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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1260

श्लोक ७५ ] * साधक-संजीवनी * १२५९

अद्भुतपना है।

भगवान्‌का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य-जैसा काम करते हुए अपने-आपको प्रकट कर देना और 'मेरी

शरणमें आ जा' यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना-यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला, प्रसन्न करनेवाला, आनन्द देनेवाला है।

परिशिष्ट भाव-गीतामें 'महात्मा' शब्द केवल भक्तोंके लिये आया है। यहाँ संजयने अर्जुनको भी 'महात्मा' कहा है; क्योंकि वे अर्जुनको भक्त ही मानते हैं। भगवान्‌ने भी कहा है-'भक्तोऽसि मे' (गीता ४। ३)।

सम्बन्ध-पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिस-किसीसे लाभ होता है, उसकी वह कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः संजय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ ७५॥

व्यासप्रसादात् = व्यासजीकी कृपासे

अहम् = मैंने

स्वयम् = स्वयं

एतत् = इस

परम् = परम

गुह्यम् = गोपनीय

योगम् = योग (गीता-ग्रन्थ)-को

कथयतः = कहते हुए

साक्षात् = साक्षात्

योगेश्वरात् = योगेश्वर

कृष्णात् = भगवान्‌ श्रीकृष्णसे

श्रुतवान् = सुना है।

व्याख्या-'व्यासप्रसादात् श्रुतवान्'-संजयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना, तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना! व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्‌ने 'यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया' (१०।१), 'इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्' (१८।६४), 'मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे' (१८। ६५), 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः' (१८। ६६) आदि-आदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं, उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् वे सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।

'एतद् गुह्यं परं योगम्'-समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्र 'योग' अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखने-सुननेमें नहीं आता।

जीवका भगवान्‌के साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, उसका नाम 'योग' है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भी 'योग' अर्थात् योगशास्त्र है।

'योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्'-संजयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगको मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। संजयको 'योगेश्वरात्, कृष्णात्, साक्षात्, कथयतः, स्वयम्'-ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी? संजय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परासे नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हो-ऐसी बात भी नहीं है; इसको तो मैंने खुद भगवान्‌के कहते-कहते सुना है!

परिशिष्ट भाव-अर्जुनने 'त्वत्प्रसादात्' कहा है (१८।७३) और संजयने 'व्यासप्रसादात्' कहा है। अर्जुनको भगवान्‌की कृपासे दिव्य दृष्टि मिली थी और संजयको व्यासजीकी कृपासे।