श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1255, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है—इन दोनोंमें महान् अन्तर है, ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृति-विस्मृति दोनों ही मुर्दकी तरह जड़ हैं, पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है, जड़ नहीं। केवल जड़का आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे ‘स्मृतिलब्धा’ कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है, उसका प्रकट होना ‘स्मृति’ है और आवरण हटनेका नाम ‘लब्धा’ है।
साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं—(१) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति, (२) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (३) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है; क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं, तब ये साधन कहलाते हैं; परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है, अभाव नहीं हुआ है।
असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ—यह ‘कर्मयोग’ की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ—यह ‘ज्ञान-योग’ की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया—यह ‘भक्तियोग’ की विस्मृति है।
स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँ ‘स्मृति’ है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है, प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है; क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है; क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है।
इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझना ‘विस्मृति’ है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करना ‘स्मृति’ है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती; जैसे—
मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान होता है, उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है, वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है।
स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया, तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालन-पोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है, तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अब ‘मैं कुन्तीका पुत्र हूँ’—ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा? कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा? कितना जोर आया? पहले उधर लक्ष्य नहीं था, अब उधर लक्ष्य हो गया—केवल इतनी ही बात है।
स्वरूप निष्काम है, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम, बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी, जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वार अपने-आपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जड़ताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता, जबकि स्वरूपके साथ जड़ताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है, अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती।
स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—‘करिष्ये वचनं तव’, ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे कि ‘हे नाथ! अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।’
तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधकोंकी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपार-अटूट-अखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है।