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भारतकोश
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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१२६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप | मेरे-जैसेको कहाँ देखनेको मिलता?

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपना विराट् रूप सीमित दिखाया था। अगर अर्जुन न घबराते तो भगवान् और भी रूप दिखाते। पर उतनेसे ही संजय बड़ा आश्चर्य कर रहे हैं।

भगवान्के विषयमें पहले तो संजयने शास्त्रमें पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट् रूप देखा। तात्पर्य है कि शास्त्रकी अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवादकी अपेक्षा भी विराट् रूप अद्भुत था। इसलिये संजयने संवादको अद्भुत कहा—‘संवादमिममदभुतम्’ (१८।७६) और विराट् रूपको अत्यन्त अद्भुत कहा—‘रूपमत्यदभुतम्’।

सम्बन्ध—गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गृह्णाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणाम क्या होगा? अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी? आगेके श्लोकमें संजय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥

यत्र= जहाँधनुर्धरः= गाण्डीव-धनुषधारीभूतिः= विभूति (और)
योगेश्वरः= योगेश्वरपार्थः= अर्जुन हैं,धृवा= अचल
कृष्णः= भगवान् श्रीकृष्ण हैं
(और)तत्र= वहाँ हीनीतिः= नीति है—
यत्र= जहाँश्रीः= श्री,मम= (ऐसा) मेरा
विजयः= विजय,मतिः= मत है।

व्याख्या—‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः’ —संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले, उनको सम्मति देनेवाले, सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले, भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्त गाण्डीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।

भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी, उस समय संजयने भगवान्को ‘महायोगेश्वरः’ कहा था, अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ ‘योगेश्वरः’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं।

गीतामें भगवान्के लिये ‘महायोगेश्वर’, ‘योगेश्वर’ आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता; क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण

हैं, वे सब-के-सब भगवान्में स्वतः रहते हैं, वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं, असीम रहते हैं। जैसे पिताका पिता, फिर पिताका पिता—यह परम्परा अन्तमें जाकर परम-पिता परमात्मामें समाप्त होती है, ऐसे ही जितने भी गुण हैं, उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।

पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसंग आया, तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शंख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे, इसलिये उनका शंख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डव-सेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शंख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं! लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शंख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शंख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डव-सेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि संजयने जैसे आरम्भमें (शंखवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की, ऐसे ही यहाँ अन्तमें भी इन दोनोंका नाम लेकर

  • योगीश्वर अर्थात् योगियोंके ईश्वर होना तो सरल बात है पर योगेश्वर अर्थात् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर होना आखिरी हद है—‘सा काष्ठा सा परा गतिः।’

श्लोक ७८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२६३

दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।

गीताभरमें 'पार्थ' सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्‌को 'पार्थ' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी 'कृष्ण' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें 'कृष्ण' सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्‌के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई है। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए संजयने भी 'कृष्ण' और 'पार्थ' ये दोनों नाम लिये हैं।

'तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम'—लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति—ये सब 'श्री' शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान्‌ कृष्ण हैं, वहाँ श्री रहेगी ही।

'विजय' नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षत्र-ऐश्वर्य रहेगे ही।

ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण होंगे, वहाँ

'विभूति'—ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामर्थ्य आदि सबके-सब भगवदगुण रहेंगे ही; और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे, वहाँ 'धृवा नीति'—अटल नीति, न्याय, धर्म आदि रहेंगे ही।

वास्तवमें श्री, विजय, विभूति और धृवा नीति—ये सब गुण भगवान्‌में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन—ये दोनों जहाँ रहेंगे, वहाँ अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त माधुर्य, अनन्त सौशील्य, अनन्त सौजन्य, अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।

धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है, उसका उत्तर संजय यहाँ सम्यक्‌ रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अंगीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः॥ नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे*। संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्त्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'मोक्षसन्त्यासयोग' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

जिसमें मोक्षका भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्तिका वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायका नाम 'मोक्षसन्त्यासयोग' रखा गया है।

अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (१) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके आठ, श्लोकोंके नौ सौ नवासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग एक हजार तेरह है।

(२) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके पचीस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ छियाने और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ छिहत्तर है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें चार उवाच हैं—दो 'अर्जुन उवाच', एक 'श्रीभगवानुवाच' और एक 'संजय उवाच'।

अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके अठहत्तर श्लोकोंमेंसे बारहवें, छियालीसवें और बावनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तेईसवें, बत्तीसवें, सैंतीसवें, इकतालीसवें, पैतालीसवें, छप्पनवें और सत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; तैंतीसवें, छत्तीसवें, सैंतालीसवें और पचहत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; तेरहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'रण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; अड़तीसवें और चौंसठवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; उनचासवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; और तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनसठ श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

  • विक्रमसंवत्सरे २०४२ (दो हजार बयालीस)।

आरती

जय भगवद्गीते, जय भगवद्गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि सुन्दर सुपुनीते ॥ जय० ॥ कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि कामासक्तिहरा। तत्त्वज्ञान-विकाशिनि विद्या ब्रह्म परा ॥ जय० ॥ निश्चल-भक्ति-विधायिनि निर्मल मलहारी। शरण-रहस्य-प्रदायिनि सब विधि सुखकारी ॥ जय० ॥ राग-द्वेष-विदारिणि कारिणि मोद सदा। भव-भय-हारिणि तारिणि परमानन्दप्रदा ॥ जय० ॥ आसुर-भाव-विनाशिनि नाशिनि तम-रजनी। दैवी सद्गुणदायिनि हरि-रसिका सजनी ॥ जय० ॥ समता, त्याग सिखावनि हरि-मुख की बानी। सकल शास्त्रकी स्वामिनि श्रुतियोंकी रानी ॥ जय० ॥ दया-सुधा बरसावनि मातु! कृपा कीजै। हरि-पद-प्रेम दान कर अपनो कर लीजै ॥ जय० ॥


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

साधक-संजीवनी-कोश

विषयानुक्रमणिका

( अध्याय एवं श्लोकके अनुसार देखें )

अकेला होना—८।१९ परि.

अक्षौहिणी सेना—१।३

अच्युतगोत्र—१८।६६ वि.

अज्ञान अनादि है—७।१३; १५।४ परि.

अध्यात्मविद्या और राजविद्या—१०।३२

अनन्त, असीम और अगाध—१०।४०

अन्न—३।१४

अन्नके चार प्रकार (भोज्य-पेय-चोष्य-लेह्य)—१५।१४

मिट्टीका अनाजमें रूपान्तरण—१३।३०

अभिमान—६।९ वि.; १३।८; १६।३, ४; १८।४४, ४५ परि.

अभिमान और स्वाभिमान—१७।३ परि.

अभेद और अभिन्नता—६।३२ परि.; ७।१८ परि.; ८।४ परि.; ९।३४; १२।२ परि.; १८।५७ टि.

अभ्यास और अभ्यासयोग—८।८; १२।९, १२

अमरता स्वतःसिद्ध है—१३।१२; १४।२० परि.

अर्जुन—जीव (साधक)-मात्रके प्रतिनिधि अर्जुन—१०।१, १७ परि. १६।५ मा.; १८।६५

अर्जुनके प्रति 'पार्थ' सम्बोधनकी महत्ता—२।३ टि.; १८।७८

प्रथम अध्यायमें कथित अर्जुनकी दलीलोंके उत्तर—२।३८ वि., ५३; ३।२४, २६, २९ परि., ३५; ४।१, ३४; ५।३; ६।१; ११।७, २७, ३४; १६।२४; १८।१७ परि., ५८ वि., ६६

अर्जुन पापका हेतु किसे मानते हैं?—१।४५

अर्जुनमें वैराग्यका अभाव—५।१

अर्जुन और भगवान्की मित्रताका वर्णन—११।४१-४२

अर्जुन भगवान्के विशेष कृपापात्र थे—११।२४

अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष—१८।१२ वि.

अर्पण—३।३०, ३१; ५।१०, १५; ६।४; ७।१४; ९।१६—१८, २८; १२।२, ६, १०

अर्पण-सम्बन्धी विशेष बात—३।३० वि.; ९।२७ वि.

अर्पण और त्याग—९।२७ परि.

मदर्पण कर्म, मदर्थ कर्म और मत्कर्म—१२।६

निषिद्ध क्रिया भगवान्के अर्पण नहीं होती—९।२७ वि.

असुर—१६।४, ५

अहम्—अहमके दो प्रकार—३।२७ वि., ३३; ५।८-९ परि.; ७।४, ५ परि.; १५।११

अहम्-सम्बन्धी विशेष बात—७।५ वि.; ९।६ वि.; १२।८ वि.; १३।१ मा., २

कारणशरीर ही अहम्का जड़-अंश है—३।४२ मा.

अहंकार-नाशके उपाय—१३।८; १५।३

'अहम्' से परे स्वरूपको कैसे जानें?—३।२८

अहंताको मिटाना, शुद्ध करना और बदलना—९।३०

अहंता-परिवर्तनसे लाभ—२।६६ टि.; ६।१५, ३६; ९।३०, ३१, ३४; १५।७; १६।२, ५; १७।२२ वि.; १८।६५

अहंकार और अभिमान—१३।८

अहंवृत्ति और अहंकर्ता—१३।२०

अहंस्फूर्ति और अहंकृति—१८।१७, ५५ वि.

अहंता-ममता—२।१८, ४९, ५२, ७२; ३।३५ मा.; ४।२३; ५।१६; ६।६ परि., १४; ७।५, १३, २९; ९।३, ४-५, ८, १०, ३०, ३१ मा., ३४ वि.; ११।४९; १२।१३-१४ परि., १६; १३।१ मा., ३१ परि.; १४।५ वि.; १५।५, ७, ११; १६।४, ५ मा. ६; १८।११ मा., १३, ६१, ७३ मा.

अहंता-ममतासे रहित होनेके उपाय—२।७१; ३।३५; ६।१; ७।५; १०।३; १२।३-४; १८।१२, १३

अहंता-ममता-सम्बन्धी विशेष बात—६।१ वि.; १४।५ वि.

निर्मम-निष्काम-निरहंकार—२।७२ परि.

अहिंसा—१०।५; १३।७; १६।२; १७।१४

चार प्रकारकी अहिंसा—१३।७

आकर्षण और मिलन सजातीयतामें ही होता है—३।२८ मा., ४२ मा.; ७।३ परि.; १२।८ परि.; १३।१ मा., २६ परि.; १५।११ मा.

विजातीय जड़में चेतनका आकर्षण कैसे?—१३।२६ परि.

आकृति और भाव—२।१८ परि.

आततायी—१।३६

आत्महत्या—७।२६; १३।२८; १८।१२ वि.

आत्यन्तिक प्रलय—१४।२ परि.; १५।३ वि.

आधि और व्याधि—७।१६ टि.; १८।१२ वि.

१२६६ * साधक-संजीवनी-कोश *

आनन्द (दे. रस)-१३।८

आर्जव-१३।७; १६।१; १७।१४; १८।४२

आर्जव और मार्दव-१६।२ टि.

आश्रम (ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यास)-४।१, २१;

७।३०; ८।११ परि.; १७।१४; १८।५३ टि., ५८

आश्रय और आकर्षण-४।१०

आसक्ति, विरक्ति और अनुरक्ति-१२।१८ मा.

आसन-६।११-१३

आस्तिक-नास्तिक-४।४०; ५।१८ वि.; ९।४-५ परि.,

२९; १६।५ परि., ७ टि., ८, ९; १७।३ मा., २६;

१८।४२, ५५, ७३ टि.

इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ)-२।२९; ३।६;

५।८-९; ८।२२; १२।१४; १३।५, १७, २०;

१५।९, १२

श्रवणेन्द्रियकी महिमा-१०।१९ टि.; १५।९

ईर्ष्या-४।२२

उदारता गुण भी है, स्वरूप भी-५।७ टि.

उदासीन-६।९; १२।१६; १४।२३

उद्देश्य-उद्देश्य और फलेच्छा-३।२० मा., ३०;४।१ वि.;

५।७

उद्देश्य और कामना-३।३० वि.; ४३ टि.

उद्देश्य और रुचि-५।७

दुःखका उद्देश्य नहीं होता-७।११ परि.

उपासना-८।२१; ९।१५, २३, २४, २६ परि., अ.सा.;

१२।१, २, ३-४; १५।५ वि.; १८।१६ परि.

निर्गुणोपासनाके दो प्रकार-१२।३-४

सगुणोपासना और निर्गुणोपासना-७।१९ मा., २४

वि., ३० वि.; ८।२१; १२।३-४, ५, ६

सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और निर्गुण-उपासनाकी

कठिनताएँ-१२।५ वि.

भगवान्‌की तथा देवताओंकी उपासना-७।२३;

९।२२ परि., २३, २५, २६ परि., अ.सा.

उपेक्षा, उदासीनता और उपरति-२।४५; ६।२५

ऋण-न. नि.; ३। ११, १२ मा., १९, २०, २५;

४।१८; ६।४; १२।२०; १८।१२ वि., ५८

मनुष्य देवता, पितर, पशु-पक्षी आदिका ऋणी

है-३।१२ वि., २०

भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता-१८।५८

ऋषि-५।२५

सप्तर्षि-१०।६

एकता-तात्त्विक और आत्मीय एकता-७।१८ परि.

जगत्‌, जीव और परमात्माकी एकता-

१२।३-४ परि.; १५।७ परि.

ज्ञान और प्रेमकी एकता-१२।२ परि.

एकान्त-२।३८ परि.; ३।४ मा., ४१; ४। १६ मा.,

२६;६।९, १०, १४, २५, २६;१२।३-४;१३।१०;

१६।१; १८।११, २४, ३०, ५१-५३, ५६

'करना' और 'होना'-६।२५ मा.;८।१४ परि.;१०।१०

परि.; १३।३० टि.; १४।२२ वि.; १८।१२ वि.

'करना', 'होना' और 'है'-१४।२३ परि.

'करना' और 'न करना'-(दे. प्रवृत्ति और निवृत्ति)

करनेका राग (वेग)-३।४ परि.; ४।२ टि., ९ मा.,

१८, ३० वि.; ५।२; ६।१,

३, ४;७।१९; १२।१९; १४।९; १८।६, ४५, ५९

करनेका राग, पानेकी लालसा, जीनेकी इच्छा और

मरनेका भय-३।१८; ४।३; ५।५ वि.;

१८।५५ वि.

करनेका राग और पानेकी कामना-४।३० वि.

जीनेकी इच्छा और मरनेका भय-३।१२ वि.; १०।९

करण (अन्तःकरण और बहिःकरण)-प्रा.; ३।४२ मा.;

९। ३०; १२। ८; १३। २, २०, ३१ परि.;

१५।१२; १६।१; १८।१४, ७३

करणनिरपेक्ष और करणासापेक्ष-न. नि.; प्रा.; २।२९;

४। ३३ परि., ३५, ३८; ५।२०; ६।१० परि.,

२० परि., ३७ परि.; ७।३० परि.; १०।१५, १९ टि.;

१२।३-४, १२ परि.; १३।१२, २४; १५।११

मा., १५

कर्तव्य-कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात-३।१२, २३-२४

वि., २५-२६ वि.

कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता-३।४ वि., ८,

३०; ४।१५

कर्तव्य और अधिकार-न. नि.; ३।१०-११ मा.

कर्तव्य-कर्ममें शिथिलता आनेका कारण-३।९

कर्तव्य-कर्म छोड़कर भगवद्भजनमें लगनेका

फल-१८।८

भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करे-

१८।९ टि.

कर्ता-कर्ता और करण-प्रा.; ९।३०; १०।९; १८।१४, १८

कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं-५।३

जैसा कर्ता, वैसी क्रिया-९।३१ मा.; १४।१६;

१७।११; १८।२८ वि., ४८ परि.

  • विषयानुक्रमणिका *

१२६७

कर्ता सात्त्विक-राजस-तामस होता है, कर्म नहीं—१४।१६

कर्ता और भोक्ता (कर्तृत्व और भोक्तृत्व)—२।२०; ३।१९, २७ परि., २८ मा., ४२-४३; ४।१३, १७ परि., १८ परि., २० परि., २३ वि., ३७; ५।२, ८-९, १३, १४, २०, २९; ६।१; ७।५ परि., १९, २७; ९।२४; १०।८ परि.; १३।२०, २१, २३, ३१, ३२, ३३-३४; १४।२२, २३ परि.; १५।१०; १६।५ मा.; १८।१३, १५, १६, १७

कर्ता और भोक्ता कौन है?—५।८-९; १३।३१ परि.; १८।१६ परि.

कर्म —संचित, प्रारब्ध व क्रियमाण कर्म—३।१३ टि., ३७ परि.; ४।१९, ३७; ५।१२; १८।१२ वि. तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका उपाय—१८।१२ वि. शुभ (वहित) और अशुभ (निषिद्ध) कर्म—३।३८ वि.; ८।४; ९।२८; ११।२९ परि.; १२।१२ वि., १७; १८।१०, १२ वि., ४७ लौकिक और पारमार्थिक कर्म—१७।२७ सात्त्विक कर्म और अकर्म—१८।२३ भगवत्सम्बन्धी कर्म—८।७ वि.; १२।६; १८।४४ जनार्मभक कर्म और भोगदायक कर्म—१८।४१ वि. वहित तथा नियत कर्म—३।८; १८।७, २३, ४७ विहितकी अपेक्षा निषेधकी मुख्यता—१२।१२ वि. बिना इच्छाके कर्म क्यों करें?—५।१२ कर्मके पाँच प्रकार (नित्य, नैमित्तिक, काम्य, प्रायश्चित और आवश्यक)—१८।२-३ टि. कर्म, क्रिया (चेष्टा) और लीला—३।२९ टि., ३३; ४।९ परि., १३-१४ परि., २३ परि.; ५।८-९; १८।१२, १५, १८

क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—१८।१६ टि. क्रिया, कर्म और कर्मयोग—१४।७ टि.; ४।२३ परि. कर्म करते हुए कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटे?—३।१९ कर्मोंकी आसक्तिसे छूटनेका उपाय—६।४; १४।७, १२ अपने लिये कुछ न करना—३।९ मा., १०-११ मा., १२, १३, १७, १८ मा., २२, २६ वि., परि., २७; ४।२, ३, १६ वि., १८, ३० परि., ३३, ४१; ५।२, १०; ६।१, ८; ७।१९; १२।१२; १७।२५; १८।२१, १६ परि., ४६ परि.

क्रिया और भाव —३।२१, २८ मा.; ५।३; ७।१५ वि.; १४।१४; १६।२३; १७।१० वि., १६ टि., २८; १८।४५ परि., ४८ परि. जैसा भाव, वैसी क्रिया—२।५६; ४।१६; १६।१६ परि., १७।११ कर्मोंका फल-अंश और संस्कार-अंश—१६।२०

वि.; १८।१२ वि., ४७ वि. कर्म-सम्बन्धी विशेष बात—१८।१२ वि.; १८।४१ वि.

कर्मोंकी सिद्धिके पाँच हेतु—१८।१३-१४ स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य—१८।४४, ४७ कर्मोंमें आसक्ति और अभिरति—१८।४५ परि.

कर्मफल —२।४७; ३।३७ परि.; ४।१४, २०; ५।११, १४; ६।१; ८।१६ परि.; १२।११, १२; १७।११, १२, २५, २८; १८।२-३, ६, ११, १२ वि., २४ दृष्ट, अदृष्ट, प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल—५।१२; १७।२२ वि.; १८।६, १२ वि. शुभ और अशुभ कर्मफल—९।२८ परि. इष्ट, अनिष्ट और मिश्र कर्मफल—१८।१२ वि. कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात—१२।१२; १८।११ कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात—१७।२१ वि.

कर्मयोग —कर्मयोग कर्मजन्य कैसे नहीं है?—४।१२ कर्मयोगमें त्यागकी सुगमता—५।२; १२।१२ कर्मयोगी साधकोंके दो प्रकार—३।७ कर्मयोगीका शरीर-निर्वाह कैसे होगा?—३।१२ वि. कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटता है?—३।१९ कर्म और कर्मयोगी—३।१९ वि.; ६।३ परि. भगवान्ने सूर्यको कर्मयोगका उपदेश क्यों दिया?—४।१

कर्मयोगका सिद्धान्त ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको भी अपनाना पड़ेगा—४।२ कर्मयोग ज्ञानयोगसे श्रेष्ठ है—५।२ कर्मयोग-सम्बन्धी विशेष बात—४।१६ वि., मा.; ३८ वि. कर्मविज्ञान और योगविज्ञान—२।३९ परि.; ४।३८

कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग —न. नि.; प्रा.; २।४१, ५४, ५९ परि., ७१; ३।अव., ३, ३० परि., ३५ मा.; ४।२, १६ वि., २३, ३९ परि.; ५।२ परि., ३, ५ परि., १०; ६।४, ५, ३० परि., ३७ परि., ४७; ७।३ परि., ४, ५, १९, ३० परि.; ८।१५ वि.; ९।१ परि., २ परि., ३०, अ. सा.; १०।११ परि., ४१ परि.; १२।२ परि., १३-१४ परि.; १३।२४ परि.; १४।२७ परि.; १५।२ टि., ५, ७ वि., १५, १६, २०; १६।२, ५; १७।३ मा.; १८।४६, ४९ परि., ५० परि., ५५ वि., ६६ परि., ६९ परि., ७३

कर्मयोग और ध्यानयोग—२।४३; ६।१८, २०, ३३; १२।१२ कर्मयोग और भक्तियोग—२।६१ परि.; ३।३४; ६।४; १२।३-४., ११; १८।१२ वि., ४६ वि., ६०, ६३ कर्मयोग और ज्ञानयोग—२।२०, ३१ परि., ३९, ७२; ३।३, ४, ७, ८, २८ वि.; ४।१५ परि., २१, २३,

१२६८

  • साधक-संजीवनी-कोश *

३८; ५।२, ३-७, २७; ६।१ परि., २; ७।५; ९।१५; १२।३-४; १३।२४; १८।११ परि., १२, १५, १६, १७ परि., २३ टि., ४६ वि.

ज्ञानयोग और भक्तियोग—न. नि.; ४।६ वि.; ६।३१; ७।१, २, ३ परि., ४, १२, १६ मा., १८, १९, ३० परि.; ८।४ वि., परि., १९ परि.; ९।१८ परि.; ११ परि., २७ परि., ३१ परि., ३२; १०।१, ४-५ परि., ११ परि., ३९; १२।२ परि., ५, ६, ७ परि., ८ परि., १३-१४ परि., १६ परि., २०; १३।७, १०, १८ परि., १९, २० परि., २३ परि.; २६ परि., ३० परि.; १४।२६; १५।६, १९; १८।४०, ४४, ४५, ४६ परि., ५४ परि., ५५ परि., ५६

'काम'—३।३७ परि., ३९; ७।११; १०।२८, ४० परि.; १६।२; १८।१२ वि. कामके रहनेके पाँच स्थान—३।४०

कामना—कामनाके अनेक (वासना, स्मृहा आदि) रूप—३।३९ कामना-सम्बन्धी विशेष बात—३।३०, ३७; ७।१६ मा.; १५।५ वि.

कामनाको मिटानेके उपाय—२।४७; ३।१३, ४३ कामनाके बिना कर्ममें प्रवृत्ति कैसे होगी?—३।३० वि.

कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा?—३।३७ वि.

कामनाओंके चार भेद—३।३७ वि. कामनाको लेकर मनुष्यकी चार अवस्थाएँ—४।१९ कामना और जिज्ञासा—५।३ परि.

कामनाके अनेक प्रकार—७।२०; १५।७ परि. पुत्रैषणा, विद्यैषणा और लोकैषणा—१५।२ उत्कण्ठा और इच्छा—३।८ मा.

'कामना' से आसुरी, राक्षसी और मोहिनी स्वभावका आना—९।१३

कामना और आवश्यकता—३।३० वि., ३७ वि.; ७।१६ मा.; १५।२ टि., ७ परि.; १८।३० टि.

पारमार्थिक और लौकिक कामना—३।४२ मा.; ७।१६ मा.

कौन-सी कामना 'कामना' नहीं कहलाती?—१।१; १५।२ टि.

कामना, जिज्ञासा और पिपासा—१५।७ परि. कारक पुरुष—४।७, ८ टि.; ८।१५, १६ परि., २१

कार्य और कारण—७।६ टि., ७, ८ परि., १२; ९।४-५, ६, १६-१९; १०।२; १३।१५ टि., १९-२०; १५।३ उपादान और निमित्त कारण—४।१३; ७।६;

९।१० परि., १८; १०।३९ अभिन्ननिमित्तोपादान कारण—९।१० परि.; १०।८; १५।१

कुश—६।११

कूट (अहरन)—६।८; १२।३-४

कृपा (दे. दया)—

कृपा और दया—९।२८ वि.; १६।२ भगवत्कृपा और सत्तकृपा—८।१४ परि. दुष्टोंपर भी भगवान्की कृपा—१६।२०

क्रोध (दे. दोष)—२।६२-६३; १४।१३ मा.; १६।२, ४, १२ परि., २१-२२; १७।१ टि. क्रोध और क्षोभ—१६।२, ४ क्रोध और द्रोह—१६।३ टि. थोड़ी-सी बातपर जोरसे क्रोध आनेका कारण—५।२६

क्षण—१५।१ टि.

क्षमा—३।३७ वि.; १०।४, ३४; ११।४४; १२।१३; १३।७; १६।१, ३; १८।४२ क्षमा और अक्रोध—१६।३ क्षमा माँगनेकी दो रीतियाँ—१६।३

खोज और निर्माण—१४।२७ टि.; १५।४ परि.

खोज और उत्पत्ति—४।९ मा.; ९।१३; १४।२७

गंगोज्ञ—१८।६१ वि.

गणेशजीकी प्रतिमाओंके द्वारा दूध पीनेकी घटना (दि. २१.९.१९९५)—९।३ परि.

गति—७।१८ परि.; ८।२६; १८।४१ वि. अधोगति (योनिविशेष और स्थानविशेष)—१४।१८ गति और प्रवृत्ति—६।४४ परि.; १५।६ परि.

गाय—गायकी महिमा—२।३०; १६।६; १७।१० वि.; १८।४४ गोरक्षा-सम्बन्धी विशेष बात—१८।४४ वि. झूठी गौसेवा—१६।१७

गायत्री—१०।३५; १७।२४

गुण (सत्त्व-रज-तम)—२।४७; ३।२८, ३९, ४०; ४।१३, १६; ६।१६, २१, २७; ७।१२; ९।८; १०।३६; १३।१९, २१, ३१; १४।५-१८, २०; १५।१०; १६।३, ६; १७।१-२२; १८।४, ७-९, १९-४० शुद्ध सत्त्व और मलिन सत्त्व—१४।६ सत्त्वगुण अनामय (निर्विकार) कैसे?—१४।६ परि. सत्त्वगुणको बढ़ानेके उपाय—१४।१८ सात्त्विक गुणवाले पशु-पक्षी—१६।६ तीनों गुणोंमें परस्पर दसगुना अन्तर—३।४०

  • विषयानुक्रमणिका *

१२६९

टि.; १७।१ टि. सात्त्विकताका तात्पर्य—१७।११ गुणोंकी तारतम्यतासे चार वर्ण—१८।४१ वि. गुरु—२।७, २९; ४।३, ३४; ६।५ परि.; ७।५ टि., २१ परि.; ९।२६; १०।४१ वि.; १२।५ वि.; १३।७; १७।१४; १८।६४ परि. गुरु-सम्बन्धी विशेष बात—१३।७ गुरु और राजा—१०।४१ वि. गुरुकी आवश्यकता ज्ञानमार्गमें—१३।७ गुरु कैसा हो?—१३।७ भगवान् सबके आदिगुरु हैं—४।१ गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम और परमगुह्य विषय—९।१ परि.; १८।६२, ६३ टि. चन्द्रलोक और चन्द्रमण्डल—८।२५; १५।१३ चित्तकी पाँच अवस्थाएँ (मूह, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध)—६।१८ टि., ३६; १३।२४ चिन्ता—पारमार्थिक और सांसारिक चिन्ता—१६।११ चिन्तासे हानि—२।११ चिरंजीवी—१।८ टि. च्युत साधन—६।२५ परि.; १३।८ चेतन और जड़—७।२० टि. चेतनता और जड़ता—१६।५ परि. चौरासी लाख योनियों—३।१०-११ परि.; ७।२८ वि.; १०।३९ परि.; १४।४ परि. जन्म-मरणका कारण—२।२२ वि., ४०; ५।१२; ७।२९; ८।१४, १९, २७; ९।३; १३।२१, २६ परि., २८; १५।१ परि., २, ५; १६।५ मा.; १८।१६ टि., ५५ वि., ५८, ७४ जन्म-मरण कबसे शुरू हुआ?—प्रा.; ७।१३ शास्त्रकी दृष्टिसे 'अज्ञान' और साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका कारण—३।२८; ५।१०; ७।२७ जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति—५।३; १३।१; १८।१२ वि. जाग्रत्-सुषुप्ति—१८।१२ टि. ३९ जाग्रत्-सुषुप्ति और समाधि—१८।१२ टि. जाति—४।१४ परि.; ७।५ परि., १० परि. जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे?—१८।४४ भक्तोंमें जातिभेद नहीं—१८।४४, ६६ वि. ज्ञानना और मानना—प्रा.; ३।३, ३० वि.; ५।२९; ७।२, १२, १९; ८।४ वि.; १०।३ परि., ७ टि.; १३।१५; १५।१९ मान्यतासे मान्यता मिटती है—२।१४ टि.; ५।२१ जिज्ञासा—५।३ परि.; ६।४४; ७।४-५, १६; १५।७ परि.;

१८।१, ७० भोगेच्छा और जिज्ञासा—७।४-५ कामना और जिज्ञासा—७।१६ मा. जिज्ञासु—जिज्ञासु और मुमुक्षु—७।१६ परि. भावप्रधान और विवेकप्रधान जिज्ञासु—१३।१० जीव—जीव ईश्वरका अंश है, ब्रह्मका नहीं—१५।७ परि. जीव भगवान्का अंश है, कार्य नहीं—७।६ ज्ञान—५।१५-१६; १०।४, १२-१३ परि., ३८, ४१ परि.; १३।२, १७; १८।१८, १९ अपने ज्ञानका अनादर—२।२२ टि. ज्ञानके आठ अंतरंग साधन—४।३३ ज्ञानके तीन अधिकारी—४।३४ ज्ञान और विज्ञान—३।४१; ६।८; ७।२, ६, ३० परि.; ९।१, ४-५ परि., ९।अ. सा.; १८।४२ ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात—७।२ वि.; ९।१ वि., २ आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान—४।३५ परि., ३८ परि.; ६।३० परि., ३४ परि.; ९।१ परि.; १०।३२ सात्त्विक ज्ञान और तत्त्वज्ञान—१४।६ परि.; १८।२० आवृत और अनावृत ज्ञान—८।२३ इन्द्रियोंका ज्ञान और बुद्धिका ज्ञान—५।२८; १३।१७ ज्ञान दोषी नहीं होता—२।१४; १२।१३; १३।६ वि.; १४।२४; १८।१२ वि. नफा-नुकसान आदिमें फर्क है, ज्ञानमें कोई फर्क नहीं—१३।८ टि.; १५।९ साधन-ज्ञान और साध्य-ज्ञान—१३।१० तत्त्वज्ञान होनेके लक्षण—१३।६ वि., ७ क्या ज्ञानयोगका साधक भक्ति भी करता है?—१३।१० ज्ञानकी भूमिकाएँ—१४।२६ संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर—२।६९ परि.; ३।२८ परि., ४३ मा.; ४।१८; ७।१३, २७ परि.; ९।३४ वि.; १०।३; १३।२; १५।३; १८।३१ तप—३।३५; ४।२८; १०।५; १६।१; १७।१७—१९; १८।१५, ४२, ६७ ज्ञानतप—४।१० शारीरिक तप—१७।१४ वाणी-सम्बन्धी तप—१७।१५ मानसिक तप—१७।१६ आसुरी तप—१७।७ तादात्म्य—३।२७ परि., ४२-४३ मा.; ७।४-५, २९; ९।३२ मा.; १३।६, ६, २०, २१ परि., २८, ३३ परि.; १४।२०; १५।३; १६।५ मा.; १८।११, १२ वि. तादात्म्य-ममता-कामना—३।३७ वि.; ९।१०; १४।५;

१२७० * साधक-संजीवनी-कोश *

१५। २, ३, ६; १८। १२ वि.

पशु, देवता आदिमें भी तादात्म्य-ममता-कामना-

१५। २

प्रेमकी प्राप्ति होनेपर तादात्म्यका सर्वथा नाश-

१५। ३ वि.

तीर्थस्थान-४। ९; ८। ५; १२। १६; १६। ७

त्याग-३। ३९; ६। २५ परि.; ९। २७ परि.; १२। ३-४,

१२; १६। २; १८। १-११, ६६

कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात-

१२। १२ वि.

त्यागसे नया प्रारब्ध-१८। १२

त्रिपुटी-१५। ११ मा.

भोक्ता, भोग और भोग्य-३। ४२

अनुभविता, अनुभव और अनुभाव्य-५। २०

ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय-१८। १८

ध्याता, ध्यान और ध्येय-६। २०

प्रकाशक, प्रकाश और प्रकाश्य-१३। १७

उपासक, उपास्य और उपासना-१४। २६

प्रमाण, प्रमाता और प्रमेय-१८। ७३ टि.

द्रष्टा, दृश्य और दर्शन-२। १२, २९; ४। ३५;

६। ३१ परि.; ७। १९ परि.; १३। १; १४। १३ मा.

दृश्य द्रष्टाके किसी अंशमें रहता है-१३। १ वि.

दम-४। ३३; १०। ४; १६। १; १८। ४२

दम्भ (दिखावटीपन)-१३। ७; १६। ४, १०; १७। ५, १२, १८

दो प्रकारका दम्भ-१६। ४

दया-(दे. कृपा)-

भगवान्की, सन्त-महात्माओंकी, साधकोंकी और

साधारण मनुष्योंकी दया-१६। २

न्याय और दया-८। ६

दर्प (घमण्ड)-१६। ४; १८। ५३

दर्प और अभिमान-१६। ४ टि.

दान-१६। १; १७। २०-२२; १८। ४३

अभयदान और उसके दो भेद-१६। १

दान देनेवालेकी अधोगति नहीं होती-१७। २२

दान-सम्बन्धी विशेष बात-१७। २२ वि.

दार्शनिक मतभेद-३। ३१ परि.; ४। ३५ परि.; ६। ३१

परि.; ७। १९ परि.; ८। १७ परि.; १२। २ परि.;

१५। ३, ६ परि., १०; १८। ६, ५४ परि.

दिनचर्या कैसी हो?-६। १७ वि.

दिव्यदृष्टि-११। ८, ४७, ४८, ४९; १८। ७५ परि.

संजय और अर्जुनकी दिव्य दृष्टि कबतक रही?-

११। ४९

दुर्भाव और दुराचार-१६। २० टि.

दुःख (दे. सुख)-

परिणामदुःख, तापदुःख तथा संस्कारदुःख-५। २२

आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक

दुःख-७। १६ मा.

दुःखका कारण कौन?-५। २२ परि.

धर्मात्मा पुरुष दुःख क्यों पाते हैं?-१८। १२

दुःखका भोग और दुःखका प्रभाव-५। २२

परि.; १३। ८ परि.

दृष्टि-आध्यात्मिक और भौतिक दृष्टि-२। ५ टि.

दृष्टिदोष-१७। १० वि.

देवता-३। ११-१२; १४। १४, १८ वि.; १५। २; १७। १४

तैंतीस कोटिके देवता (बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह

रुद्र और दो अश्विनीकुमार)-११। ६; १७। ४, १४

मर्त्य देवता और आजान देवता-८। १६

देवताओंके दिन-रात आदिकी गणना-८। १७ टि., २४

स्वर्गमें भी उच्च, मध्यम व कनिष्ठ श्रेणी-

१७। २२ टि.

स्वर्गमें भी दुःख, ईर्ष्या, अभिमान-१७। २२ वि.;

१८। ३८

दैवी और आसुरी सम्पत्तिका मूल-११। ४९; १६। ५;

१८। ६२ परि.

आसुरी सम्पत्तिका मूल-१६। २३ टि.

दोष-काम-क्रोधादि दोषोंको मिटानेका उपाय-

१४। १३ मा.

काम-क्रोधादि मिटनेके तीन लक्षण-५। २६

दोष अपनेमें नहीं हैं-५। २३; १३। ६, ८, ११;

१२। २०; १४। १३ मा., २२ परि., २५ परि.;

१५। ५ वि., १०; १६। ५ मा.; १८। ३९, ६१ वि.

दोषदृष्टि-१। ३९; ३। ३१; ९। १; १३। २५; १५। २०;

१६। १, २; १८। ६७, ७१

द्वन्द्व-३। ४२ मा.; २। ४५; ४। २२; ५। ३, २८;

७। २७, २८; १२। १७ परि.; १५। ५ वि.

द्वन्द्वोंके अनेक प्रकार-७। २८

व्यावहारिक और आध्यात्मिक द्वन्द्व-१५। ५ वि.

द्वैत-अद्वैत-४। ६; ६। ३१; ७। १७, १८; १२। ३-४;

१५। ११ मा.; १८। ६६ वि., ७३

परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं-

१८। ६१ वि.

भक्तिमें अद्वैत-न. नि.; ९। १९ परि.; १२। २ परि.

धन-रुपयोंकी महत्ता माननेसे हानि-३। २१ वि., ३९,

४१; ६। ४१; ७। १५; १०। ८ परि.; १५। ४, १५

वि.; १७। ३; १८। ३४, ५७, ६६ वि.

  • विषयानुक्रमणिका *

१२७१

धन बढ्नेसे दरिद्रता बढना—३।३९ धनके त्यागसे सुख—३।३९ धनकी शुद्धि—१६।३ धनके बिना भी जीवन-निर्वाह—१६।११; १८।१२ वि. धनके बिना सेवा कैसे होगी?—३।३४ मा. क्या चोरीसे भी धन मिल सकता है?—१८।१२ भगवान्के बिना लक्ष्मीका वाहन उल्लू—१८।६६ वि. धन और धर्म—१८।३४ टि.

धर्म — कुलधर्म और जातिधर्म—१।४३ 'धर्म' में कुधर्म, अधर्म और परधर्म—३।३५ परि. धर्म-पालन करतेहुए मरनेसे कल्याण कैसे?—३।३५ स्वधर्म-परधर्म—२।३१; ३।९, ३५, ४२ मा.; ४।१, १८; ५।८-९ वि.; ८।१९; ९।३; १८।४७, ४८ स्वधर्म और परधर्म-सम्बन्धी मार्मिक बात—३।३५ धर्ममय युद्ध १८।४३ टि. स्वधर्मके दोष—१८।४८

धृति (धैर्य)—६।२५; १६।३; १०।३४; १३।६; १८।२६, २९, ३३-३५, ४३, ५१-५३ ध्यानयोग —५।२६, २७-२८; ६।१०-२८; १८।५१-५३ ध्यान-सम्बन्धी मार्मिक बात—६।२५ ध्यानयोग और कर्मयोग—६।२० वि. ध्यानयोगके दो प्रकार—६।२५ परि. ध्यानयोगका अन्तिम फल—६।३४ परि.

नमस्कार किसे किया जाता है? —११।३७ नरक — योनिविशेष और स्थानविशेष नरक—१५।२; १४।१८; १६।५ मा. नरकका यातनाशरीर—१६।१६ टि.

नामजप —३।२१ वि., २६; ६।३५; ७।१; १०।२५; १२।९; १५।७; १७।१० वि., १५, २३-२४ निद्रा —५।२१; ६।१६-१७; १४।८, १७; १८।५५ युक्तिनिद्रा और अतिनिद्रा ६।१६-१७; १८।३९ वि. सात्त्विक मनुष्योंकी निद्रा—६।१६

निन्दा-स्तुति —१२।१९; १४।२४ निर्विकल्पता —१३।८ निर्विकल्प अवस्था और निर्विकल्प बोध—प्रा.; २।४८ परि., ७२ टि.; ६।१५; १४।२ परि.; १८।१७ न्याय —देहली-दीपक-न्याय—९।३३ टि. अरुन्धतीन्याय—१०।४१ परि.; १५।२० सं. बीजवृक्षन्याय—१४।७, १७ 'प्राप्ती सत्यां निषेधः'—१६।८ टि., २३

पञ्चकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और

आनन्दमय कोश)—१३।१ पञ्चगव्य —१८।४४ वि. पञ्चतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)— ७।४, ८, ९ पञ्चदेव (विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य)—१७।४, १४ पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश)— २।२३; १३।५, २०, ३२; १५।९ पञ्चीकृत महाभूत—१३।५ पञ्चमहायज्ञ (ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ)—३।१२ वि. परलोक —१६।८ टि. परिग्रह —४।५, २१; १८।५३ पवित्रता (दे. शुद्धि) ४।१०, ३८; ५।१८ वि.; ७।१५ वि., २८; ८।७; ९।२, १७, ३०, ३१, ३२; १०।१२-१३ परि., ३१; १२।१६; १४।१४ परि.; १८।५, २७, ६७ पागलपन —७।१६ टि.; १५।९ टि.; १८।१२ वि. सीधा-सफल पागल व चतुर पागल—१८।१२ वि. पाठ-क्रमसे अर्थ-क्रम बलवान् —६।११ टि. पातञ्जलयोगदर्शन और गीता —प्रा.; २।४८ परि., ५५ परि., ६।२३, ३६ परि.; १४।७; १८।२८ वि., ७३ पातिव्रतधर्म —३।३५; ७।१२; ९।२६, ३०; १०।४१; १२।१; १७।४, १४; १८।६६ पाप — पापका फल भोगना ही पड़ता है— १८।१२ वि. पापीका उद्धार जल्दी होता है—७।१५; ९।३३ मा. पापी भगवान्में कैसे लगेगा?—७।१५, २८ वि.; ९।३० पाप भजनमें बाधक नहीं—७।२८ वि. डेढ़ पाप और डेढ़ पुण्य—७।२८ पारुष्य (कठोरता)—१६।४ पितर —१।४२ परि.; ८।२४; ९।२५; ११।२२; १७।४ आजान पितर और मर्त्य पितर—१।४२ टि. पिशुनता (चुगली)—१६।२ पीपल —१०।२६; १५।१ पुनर्जन्म —३।४१; ४।१; २।५१; ५।१२, १७; ६।३७ परि., ४०, ४२; ८।६, १५, १६, १९, २५; १३।२१, २३; १४।३, १५, १६, १७, १८, २०; १५।२, ४, ८, ९, १०, ११, टि.; १६।८ टि., २० वि.; १८।४७, ६० पुनर्जन्मके दुःख—८।१५ जीव लौटकर संसारमें क्यों आता है?—८।१६ वि. पुनर्जन्मका कारण—८।१६ परि., २३; ९।३ अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार 'शरीर' की और कर्मके अनुसार 'भोगों' की प्राप्ति—१४।१५, १८ पूर्वजन्म —२।१३; ४।५; ६।४०; १०।३४; १८।१२ वि., ४७ वि.

१२७२

  • साधक-संजीवनी-कोश *

पूर्वजन्मकी याद क्यों नहीं रहती ?—२।१३; ४।५; १०।३४ पूर्वजन्मका ज्ञान—४।५ पृथ्वी —पृथ्वीपर जल और स्थलका कुल भाग—१५।१२ पृथ्वीका अनाजमें रूपान्तर—१३।३० टि. प्रकाश —प्रकाश और प्रकाश्य—२।१२; ५।८-९; ६।१; १३।१७, ३३; १५।१५; १८।१६ टि., २० मा. प्रकाश पहले दीखता है, वस्तु बादमें—१५।१५ वि. भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाश—११।१२ प्रकृति —प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती—३।५ वि., परि., १८, २७; ४।१८; ५।८-९; १३।२९ प्रकृतिके कार्य—१३।१४, १९ प्रकृतिका कार्य स्वतः ह्लासकी तरफ जाता है—९।७ प्रकृति और पुरुष—३।२८; १३।१९-२३, २९ परि., ३१; १८।१२ वि. प्रकृति एवं संसार—४।२४ प्रकृतिमें ज्ञान नहीं—१०।४१ परि., टि. प्रकृतिको अनादि कहनेका कारण—१३।२० परि. प्राकृतिक प्रकोप (अकाल, भूकम्प, महामारी आदि)—का कारण—३।११, १२ वि., १३ प्रकृतिमें भिन्नता—७।१० परि. प्रकृतिके सम्बन्धसे शक्ति क्षीण होना—१०।७ वि. प्रणव (औंकार)—७।८; ८।१३; ९।१७; १०।२५; १७।२४ प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान आदि)—२।१८; ११।१७; १८।७३ प्रमाद —१४।८, १३ आलस्य और प्रमाद—२।४७; ४।२१; १४।८; १८।३९ अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद—१४।८; १८।३९ प्रवृत्ति और निवृत्ति ('करना' और 'न करना')—३।१८ मा., १९ मा., २७; ४।१ वि., १५, १६ मा., १८, २१; ५।४ परि., १३ परि.; ७।२७; १६।७; १८।३०, ५९ प्रवृत्ति और आरम्भ—४।१९ टि.; १४।१२ प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग—४।१६, २९ प्रागभाव और प्रध्वंसभाव —९।६ प्राप्त और प्रतीति —३।१९ मा. प्राण और अपान —४।२९; ५।२७ प्राण, अपान आदि दस प्राणवायु—१५।१४ टि. प्राणशक्ति —७।९; १०।९; १३।६ प्राणशक्ति और इच्छाशक्ति—१५।८ प्राणायाम —४।२७, २९-३०; ५।२७; ८।१०, १४; १८।३३ प्राणी—जरायुज, उद्विज्ज, अण्डज और स्वेदज—३।१४;

१०।३९ परि., १४।४ स्थावर और जंगम—१०।३९; १३।२६ प्रायश्चित्त —७।२६; १६।१; १७।२२ वि.; १८।२-३, १२, ६६ परि. प्रारब्ध —१।४६; २।११, १५ परि.; ३।३७ परि., ४।३७; ५।१४; ६।७; ७।१६ टि.; ११।३३; १६।१, ११, २० वि.; १८।१२ वि. प्रारब्ध और पुरुषार्थ—२।१५ परि., ४७; १६।४; १८।१२ वि. प्रारब्ध और पुरुषार्थ-सम्बन्धी मामिक बात—२।४७ मा. प्रारब्ध और भगवत्कृपा—१८।१२ वि. प्रारब्धजन्य एवं कुपथ्यजन्य रोग—१८।१२ वि. क्या ज्ञानिका प्रारब्ध रहता है ?—१८।१२ वि. प्रार्थना —७।२६; ९।१४, ३४; १०।११ वि.; ११।४० परि.; १२।२०; १३।१३; १५।७ वि.; १६।१, २, ५, २२ परि.; १८।६६ परि. पुकारकी महिमा—७।१५ वि.; ९।३२; ११।५३; १३।१३; १८।६६ वि. 'हे नाथ!' पुकार—१६।२, २२ प्रेम —प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम—५।२१; ६।४७; ७।४, १७, १८, १९ परि.; ८।१५ वि.; ९।३४ वि.; १०।९; १२।१८-१९ वि.; १५।४, ६ परि., १० मा.; १८।५४, ५५ वि., ५७ वि. प्रेम और काम—३।४२ मा., ४३ परि.; १८।५७ वि. प्रेम और ज्ञान—७।१८; १२।२ परि.; १३।२३ परि. प्रेम और श्रद्धा—१२।२, ८ परि.; १७।३ मा. प्रेम और सेवा—१५।२० अ. सा. विरह और मिलन—४।६ कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम—१।२५ कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोगमें भगवत्प्रेम—१८।५५ वि. प्रेम-सम्बन्धी विशेष बात—८।१५ वि.; १२।२ परि.; १८।५५ वि., ५७ वि. दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य रति—१८।५७ वि. माधुर्य रतिका तात्पर्य—१८।५७ टि. प्रेमकी दो अवस्थाएँ—१८।५५ परि. भगवान्को माने बिना मुक्ति तो हो सकती है, पर प्रेमकी प्राप्ति नहीं हो सकती—७।२९; ८।१५ वि. बल —१।१०; ७।११ बाजा —(खाल, तार, फूंक व ताल)—१८।१२ बुराईरहित होनेके उपाय —५।३ मा.; ६।९ वि. ब्रह्म ईश्वरका एक अंश (अंग) है —७।३० परि.;

  • विषयानुक्रमणिका *

१२७३

१३। १२ परि.; १४। २६ परि., २७ परि.;

१५। ७ परि.

ब्रह्मचर्य - ६। १४; ७। ११; ८। ११; १७। ४, १४

ब्रह्मभूत अवस्था - ६। ४७ वि.

ब्रह्मलोक - ८। १६; १४। १४ परि.; १५। २, ५

ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके दर्शनसे मुक्ति क्यों नहीं

होती ? - ८। १६

ब्रह्मलोकमें जानेवाले दो प्रकारके पुरुष - ८। १६

वि., परि.

बाह्य और आभ्यन्तर - ५। २४, २७

भक्त - कामनाको लेकर भक्तकी तीन श्रेणियाँ - ७। १६ वि.

भक्त-सम्बन्धी विशेष बात - ७। १६ वि.;

१२। १३-१४ परि.

भक्त वर्ण-आश्रम तथा शास्त्रीय विधि-निषेधसे ऊँचा

उठ जाता है - १८। ५८

भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता - १८। ५८

भगवान् भी भक्तके ऋणी हो जाते हैं - १०। ११ वि.

भक्तका शरीर चिन्मय होना - ७। १९; १८। ६६ वि.

भक्तका पतन नहीं होता - ९। ३१

भक्त स्वयं होता है, शरीर नहीं - ९। ३२ मा.

भगवान् भक्तकी पूर्व इच्छा पूरी करते हैं - ११। ५४

भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करें - १८। ९ टि.

भक्ति - साधन-भक्ति और साध्य-भक्ति - १२। २ परि.;

१३। १०; १८। ५० परि.

भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति या ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति ? -

१३। १०; १८। ५० परि.

भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य) -

१८। ५७

भगवान्में भक्ति कैसे दृढ़ हो ? - १०। १७, १६, १८

भगवतपरायणता - २। ६१; ५। १७; ६। १४ परि.; ८। १४;

९। ३४; ११। ५५ परि.; १२। ६, २०;

१८। ५६, ५७

भगवत्प्राप्ति - भगवत्प्राप्तिकी सुगमता - ७। ३ टि.; ८। १४,

२५; ९। २, ३ वि., ६, ३२; १०। ३; १२। ९, १२;

१३। २८ मा.; १५। ११ मा.; १८। ६१ वि.

भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात - ३। २० मा.;

४। ३९ वि.; ५। १२ मा.; ११। ५४ वि.;

१२। ८ वि., १२ वि.; १५। १५ वि., २०, अ.सा.

भगवत्प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती - प्रा.; ३। २०;

४। २, ९ मा., १२; ५। ७, १२ मा., १३;

७। ३ टि.; ११। ४८, ५३; १२। १२ वि.;

१५। ४, ११, १५

भगवान्का हृदयमें अनुभव करनेका उपाय -

१३। १७

भगवत्प्राप्तिमें जाति या वर्णकी मुख्यता नहीं -

९। ३२, ३३; १८। ४४

भगवत्प्राप्तिका तात्पर्य - १२। १२ वि.

पन्द्रहवें अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके छ: उपायोंका

वर्णन - १५। २०

भगवत्प्राप्ति होनेपर कोई विकार नहीं रहता - १२। १६

भगवान् - 'भगवान्' शब्दका अर्थ - २। २

भगवान् और उनकी बनायी सृष्टिमें पक्षपात नहीं -

४। ८; ५। १८ वि.; ९। २९; १५। १७ मा.

भगवान्का दुष्टों (अज्ञान, माया आदि) से विरोध

नहीं है - ४। ८

भगवान् न्यायकारी और दयालु दोनों हैं - ८। ६

वि.; ९। ३१

भगवान् और देवता - ४। ९ परि., १२, १३;

७। २२-२३, २४ परि.; १०। २; ११। १३, ५२ परि.

भगवान् और जीव - २। १७ टि., परि.; ७। १९ परि.;

१२। ३-४ वि., परि.; १५। ११, १८

भगवान् और जगत् - ९। ४-५

भगवान्, जीव और जगत् - २। ५३; ४। ३५; ७। २८,

३०, अ. सा.; ८। ४; १२। ३-४ परि.;

१३। २; १५। १, १०, १६, २०, अ.सा.

भगवान् सबका पालन-पोषण करते हैं - १३। १४;

१५। १७ मा.

भगवान् सब मनुष्योंको खींच रहे हैं - १५। ७;

१७। १

भगवान्में सभी प्राणी आकृष्ट क्यों नहीं होते ? -

१२। १६

भगवान्की आवश्यकता क्यों है ? - ७। ३ परि.

भगवान्का सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार तथा

सगुण-साकाररूप - ७। ३० वि.; ११। १८ परि.

भगवान्के विध्यात्मक और निषेधात्मक विशेषण -

१२। ३-४ वि.

भगवान् सबके भोक्ता और मालिक कैसे ? -

९। २४ वि.

भगवान्का अवतार - ३। २३, ३३; ४। ३, ६-११;

७। १९ मा., २४, २५; ८। १५; ९। ११;

१०। २; ११। १८, ३६, ४५, ४९ परि.; १३। १४;

१४। २७ टि.; १५। २०; १८। ५५

भगवान्का जगत्-रूपसे प्रथम अवतार - ४। ९ परि.;

७। १९; ११। ४९ परि.; १८। ४६ परि.

अवतार-सम्बन्धी विशेष बात - ४। ६

अभी भगवान् अवतार क्यों नहीं ले रहे ? - ४। ७

भगवान् दुष्टोंका विनाश क्यों करते हैं - ४। ८

१२७४

  • साधक-संजीवनी-कोश *

सन्त-महात्माओंके रूपमें भगवान्का अवतार— ४१८; ८१९ भगवान् किन पापियोंको मारनेके लिये अवतार लेते हैं?—४१८ भगवान् बिना अवतार लिये कार्य क्यों नहीं करते?— ४१८; १८१६ भगवान्के जन्म और मनुष्यके जन्ममें अन्तर— ४१८-९; ९११ भगवान् नित्यकिशोर (पन्द्रह वर्षकी अवस्थावाले) रहते हैं—४१६ जैसा रूप, वैसी लीला—४१९ टि.; १११४९ परि. अर्चावतार—१११४९ परि.

भगवान्का परमधाम —८१२, २५ वि.; १११३८; १४१४ परि.; १५११, ६; १८१५६, ६२, ७९ भगवान्का धाम ही हमारा धाम है—९१३ वि.; १५१६ परि.

भगवान्की नित्यलीला —१११५४

भगवान् श्रीकृष्ण —‘कृष्ण’ शब्दका अर्थ—९१४९; ६१३७; ९७११; १८१६६ वि.

श्रीकृष्ण द्विज थे या चतुर्भुज?—१११५०, ५१ परि. राधा और कृष्ण—प्रा.; ४१६; ९१३४ वि.; १८१५७ वि. रासलीला—४१६, ९ परि.

श्रीकृष्ण ही ‘समग्र’ भगवान् हैं—न. नि.; ६१४७ परि.; ७१३०; ८११६; ९१११ परि.; ३४, सार; १०११२- १३ परि., १७ परि., २० परि.; १११७ परि., १२१३-४ परि.; १५१२० परि.

श्रीकृष्णने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया, युद्ध नहीं कराया—९१४६

श्रीकृष्ण और ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म तथा ऐकान्तिक सुख एक ही हैं—१४१२७

श्रीकृष्णद्वारा गोपालन—१८१४४

श्रीकृष्ण और अन्तर्यामी परमात्मा एक ही हैं— १८१६२

श्रीकृष्णकी वाणीकी विलक्षणता—१०११ परि.; १८१७६ परि.

श्रीकृष्णको विशेषरूपसे जाननेवाले पुरुष—१११९ परि., २४

भगवान्की शक्ति —४११ वि.; ८११९ परि., ९११०; १२१३-४; १५१७ परि., १२, १३, १४; १८१६६ वि.

संधिनि-संवित्-आह्लादिनी —४१६

प्रकृति—४१६; ७१४, ५ परि., ३०, अ.सा.; ८११९ परि.; ९१८, १०; १०१४९ परि.; १११३८ परि.; १३१४४, १९-२० परि.; १४१३-४

राधाजी, सीताजी आदि—४१६ ब्रह्मविद्या, भक्ति आदि—४१६ ऐश्वर्य और माधुर्य-शक्ति—४१६; १११४९ परि. सौन्दर्यशक्ति—४१६ प्रेमशक्ति—८११९ परि. सर्वभूतसुहृता-शक्ति—३१२१; ४११ वि.; १८११२ वि.

