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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप | मेरे-जैसेको कहाँ देखनेको मिलता?

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपना विराट् रूप सीमित दिखाया था। अगर अर्जुन न घबराते तो भगवान् और भी रूप दिखाते। पर उतनेसे ही संजय बड़ा आश्चर्य कर रहे हैं।

भगवान्के विषयमें पहले तो संजयने शास्त्रमें पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट् रूप देखा। तात्पर्य है कि शास्त्रकी अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवादकी अपेक्षा भी विराट् रूप अद्भुत था। इसलिये संजयने संवादको अद्भुत कहा—‘संवादमिममदभुतम्’ (१८।७६) और विराट् रूपको अत्यन्त अद्भुत कहा—‘रूपमत्यदभुतम्’।

सम्बन्ध—गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गृह्णाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणाम क्या होगा? अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी? आगेके श्लोकमें संजय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥

यत्र= जहाँधनुर्धरः= गाण्डीव-धनुषधारीभूतिः= विभूति (और)
योगेश्वरः= योगेश्वरपार्थः= अर्जुन हैं,धृवा= अचल
कृष्णः= भगवान् श्रीकृष्ण हैं
(और)तत्र= वहाँ हीनीतिः= नीति है—
यत्र= जहाँश्रीः= श्री,मम= (ऐसा) मेरा
विजयः= विजय,मतिः= मत है।

व्याख्या—‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः’ —संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले, उनको सम्मति देनेवाले, सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले, भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्त गाण्डीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।

भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी, उस समय संजयने भगवान्को ‘महायोगेश्वरः’ कहा था, अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ ‘योगेश्वरः’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं।

गीतामें भगवान्के लिये ‘महायोगेश्वर’, ‘योगेश्वर’ आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता; क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण

हैं, वे सब-के-सब भगवान्में स्वतः रहते हैं, वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं, असीम रहते हैं। जैसे पिताका पिता, फिर पिताका पिता—यह परम्परा अन्तमें जाकर परम-पिता परमात्मामें समाप्त होती है, ऐसे ही जितने भी गुण हैं, उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।

पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसंग आया, तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शंख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे, इसलिये उनका शंख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डव-सेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शंख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं! लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शंख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शंख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डव-सेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि संजयने जैसे आरम्भमें (शंखवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की, ऐसे ही यहाँ अन्तमें भी इन दोनोंका नाम लेकर

  • योगीश्वर अर्थात् योगियोंके ईश्वर होना तो सरल बात है पर योगेश्वर अर्थात् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर होना आखिरी हद है—‘सा काष्ठा सा परा गतिः।’