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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1253

१२५२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टि से रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है, उसका मोह नष्ट हो ही जाता है।

'पार्थ' सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे, बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं? पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये 'पार्थ' सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये इकट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो

कौटुम्बिक मोह है, वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय, जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् 'पार्थ' सम्बोधन देते हैं।

'धनंजय' सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनंजय (राजाओंके धनको जीतनेवाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमें 'धनंजय' बन जाओ।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं।

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥

अर्जुन बोले—

अच्युत = हे अच्युत! मया = मैंने स्थितः = स्थित

त्वत्प्रसादात् = आपकी कृपासे स्मृतिः = स्मृति अस्मि = हूँ।

(मेरा) लब्धा = प्राप्त कर तव = (अब मैं)

मोहः = मोह ली है। आपकी

नष्टः = नष्ट हो गया गतसन्देहः = (मैं) सन्देहरहित वचनम् = आज्ञाका

है (और) होकर करिष्ये = पालन करूँगा।

व्याख्या—'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत'—अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये 'अच्युत' सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है; परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार 'अच्युत' सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें) 'अच्युत' सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। दूसरी बार (ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुति-प्रार्थना की, तो भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (तिहत्तरवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुन सन्देहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी

आज्ञाका पालन करूँगा, तो भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि, मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ हुईं, पर भगवान्की आदि, मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे।

दूसरे अध्यायमें अर्जुनने 'शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्' (२।७) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है।

दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कि 'तेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है, मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ!' इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी कि 'मेरा मोह चला गया'—'मोहोऽयं विगतो मम' (११।१)।