श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1261, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिमद्भूतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्महुः ॥ ७६ ॥
| राजन् | = हे राजन् ! | पुण्यम् | = पवित्र | संस्मृत्य, संस्मृत्य | = याद कर- |
|---|---|---|---|---|---|
| केशवार्जुनयोः | = भगवान् श्रीकृष्ण | च | = और | करके (में) | |
| और अर्जुनके | अद्भुतम् | = अद्भुत | मुहुर्महुः | = बार-बार | |
| इमम् | = इस | संवादम् | = संवादको | हृष्यामि | = हर्षित हो रहा हूँ । |
व्याख्या—‘राजन्संस्मृत्य’ ‘‘‘ मुहुर्महुः ’’—‘संजय कहते हैं कि हे महाराज ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक, विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोर-से-घोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँची-से-ऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है ! मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद कर-करके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ, प्रसन्न हो रहा हूँ।
श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये; क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य
समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर, एक मतपर स्थिति नहीं होती, तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है। अर्जुन भी ‘युद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है’—इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिंच गये, उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना, उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेम-तत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलाषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादकी क्या महिमा कहे ? उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
परिशिष्ट भाव— भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस संवादमें जो तत्त्व भरा हुआ है, वह किसी ग्रन्थ, महात्मा आदिसे सुननेको नहीं मिला। यह भगवान् और उनके भक्तका बड़ा विलक्षण संवाद है। इतनी स्पष्ट बातें और जगह पढ़ने-सुननेको मिलती नहीं। इस संवादमें युद्ध-जैसे घोर कर्मसे भी कल्याण होनेकी बात कही गयी है। हरेक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य हरेक परिस्थितिमें अपना कल्याण कर सकता है—यह बात इस संवादसे मिलती है। इसलिये यह संवाद बड़ा अद्भुत है—‘संवादमिमद्भूतम्’। केवल संवादमें ही इतनी विलक्षणता है, फिर इसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या है !
भगवान् श्रीकृष्णकी वाणी बड़ी विचित्र है१, उसमें भी भगवान्ने योगमें स्थित होकर गीता कही है२, फिर इसकी विचित्रता-विलक्षणताका तो कहना ही क्या है ! भगवान्के द्वारा कौरव-सभामें होनेवाले राजनीतिक व्याख्यानमें भी इतनी
१-आजकल मनुष्योंमें पारमार्थिक बातोंको जाननेकी जो विशेष व्याकुलता नहीं दिखायी देती, उसका कारण है कि वे धन, कुटुम्ब, मान, बड़ाई, वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, भोग, ऐश्वर्य आदि क्षणिक सुखोंको लेकर संतोष करते रहते हैं। इससे उनकी ( वास्तविकताको जाननेकी ) व्याकुलता दब जाती है।
२-वाचं तां वचनाहंस्त्य शिक्षाक्षरसमन्विताम्। अश्रीषमहमिष्टार्थां पश्चादधृदयहरिणीम् ॥
(महाभारत, उद्योगो ५९। १७)
‘(संजय बोले—) तत्पश्चात् मैंने बातचीतमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णकी वह वाणी सुनी, जिसका एक-एक अक्षर शिक्षाप्रद था। वह अभीष्ट अर्थका प्रतिपादन करनेवाली तथा मनको आकर्षित कर लेनेवाली थी।’
३-न शक्यं तमया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः। परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तमया ॥
(महाभारत, आश्वो १६। १२-१३)
‘(भगवान् बोले—) वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है। उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।’