भगवान्का विराटरूप —विराटरूप प्रत्यक्ष दिखाया था, समझाया नहीं था—१११४८ विराटरूपके स्तर—१११४५ विराटरूप और संसार एक हैं या अलग-अलग?— १११३१, ४९ परि.

विराटरूपको देखकर अर्जुन डरे क्यों?—१११२४

भगवान्के सिवाय कुछ नहीं (‘वासुदेवः सर्वम्’)

न. नि.; २१७० परि.; ३१३४ परि.; ४१९ परि., ११ परि., ३५ परि.; ५११९ परि.; ६१९ परि., ३०, ३१, ३५; ७१५ परि., ७, ८ परि., १० वि., परि., १२ परि., १७ परि., २३ वि., २६ परि., २९-३०; ८१४ वि., १६ परि.; ५, २२; ९१४-५, ९, १६-१९, २२, २४, २५ परि.; १०१४-५ वि., ७, ८, १०, १५ परि., १७ परि., २०, ३९, ४०, ४१; १११४ परि., ७ परि., ३७ परि., ४० परि., ४९ परि.; १२१२ परि., ८ परि.; १५ परि.; १३११३, १४, १५, १६ परि.; १५११, १९ परि.; १६१६ परि.

क्या निषिद्ध भी भगवान्का स्वरूप है?—७१११ परि., १२; १२११६

अनुभव करनेका उपाय—१११४० परि.

अनुभवकी कसौटी—९१४-५ मा.

भय —१११०; ५१२८; ६११४; १११४९; १३१३४; १८१३०

भयके दो कारण—१२११५; १६११

भय-रहित होना—१११०; ५१२८; १२११५; १३१७ वि.; १६११; १८१६६ वि.

भारत-भूमिकी महिमा —१६१६

भारतपर विधर्मियोंका अधिकार होनेमें कारण— १८१४३ परि.

भूत और प्रेत —१७१४

भूत-भविष्य-वर्तमान —२११२ परि.; ५१९ परि.; ६१४, १४; ७१२६; १११२७ परि.

भोग और संग्रह —११३५; २१४४, ४८ वि.; ३१३३, ३६, ३९; ४१२१, ३३ टि.; ५१३, ७ वि.; ७१३, ५; ८१२८; ९११४, २४; १११३६; १२१२, १६; १३१७, १५; १५११, ९ वि., १०, ११;

  • विषयानुक्रमणिका *

१२७५

१६। २, ५ मा., ६, ७, ११ परि., १२, २१; १८। ३९

टि., ४७ वि.

भोग भोगनेमें हिंसा—३। १०-११ मा., १६;

१६। २; १८। २७

भोग भोगना अभक्ष्य-भक्षणसे भी अधिक बुरा-

६। ३६

भोग और भगवान्—५। २२

भोगके आठ प्रकार (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान,

बड़ाई और आराम)—२। ४४; १८। १२ वि.

परिग्रह (संग्रह)-का स्वरूप—१८। ५३

भोजन—सात्त्विक, राजस और तामस भोजन—१७। ७-१०

भोजनके लिये आवश्यक विचार—१७। १०

भोजनमें दृष्टिदोष दूर करनेका उपाय—१७। १०

हित, मित और मेध्य भोजन—१८। ५१-५३

युक्त आहार—६। १६-१७

मद—१६। १०

मदिरा-पानके दोष—१७। १० टि.

मन—मनको एकाग्र करनेके उपाय—६। १२, २६, ३५,

३६; १३। ७

मनको भगवान्में लगानेके उपाय—६। १०; ७। १

मन वहीं लगेगा, जहाँ स्वयं लगेगा—१०। ९

मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेके उपाय—१२। ८

मनकी एकाग्रतासे लाभ—४। २७; १२। २

मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय—१७। १६

मनकी और बुद्धिकी स्थिरता—५। १९ परि.; १८। २९

मन और चित्त—१०। ९

मनुष्य—विचारशील, पुण्यात्मा व साधारण मनुष्य—२। २

मनुष्यजन्म सब जन्मोंका आदि तथा अन्तिम जन्म है—

३। १३ टि.; ७। १९; ९। ३३

भोगी मनुष्य पशुओंसे भी नीचा—३। १६;

७। १५; १६। ६, ७ वि., १९

मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है-प्रा.; २। ४७;

४। १२; ५। १४, १५; ७। १६, २६; ८। ४

टि., ६; ११। ३४ वि.; १५। २; १८। १२ टि.,

६०, ६१, ७३ मा.

मनुष्यमात्र परमात्माके पूजनका अधिकारी है—

१८। ४६

मल-विक्षेप-आवरण—३। ३८ वि.; ४। ३३; ५। ११;

१६। १; १८। १६ परि.

महारथी—१। ६

मान-अपमान—६। ७; १४। २५; १५। ५; १६। १०

अपमान होनेमें कारण—११। ४४

मानिता—१३। ७; १६। ३

मानिता और अतिमानिता—१६। ३

सांसारिक और पारमार्थिक मानिता—१६। ३

मुक्ति—उद्धार-सम्बन्धी विशेष बात—६। ५ वि.

क्रममुक्ति और सद्योमुक्ति—८। १६ वि., परि., २३, २४

मुक्तिमें सूक्ष्म अहम्—४। ३५ परि.; ७। ५ परि., १६

टि., १८ परि., १९ परि.; १२। २ परि.;

१५। ६ परि., १० मा.; १८। ५५

जो मुक्त है, वही मुक्त होता है—१८। ७४

मृगछाला—६। ११

मृत्यु—अकाल-मृत्यु और आकस्मिक-मृत्यु—१८। १२ वि.

मरणासन्न व्यक्तिके प्रति कर्तव्य—८। ५

अन्तकालमें तत्त्वका अनुभव कैसे?—२। ७२; ८। ५

अन्तकालीन गतिके विषयमें विशेष बात—८। ६ वि.

योगबलसे शरीर छोड़ना—८। १०, १२-१३

मेरा कुछ नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिये एवं मुझे कुछ

नहीं करना है—

२। ७२ परि.; ३। ३ परि., ४३; ४। ३, २१, २२;

५। २; ७। ५ वि.; १२। १२; १५। १७ परि., २० परि.;

१८। १२, १३ टि.

मैं कौन हूँ?—१२। ८ वि.

मैं-तू-यह-वह—६। २५ परि.; ७। १९ परि.; ९। ५ परि.;

१३। ८ टि.; १५। ११ मा.; १८। २० मा.

मोह—१। २५; २। ५२, ६३, ७२; ४। ३५; ११। १;

१५। ५, १०; १८। ७३

मोह और विवेक—२। ७२

मोहके दो प्रकार—१४। २२

मौन—१०। ३८; १२। १९; १७। १६

यक्ष और राक्षस—१७। ४

यज्ञ—३। ९, १०, १२, १३, १४-१५; ४। २३-३३; ९। १६;

१०। २५; १६। १; १७। ४ परि., ११-१३; १८। ७०

द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ—४। २८, ३३, ३६;

१८। ४६, ७०

यज्ञ-सम्बन्धी विशेष बात—४। २९ वि.

यज्ञमें पशु-हिंसाका फल—१७। २२ वि.

यत्न—१५। ११

यम—(अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)—

४। २८; ९। ११ परि.; १७। १४

युग—(सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि)—

चारों युगोंमें क्रमशः धर्मका ह्रास—४। ७

युगों आदिकी गणना—८। १७ टि.; १०। ६ टि.

कलियुगमें 'दान' की मुख्यता—१७। २२

योग—'योग' शब्दके अर्थ-प्रा.; १०। ७ वि.

योगकी परिभाषा—६। २३ परि.; १८। ७५

१२७६ * साधक-संजीवनी-कोश *

योग और वियोग-न. नि.; प्रा.; ६। २३; ९। ३४ वि.; १८। ५७, ७३

नित्ययोग और नित्यवियोग-२। १६ परि.; ६। २३.; ७। १८; १८। ७३ मा.

नित्ययोगमें योग, नित्ययोगमें वियोग, वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें

वियोग-१८। ५७ वि.

योग और भोग-६। ९ परि., १७; १०। १६, ४१ परि.; १८। ३९ टि.

योगके यम-नियमदि आठ अंग-९। ११ परि.; १७। १४

योगी-युञ्जान योगी और युक्त योगी-४। ५; ६। ३९; ७। २६; १४। २

योगी और भोगी-६। ४६ परि.

योगियोंकी तीन श्रेणियाँ (योगवित्, योगवित्त और योगवित्तम)-१२। १ परि.

वास्तविक योगी-६। १; १२। १४

योगक्षेम-२। ४५; ९। २२, ३१ परि.

योगमाया-४। ६

रस (दे. आनन्द)-

नाशवान् और अविनाशी रस-२। ५९ परि.

शान्त, अखण्ड और अनन्त-रस-६। ३ परि., ४७ वि.; ७। २ परि., ३ परि.; ८। १९ परि., १०। ११ परि., १२। २, ८ परि.; १५। ४ परि., ८ परि.; १८। ५४ परि., ६६ परि.

ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन-११। ४४

वर्णात्मक शब्दोंके दस रस-१८। १२

भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य)-१८। ५७

राग-द्वेष-रागके अनेक रूप (वासना, आसक्ति, कामना, आशा, लोभ व तृष्णा)-२। ५६; ४। १०

राग-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ३९ वि.

राग-द्वेषपर विजय पानेके उपाय-३। ३४; १८। ६०

राग-द्वेष अन्तःकरणके विकार हैं, धर्म नहीं-१२। २०

रुचि, विश्वास और योग्यता-२। ५३; ७। ३० टि.; ८। ४ वि., २१; ९। १५, १६; १२। ५, १२, १८-२० वि.; १५। ५ वि.

लज्जा-१६। २

‘लेना’ और ‘देना’-३। १०-११, २१; ४। १८; ११। २९ परि.

लोक-३। २०; ७। ३० परि.; १३। ३३; १५। ७, १६, १८

लोकसंग्रह-३। २०, २५-२६; ४। २१, २५ परि., ३० वि.

लोभ-१। ३८; १४। १२, १७; १६। २१

लौकिक और अलौकिक-न. नि.; ३। ३ परि.; ४। ३५ परि., ३८ परि.; ५। ५ परि.; ६। ४७ परि.; ७। १३ परि., २४ परि., २५ परि., ३० परि.; ९। १ परि.; १०। ११ परि.; ११। ३७ परि., ४९ परि.; १२। २ परि.; १५। १६ परि., १९ परि., २० परि.; १६। ६ परि., ७ परि.; १७। २५ परि., २७; १८। ९ परि.

वक्ता और श्रोता-३। १; १०। १, ९, १९, ३६; १६। १; १८। ६४ सं., ६८, ७०, ७१

वक्ताके दोष-१८। ७१

व्याख्यान देनेकी कला-२। ३८ वि.

वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र)-२। ५; ३। ३५; ४। १३; ५। १८ वि.; ६। ३२; ७। ३०; ९। ३२-३३; १५। ७; १६। १०, २४; १७। १४; १८। १२, १७, ३१, ४१-४४, ४५ परि., ४७, ४८, ५८

पशु, पक्षी, वृक्ष आदिमें वर्णभेद-४। १३

गुणोंकी तारतम्यतासे वर्ण-भेद-१८। ४१

चारों वर्णोंके स्वाभाविक कर्म-१८। ४२-४४

स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य-१८। ४४

वर्ण-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ४४

ऊँच-नीच वर्णोंमें जन्मका कारण-४। १३; १८। ४४

वर्णसंकरता-१। ४१; ३। २४ टि.; १८। ४२ परि.

