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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1254

श्लोक ७३ ]

  • साधक-संजीवनी *

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परन्तु भगवान्के विराट् रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी, तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढभाव है, तुम व्यथित और मोहित मत होओ—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावः’ (११।४९)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’। अन्तःकरणकी स्मृति और तत्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सब-का-सब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है।

प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं; कई प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति, अनुपलब्धि और ऐतिह्य—ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं; परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं; परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता, वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है।

अब इस ‘स्मृति’ शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है, वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं—

१-यहाँ अर्जुनका सांसारिक (गीता—दूसरे अध्यायका बावनवाँ श्लोक) और शास्त्रीय (गीता—दूसरे अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक) —दोनों प्रकारका मोह नष्ट हुआ है।

२-हमें जो संसारका ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके द्वारा ही होता है; क्योंकि संसार विवेक-विचारका विषय है। परन्तु जो विवेक-विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत विवेक-विचारका प्रकाशक है, उसको विवेक-विचारद्वारा नहीं जान सकते। कारण कि जो वस्तु प्रकाश्य होती है, वह प्रकाशकको प्रकाशित करनेमें असमर्थ होती है। इसलिये जो सबका प्रकाशक और आश्रय है, वह परमात्मतत्त्व श्रद्धा-विशवासका विषय है, विचारका नहीं।

जिन लोगोंकी शास्त्रीय श्रद्धा होती है, वे शास्त्रोंसे परमात्माको मान लेते हैं अथवा जिनकी तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त अनुभववी भगवत्प्रेमी सन्त-महापुरुषोंपर श्रद्धा होती है, वे उनके वचनोंसे परमात्माको मान लेते हैं, स्वीकार कर लेते हैं। इसमें उनका अन्तःकरण और इन्द्रियों प्रमाण नहीं हैं। इसमें तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण हैं। जो श्रद्धालु और आस्तिक हैं, उनके लिये तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष प्रमाण हो सकते हैं, पर जो अश्रद्धालु और नास्तिक हैं, उनके लिये शास्त्र और सन्त-महापुरुष प्रमाण नहीं हो सकते। तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियों और अन्तःकरणका जो विषय है, वह तो प्रत्यक्ष-प्रमाण है और अनुमान आदि जो प्रमाण हैं, वे प्रत्यक्षमूलक युक्ति-प्रमाण हैं। परन्तु सन्त-महापुरुष और शास्त्र-प्रमाणमें तो केवल श्रद्धा ही मुख्य हेतु है।

३-जिससे जाना जाता है, वह ‘प्रमाण’ होता है; जिसका ज्ञान होता है, वह ‘प्रमेय’ होता है और जो जाननेवाला है, वह ‘प्रमाता’ होता है अर्थात् इन्द्रियाँ एवं अन्तःकरण ‘प्रमाण’ हैं, संसार ‘प्रमेय’ है और स्वयं (चेतन) ‘प्रमाता’ है।

(१) अनुभूतविषयसाम्प्रमोषः स्मृतिः।

(योगदर्शन १।११)

‘अनुभूत विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है।’

(२) संस्कारमात्रजन्म ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह)

‘संस्कारमात्रसे जन्म हो और ज्ञान हो, उसको स्मृति कहते हैं।’

यह स्मृति अन्तःकरणकी एक ‘वृत्ति’ है। यह वृत्ति प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं—किलष्ट और अकिलष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृति ‘किलष्ट’ होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृति ‘अकिलष्ट’ होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारण ‘अविद्या’ है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृति ‘स्वयं’ से ही होती है, वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती, जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति—दोनों होती हैं।

परमात्मतत्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है, तब इसको ‘स्मृतिर्लब्धा’ कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी, वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी