म करते हुए कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटे?—३।१९ कर्मोंकी आसक्तिसे छूटनेका उपाय—६।४; १४।७, १२ अपने लिये कुछ न करना—३।९ मा., १०-११ मा., १२, १३, १७, १८ मा., २२, २६ वि., परि., २७; ४।२, ३, १६ वि., १८, ३० परि., ३३, ४१; ५।२, १०; ६।१, ८; ७।१९; १२।१२; १७।२५; १८।२१, १६ परि., ४६ परि.
क्रिया और भाव —३।२१, २८ मा.; ५।३; ७।१५ वि.; १४।१४; १६।२३; १७।१० वि., १६ टि., २८; १८।४५ परि., ४८ परि. जैसा भाव, वैसी क्रिया—२।५६; ४।१६; १६।१६ परि., १७।११ कर्मोंका फल-अंश और संस्कार-अंश—१६।२०
वि.; १८।१२ वि., ४७ वि. कर्म-सम्बन्धी विशेष बात—१८।१२ वि.; १८।४१ वि.
कर्मोंकी सिद्धिके पाँच हेतु—१८।१३-१४ स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य—१८।४४, ४७ कर्मोंमें आसक्ति और अभिरति—१८।४५ परि.
कर्मफल —२।४७; ३।३७ परि.; ४।१४, २०; ५।११, १४; ६।१; ८।१६ परि.; १२।११, १२; १७।११, १२, २५, २८; १८।२-३, ६, ११, १२ वि., २४ दृष्ट, अदृष्ट, प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल—५।१२; १७।२२ वि.; १८।६, १२ वि. शुभ और अशुभ कर्मफल—९।२८ परि. इष्ट, अनिष्ट और मिश्र कर्मफल—१८।१२ वि. कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात—१२।१२; १८।११ कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात—१७।२१ वि.
कर्मयोग —कर्मयोग कर्मजन्य कैसे नहीं है?—४।१२ कर्मयोगमें त्यागकी सुगमता—५।२; १२।१२ कर्मयोगी साधकोंके दो प्रकार—३।७ कर्मयोगीका शरीर-निर्वाह कैसे होगा?—३।१२ वि. कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटता है?—३।१९ कर्म और कर्मयोगी—३।१९ वि.; ६।३ परि. भगवान्ने सूर्यको कर्मयोगका उपदेश क्यों दिया?—४।१
कर्मयोगका सिद्धान्त ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको भी अपनाना पड़ेगा—४।२ कर्मयोग ज्ञानयोगसे श्रेष्ठ है—५।२ कर्मयोग-सम्बन्धी विशेष बात—४।१६ वि., मा.; ३८ वि. कर्मविज्ञान और योगविज्ञान—२।३९ परि.; ४।३८
कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग —न. नि.; प्रा.; २।४१, ५४, ५९ परि., ७१; ३।अव., ३, ३० परि., ३५ मा.; ४।२, १६ वि., २३, ३९ परि.; ५।२ परि., ३, ५ परि., १०; ६।४, ५, ३० परि., ३७ परि., ४७; ७।३ परि., ४, ५, १९, ३० परि.; ८।१५ वि.; ९।१ परि., २ परि., ३०, अ. सा.; १०।११ परि., ४१ परि.; १२।२ परि., १३-१४ परि.; १३।२४ परि.; १४।२७ परि.; १५।२ टि., ५, ७ वि., १५, १६, २०; १६।२, ५; १७।३ मा.; १८।४६, ४९ परि., ५० परि., ५५ वि., ६६ परि., ६९ परि., ७३
कर्मयोग और ध्यानयोग—२।४३; ६।१८, २०, ३३; १२।१२ कर्मयोग और भक्तियोग—२।६१ परि.; ३।३४; ६।४; १२।३-४., ११; १८।१२ वि., ४६ वि., ६०, ६३ कर्मयोग और ज्ञानयोग—२।२०, ३१ परि., ३९, ७२; ३।३, ४, ७, ८, २८ वि.; ४।१५ परि., २१, २३,