वाद, जल्प और वितण्डा-१०। ३२

वाणीके दोष (भ्रम, प्रमाद, लिप्स व करणापाटव)-१८। ७१

विकारी और स्वतःसिद्ध सत्ता-२। २०; १५। ११

विचार-विचार करना और विचार उदय होना-१८। ७३ परि.

विचार करनेसे लाभ-२। ११ परि.

विवर्तवाद-९। ६ परि.

विवेक-४। ३, १६; ५। २३; ११। ४९; १३। ३४

विवेकविरोधी सम्बन्ध-२। ३० परि.

विवेक और मोह-२। ७२ वि.

विवेक और श्रद्धा-७। १२ वि.; ८। ४ वि.; १२। २०

विवेक और विश्वास-९। १९ परि.

विवेक और भाव-७। १९ मा.

विषय-३। ४३ परि.; १५। २

विषय-सेवनसे हानि-१५। २, ९, १०

वृत्ति (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा व स्मृति)-१८। ७३

  • विषयानुक्रमणिका *

१२७७

वेद (ऋग्वेद-सामवेद-यजुर्वेद-अथर्ववेद)—४।३२; ९।१७; १०।२२, ३५; १३।४; १५।१, १५, १८; १७।२४

वैराग्य —२।४७ परि., ५२, ५८; ३।४ मा., ३४, ३५; ४।३३; ६।३५; १२।३-४, १८-१९ वि.; १३।८, १३ वि; १४।११; १८।८, ५१-५३, ७० वैराग्य होनेके उपाय—६।३५; १३।८ वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात—१५।३

व्यष्टि और समष्टि —३।१२, १८, २७; ५।८, ११; ७।४-५; ९।८; १३।६, २०, ३१; १४।२२ वि.; १५।३, ११ मा. १६; १८।१५

शकुन —१।३१ टि.

शब्द—वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्द —१०।१९; १८।१२ वि.

शब्दकी शक्ति—१०।१९ टि.; १५।९

शम —४।३३; १०।४; १८।४१

शरणगति—शरणगतिके पर्याय (आश्रय, अवलम्बन, अधीनता, प्रपत्ति और सहारा)—७।१ शरणगति-सम्बन्धी विशेष बात—७।१५ वि.; ९।३४; १८।६६ वि. शरणगतिका रहस्य—१८।६६ शरणगति और धर्म (कर्तव्य-कर्म)—१८।६६ परि.

शरीर—स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर —२।१३, २९, ३० परि.; ३।२२, ३४, ३७, ४२ मा.; ४।१४, १८; ६।१, ८; ८।४, ६; १३।१, ३३ परि.; १५।७ परि., १०, ११, १६; १८।६, १२, १३ टि., ३५ शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धि—३।४२-४३ शरीर, मन और वाणीकी सरलता—१३।७ शरीरके साथ अभेदभावसे तथा भेदभावसे सम्बन्ध—१४।५ वि.; १५।११ टि.

भक्तका शरीर चिन्मय होना—७।१९; १८।६६ वि.

शान्ति—शान्ति और परमशान्ति —६।१५ शान्तिका उपभोग न करनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति—५।१२; ६।३ परि.; १४।१९ परि.; १८।१३ टि., ५४

शाप-वरदान —७।१९; १६।१

शासन —८।९; १०।७ वि., ४१ वि.; १८।४३

शास्त्र—अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र —१।३६ टि. धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्र—२।३९ परि. सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र—७।१५ टि. शास्त्रीय मोह (मतभेद)—२।५३ शास्त्रीय दृष्टि और साधककी दृष्टि—२।७१; ३।२८; ५।१०; ७।२७

सीखना (पढ़ाई) और अनुभव करना—२।३० वि. शास्त्र पढ़े बिना कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा?—१६।२४ परि.

शिक्षा देनेकी रीति —३।२६

शुद्धि (दे. पवित्रता)—५।११ परि.; ६।४५; ८।७; १३।७; १६।३, ७, २२; १७।१४, २२ वि.; १६।२२; १८।१५, ४२ भूमिकी शुद्धि—६।११ शारीरिक, वाचिक, कौटुम्बिक और आर्थिक शुद्धि—१६।३ अन्तःकरण (मन-बुद्धि)-की शुद्धि—१।४१; ५।७; ६।१२, ३६; १३।७; १६।१; १७।१४, २२ टि.; १८।१२, १६ परि.

श्रद्धा —२।१८; ४।३३, ३९; ६।५ वि.; ७।२१; १२।२, २०; १७।२-३, २८; १८।७३ टि. श्रद्धा-सम्बन्धी विशेष बात—१७।३ मा.

श्राद्ध-तर्पण —१।४२; ९।२५ वि.; १७।४; १८।४४

षड्रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर)—१६।२१

षड्विकार (उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना)—२।२०

संकल्प —४।१९; ५।२३; ६।२, ४।२४, २५; १२।९; १३।७; १५।९; १६।५; १८।१२ टि.

संकल्पसे हानि—६।४

संकल्पोंके त्यागके उपाय—६।४

भगवान्का संकल्प—७।१९; १६।५

संन्यासी —५।३; ६।१

संयम —१०।७ वि.

संशय —३।४०; ४।३२, ४०; १०।७ परि.; १८।१० संशय और विपर्यय—१२।१४

संसार —संसारमें परिवर्तन आवश्यक है—२।२७ परि. संसारको दो बार नहीं देख सकते—२।१६; १०।३; १३।१ संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय—१५।३

संसार अभावरूप ही है—४।२४ मा.; १३।२८ मा.; १७।२६ परि; १८।७३ मा.

संस्कार —३।६; ६।४०; ९।३०; १८।१४, ४१, ४७ वि.

सती —१६।३

सत् और असत् —२।१६; ९।१९ परि.; ११।३७; १३।१२; १६।५; १७।२६ परि., २७ परि., २८

सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन —१५।१५ वि.

सत्य - १०।४; १६।२; १७।१५

सत्-चित्-आनन्द - ३।४३ मा.; ५।३; १२।१३-१४

परि.; १३।८, १८ परि., २० परि.; १४।२ परि.;

१६।५ मा.; १८।३९ वि.

सन्त-महात्मा - अल्पआत्मा, आत्मा और महात्मा - ८।१५;

९।१३

अवधूत और आचार्य - ३।२१

सन्त-महात्मा अपने-आपको कब प्रकट करते हैं? -

४।५ टि.

महात्माओंकी महिमा - ७।१९

महात्माओंका अपने दर्जेसे नीचे उतरना - ७।१९

सन्त-कृपा - ७।१५; १६।२

सन्त-महात्मा सुखी-दुःखी नहीं होते - १६।२

महात्माओंकी आज्ञा माननेसे लाभ - १३।२५

सन्त-महात्माओंपर श्रद्धा करनेसे लाभ - ६।५ वि.

सन्त-महात्माओंमें दोषदृष्टि करनेसे हानि -

१३। २५

सन्तति-निरोध - ७।११; १८।३२ परि.

समग्र - न. नि.; २।७२ परि.; ३।३० परि.; ५।१० परि.;

६।४७; ७।१, ३ परि., ७ परि., १६ परि., २८,

२९-३०; ८।४ परि., १६ परि.; ९।४, ९ परि., १५

परि., अ. सा.; १०।१७ परि., ४० परि.; ११।४

परि., १८ परि., २२ परि., ३० परि., ३७ परि., ५१

परि., ५४ परि., ५५ परि.; १२।५ परि., ७ परि;

१३।१२ परि., १४ परि., १६ परि., १७ परि.,

१८ परि., २० परि., ३० परि.; १४।२६ परि.,

२७ परि.; १५।७ परि., १९ परि., २० परि.,

१८।५५, ६३ परि., ६५ परि.

भगवान्‌के समग्ररूप-सम्बन्धी विशेष बात - ७।३०

समग्रका ज्ञान भक्तिसे ही हो सकता है -

१३। १८ परि.

समता - साधनरूप और साध्यरूप समता - २।४८; ६।२३

अन्तःकरण और स्वरूपकी समता - २।४० वि.,

४८; ४।२८; ५।९९

समता निरन्तर रहती है - ३।१९ मा.; १८।५७

समता-सम्बन्धी विशेष बात - २।४० वि., ४८ वि.;

५।९८ वि.; ६।९ वि., परि., ३२; १२।३-४

धनके बँटवारेमें समता - १२।१८; १४।२५

समता रखनेयोग्य स्थल - १२।१९; १४।२५

समाधि - प्रा.; २।३० परि.; ३।१८ मा., ३९ परि.;

४।२७; ६।१८ टि., २०, २५ परि., २६ परि., ३६

मा.; १२।१२; १३।३३ परि.; १५।११; १८।२२

टि., ३६, ३९ टि.

संप्रज्ञात व असंप्रज्ञात और सबीज व निर्बीज

समाधि - ६।२०

समाधि और निद्रा - ४।२७; १८।३९ टि.

समाधि और सुषुप्ति - ६।१९

समाधि, सुषुप्ति व मूर्च्छा भी क्रिया होती है -

३।५ परि., १८, २७; ४।१८; १५।११ टि.

जाग्रत्-सुषुप्ति और समाधि - १८।१२ टि.

समाधि भी एक कर्म है - ३।५, १८ टि.; ४।१६ मा.;

१८।११

समाधिके चार दोष - ६।२५ परि.

सहज समाधि (सहजावस्था) - प्रा./टि.; ३।५ परि.,

१८ टि.; ६।३६; १३।३३ टि.; १५।११

सम्बन्धी न रहनेपर भी सम्बन्ध रहता है - २।१४;

५।२१; ८।१९; ९।९

सर्प और नाग - १०।२९

सहिष्णुता - द्वन्द्व, वेग, परमत व परोत्कर्ष-सहिष्णुता - १८।६७

असहिष्णुता और असूया - १८।६७ टि.

साधक - साधकोंके दो प्रकार - १२।५ टि.

मस्तिष्क (विवेक)-प्रधान और हृदय (श्रद्धा)-प्रधान

साधक - ८।४ वि.

भावप्रधान और विवेकप्रधान जिज्ञासु - १३।१०

श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ - १३।२५

साधकोंके प्रति भगवान्‌की प्रियता - ६।४०

युक्त, युक्ततर और युक्ततम साधक - ६।४७

साधकपर खण्डन-मण्डनका असर नहीं पड़ना

चाहिये - ९।४-५ मा.

साधकके लिये साम्प्रदायिक पक्षपात बाधक

है - १२।७

साधन - साधन-सम्बन्धी विशेष बात - ३।८ मा.; ५।५

वि.; ११।२, ३४ वि., ५४; १२।१ १२ वि.;

१५।४, ७ परि.

साधनका आग्रह (राग) और तत्परता (रुचि) -

३।८ मा., ३४ टि.; १६।२

‘साधनपंचक’ - ११।५५

साधनजन्य सुखभोगसे हानि - ३।३७ टि.;

११।४७ वि.; १४।१३; १८।१३ टि., ३६

साधु - ४।८; १८।११

साधु और असाधु - ४।८

साधु पुरुष दुःख क्यों पाते हैं? - ४।८

साम्प्रदायिकता - २।५३; १२।७

सिद्धान्त - ३।३१, ३३ टि.; ७।५ परि.

