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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1256

श्लोक ७३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२५५

‘त्वत्प्रसादात् मयाच्युत’ पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया, उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था, आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है, यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है, प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ, तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये, वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ; परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये, वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (इसी अध्यायका चौंसठवाँ, पैंसठवाँ, छाछठवाँ श्लोक)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।

‘स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव’—अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (‘न चैतद्विद्यः कतरनो गरीयः’ २।६), वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें, वैसा मैं करूँ अर्थात् अब तो बस, आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—‘करिष्ये वचनं तव।’ अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किंचिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्य-कर्म होगा, वह करूँगा।

अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति, आसक्तिसे कामना, कामनासे क्रोध, क्रोधसे मोह, मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है, वह स्मृति मिल गयी है—‘नष्टो मोहः

स्मृतिर्लब्धा।’ स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है, इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है—‘गतसन्देहः।’ बुद्धिनाशसे पतन होता है, उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ—‘स्थितोऽस्मि।’ इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है, तभी तो आपने सम्मोहका कहीं प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहीं कही है, वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है।

यद्यपि वहाँका और यहाँका—दोनोंका विषय भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है; क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है, फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है।

दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है; क्योंकि यह आसुरी-सम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है; क्योंकि यह दैवी-सम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है।

भगवत्कृपासे जो काम होता है, वह श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है, उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है।

मार्मिक बात

अर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी—‘स्मृतिर्लब्धा।’ तो विस्मृति किसी कारणसे हुई? जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली, इसीसे अपने सत्-स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीकी अपनी कमी मान ली, अपनेको शरीर