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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1262

श्लोक ७७ ] * साधक-संजीवनी * १२६१

विलक्षणता थी कि ऋषि-मुनि उसको सुननेके लिये जाते हैं*, फिर यह (गीता) तो पारमार्थिक संवाद है! श्रीमद्भागवतमें भी जब उद्धवजीने देखा कि भगवान् प्रश्नोंका उत्तर बड़ी विलक्षण रीतिसे देते हैं, तब उन्होंने एक साथ पैंतीस प्रश्न कर दिये (श्रीमद्० ग्यारहवाँ स्कन्ध, उन्नीसवाँ अध्याय, अट्ठाइसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)!

‘हृष्यामि च मुहुर्मुहुः’ — कर्म-ज्ञान-भक्तिकी ऐसी विलक्षण बातें और जगह सुननेको मिली ही नहीं, इसलिये इनको सुनकर संजय बार-बार हर्षित होते हैं।

संजय भगवान्को जाननेवाले थे। धृतराष्ट्रके द्वारा इसका कारण पूछे जानेपर संजयने उनको बताया था—

मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्माचरे।

शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम्॥

(महाभारत, उद्योग० ६९।५)

‘महाराज! आपका कल्याण हो। मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता। व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता। भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ।’

इस प्रकार पहले तो संजय शास्त्रके वचनोंसे भगवान्को जानते थे, पर अब वे साक्षात् भगवान्के वचनोंसे उनको जान गये!

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।

विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥ ७७॥

राजन् = हे राजन्!

हरेः = भगवान् श्रीकृष्णके

तत् = उस

अति = अत्यन्त

अद्भुतम् = अद्भुत

रूपम् = विराटरूपको

च = भी

संस्मृत्य, संस्मृत्य = याद कर-करके

मे = मुझे

महान् = बड़ा भारी

विस्मयः = आश्चर्य (हो रहा है)

च = और (मैं)

पुनः, पुनः = बार-बार

हृष्यामि = हर्षित हो रहा हूँ।

व्याख्या—‘तच्च संस्मृत्य ...... पुनः पुनः’—संजयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तो ‘अद्भुत’ बताया, पर यहाँ भगवान्के विराटरूपको ‘अत्यन्त अद्भुत’ बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं, उसपर विचार कर सकते हैं, पर उस विराटरूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।

याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात, अर्जुनको तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया, पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गया!

यद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराटरूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरव-सभामें दुर्योधन आदिको विराटरूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़े-बड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओंका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके संजय कहते हैं कि राजन्! यह सब तो व्यासजी महाराजकी

ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें संजयने भगवान्को ‘महायोगेश्वरः’ कहा था। यहाँ ‘विस्मयो मे महान्’ पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको

  • धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव॥ त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परन्तप।

(महाभारत, उद्योग० ८३।६८-६९)

‘(परशुरामजी बोले— ) शत्रुओंको संताप देनेवाले माधव! वहाँ कौरव तथा अन्य राजाओंकी मण्डलीमें आपके द्वारा कही जानेवाली धर्म और अर्थसे युक्त बातोंको हम सुनना चाहते हैं।’