मत और सिद्धान्त - ३।३१ परि.

सिद्धि (अणिमा, गरिमादि) - प्रा.; ६।१, १२, २६ परि.,

३६ मा.; ७।३ टि.; १०।१०; १२।८; १४।१;

१६।५; १८।२९, ५०

सिनेमा देखनेसे हानि - ५।२

  • विषयानुक्रमणिका *

१२७९

सीमा (कालकृत और देशकृत)—१०।४०; ११।१९; १५।३ सुख (दे. दुःख)—

बाहरका और भीतरका सुख—६।७; १२।१३ बाहरके सुख-दुःखमें 'सम' तथा भीतरके सुख-दुःखसे 'रहित' होना—५।३ परि.; ६।७; १२।१८ सुख वस्तुके मनसे निकलनेसे—३।१७, ३९; १५।५ वि., १८।३९ वि., ५७ टि.

सुख पदार्थके सम्बन्ध-विच्छेदसे—३।३९; ५।२१; ६।१७; १०।४१

सबसे अधिक सुख किसको है?—६।२०; ८।१६ सुखीको देखकर प्रसन्न व दुःखीको देखकर दुःखी होना—३।३४; ५।७ वि., १८; ६।३२ परि.; १६।२

सात्विक, राजस व तामस सुख—१८।३७—३९ सुख-दुःख-सम्बन्धी विशेष बात—२।१५ वि., ४७ मा.; १३।२०, २१ परि.

सुषुप्ति —२।१३, ७१ परि.; ३।२८, ३९; ५।३, १२, २१; ७।४; ८।१९ परि.; ९।३० परि.

सुहृद और मित्र —६।९

सुष्टि-रचना —प्रा.; ३।११ परि., २२; ४।१, १३-१४; ५।१४; ७।४—६, ८, ९ परि., १२, १९, २९; ८।३, ४, १७-१८; ९।६—१०, १३, २४; १०।८, ३९ परि.; १३।५, १४, १९; १४।३, ७; १५।१ जीवकृत सुष्टि—७।५ परि.; ५।१४ परि.; ८।१८ बिन्दुज और नादज प्रजा—६।४२; १०।६ सुष्टिमें भिन्नता—७।१० परि. मनुष्यशरीरकी रचना—१८।७३ मा. सुष्टिचक्र—३।१४—१६

सेवा —सेवा-सम्बन्धी विशेष बात—३।३४ मा.; ५।७ वि.; १८।४५ वि. धनके बिना सेवा कैसे होगी?—३।३४ मा. शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सेवा—३।९ टि., १३; ६।१ सेवा और प्रेम—१५।२०, अ. सा. सेवा और विवेक—२।४७ सेवा और सेवावृत्ति—१८।४४ नौकरी, सेवा और पूजा—१८।४५ वि. सेवा और पूजा—१८।४५ वि., ४६ परि., ६५ देश-समाजकी सेवा—१२।११ सेवा लेनेसे पुण्योका नाश—१६।२

सोमलता —९।२०

स्थूल और सूक्ष्म —१४।१४

स्पृहा —२।७१; ३।३९; १४।१२; १८।४९

स्फुरणा —३।३४; ५।२३ परि.; ६।२, ४, २४, ३५; १३।७; १८।१२

स्मरण —बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य—८।७ वि. अचिन्त्यका स्मरण कैसे करें?—८।९ भगवान्का निरन्तर स्मरण कैसे हो?—८।१४ परि.

स्मृति —२।७१; ३।२८; ८।१४ परि.; १०।३४; १२।१; १५।४, १५; १८।७३ स्मृति और विस्मृति—१२।१, ८; १५।४; १८।७३ विस्मृति कबसे हुई?—१८।७३ मा. स्मृति और चिन्तन—१५।१५; १८।७३ परि.

क्लिष्ट और अक्लिष्ट स्मृति—१८।७३ स्वरूपकी व अन्तःकरणकी स्मृति—१५।१५; १८।७३ कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोगकी स्मृति—१८।७३ स्मृति-सम्बन्धी मार्मिक बात—१८।७३ मा.

'स्व' और 'पर' —३।९ टि., १९, २२, ३५ मा.; ४।१२, १८, १९; ५।१९; ६।४३ परि.; १५।६ परि.; १८।४०, ४८, ६० परि.

स्वभाव —३।३३, ३४; ५।१४; ६।४०; ७।४, २०, २८; ८।४ टि.; ९।८, १२, १३; १४।१५, १८; १६।२, ४, १९, २० वि., २४; १८।१२ वि., ४१, ४२ परि., ४४, ४७, ६०, ६१ आसुरी, राक्षसी और मोहिनी स्वभाव—९।१२ स्वभावको सुधारनेके उपाय—१८।१२ वि., ६० वि. स्वभाव-भेदका कारण—१६।२० वि. स्व-स्वभाव और पर-स्वभाव—१८।६० परि. स्वभावकी परवशता (प्रबलता)—१८।६० वि.

स्वयं —अहम्से परे स्वरूपको कैसे जानें?—३।२८ स्वयंकी स्वीकृति—९।३० परि.; १३।१५ परि. स्वयंका पुरुषार्थ—१५।७ परि. स्वयंका और बुद्धिका निश्चय—९।३०; १२।८ स्वयंमें परमात्माको देखना—४।३८, ३९; १३।२४; १५।४, ११ स्वयं सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—१३।२७ परि., ३२ परि.

स्वाध्याय —४।२८; १६।१; १७।१५

स्वाभाविक और अस्वाभाविक —७।१३ ह

हिंसा —इक्यासी प्रकारकी हिंसा—१३।७ अपने विचारकी हिंसा—१३।७ भोग भोगनेसे हिंसा—३।१०-११ मा., १६; १६।२; १८।२७ स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोहको लेकर हिंसा—१७।१४ यज्ञमें पशु-हिंसाका फल—१७।२२ वि.

हृदय —१५।१५

हृदयमें परमात्माका अनुभव करनेका उपाय—१३।१७

साधक-संजीवनीमें आयी

गीता-सम्बन्धी मुख्य बातें

१. गीतामें भक्तिकी विशेषता—न. नि.; १८। ५५ वि.

२. गीतामें आये विलक्षण श्लोक—न.नि.

३. गीताका बिना पुस्तक उलटा पाठ करनेसे शान्ति—प्रा.

४. गीतामें करणसापेक्ष शैलीवाले श्लोक—प्रा.

५. गीतामें ज्ञानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। १५

६. गीतामें 'तस्मात्' पदका प्रयोग—२। १८ टि.

७. गीतामें कर्मयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। ७१

८. गीतामें भगवान्‌के अज, अव्यय और ईश्वर—इन तीनों

रूपोंको जानने और न जाननेकी बात—४। ६ टि.

९. गीतामें मुख्य निवृत्तिपरक श्लोक—४। २१

१०. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगका मुख्य

श्लोक—४। २३

११. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे सम्पूर्ण

पापोंका नाश बतानेवाले श्लोक—४। २३ परि.;

७। १९; १६। ५

१२. गीतामें कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मप्राप्ति

बतानेवाले श्लोक—५। ५ परि.

१३. गीतामें सभी साधनोंकी कसौटी बतानेवाला श्लोक—

६। २२

१४. गीतामें ध्यानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—६। २८

१५. गीतामें 'महात्मा' शब्दका प्रयोग—७। १९ परि., टि.;

८। १५

१६. गीतामें केवल भक्तके लिये प्रयुक्त शब्द—७। १९

परि., टि.

१७. गीतामें सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-

साकारकी उपासनाका वर्णन—७। ३० टि.

१८. गीतामें परमात्माके विषयमें आये भिन्न-भिन्न वचनोंका

तात्पर्य—८। ४ वि.

१९. गीताके एक ही श्लोकमें सबसे अधिक (पाँच)

सम्बोधन—१०। १५

२०. गीतामें एक निश्चयकी महिमा—१०। ३६

२१. गीतामें आयी कुल विभूतियोंकी गणना—

१०। ४० परि.

२२. गीतामें 'माम्' पदका प्रयोग—१०। ४० परि.

२३. गीतामें भगवान्‌द्वारा कथित सबसे लम्बा (तिहत्तर

श्लोकोंका) प्रकरण—१२। २ से १४। २० तक

२४. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगमें निर्मम-

निरहंकार होनेकी बात—२। ७१; ७। ५; १२। १३

और १८। ५३

२५. गीतामें एक ही परमात्मा तीन प्रकारसे वर्णन—

१३। १२ परि.

२६. गीतामें विभूति-वर्णन—१५। १५ वि.

२७. गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (प्रकृति, जीव

और परमात्मा)—का एक साथ वर्णन—१५। १६ टि.

२८. गीतामें क्षर (जगत्), अक्षर (जीव) और पुरुषोत्तम

(परमात्मा)—का तीनों लिंगोंमें वर्णन—१५। १६ टि.;

७। १९ परि.

२९. गीतामें दैवी-सम्पत्तिका वर्णन—१६। ६

३०. गीतामें 'सत्त्व-रज-तम' के वर्णनमें व्यतिक्रम—

१८। ७-९

३१. गीतामें कई रीतियोंसे प्रकृतिद्वारा होनेवाली क्रियाओंका

वर्णन—१८। १४ टि.

३२. गीतामें तीनों योगोंमें भगवत्प्रेम—१८। १५ वि.

३३. गीतामें भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व—१८। ६२

३४. गीतामें आये भक्तिपरक श्लोक—१८। ६३ टि.

३५. गीताके तीसरे अध्यायमें कर्तव्य-पालनकी आवश्यकता

बतानेवाले श्लोक—१८। ६६ टि.

३६. गीतामें अनन्यभक्तिकी महिमा—१८। ६६

३७. गीतामें भगवान्‌के लिये तीन बार 'अच्युत' सम्बोधन

देनेका अभिप्राय—१८। ७३

साधक-संजीवनीमें आयी

व्याकरण-सम्बन्धी बातें

अज्ञान—५।१५ अनार्यजुष्टम्—२।२ टि. अनुश्रुथम्—१।४४ टि. अनेकजन्मसंसिद्धः—६।४५ टि. अन्न—३।१४ टि. अश्चत्य—१५।१ टि. अश्रद्धया—१७।२८ असुर—११।२२ टि.; १६।५ मा. अश्रद्धानाः—१।३ टि. अहमादिश्च मध्ये च भूतानामन्त एव च—१०।२० टि. आब्रह्मभुवनात्—८।१६ टि. आसुरी—१६।४ टि. इदम्, एतत्, अदस् और तत्— १३।१; ११।४६ टि. इन्द्रशत्रु—२।४० टि. इष्टकाम—३।१०-११ टि. ऋषि—५।२५ एतद्योनीनि भूतानि—७।६ टि. एकवचनकी बलवता—७।१५ टि. एनम्—२।१९ टि. कर्मकर्तृ-प्रयोग—१।१३ टि.; २।६७ टि. काम—३।३७ टि. कामसंकल्पवर्जिताः—४।१९

कालेन—४।३८ टि. किम्—१।१ कुरुष्व—७।२७ कूटस्थ—६।८ टि. कृतम्—७।२८ टि. केवलैः—५।११ टि. क्षत्रिय—१८।४३ क्षेत्र—१३।१ टि. क्षेत्रज्ञ—१३।१ टि. गच्छन्ति—२।५१ परि. चातुर्वर्ण्यम्—४।१३ टि. जगत्—७।५ टि., ६ 'जाति' और 'कृति'—४।१४ परि. तस्मात्—२।१८ टि. 'तृष्णासंगसमुद्भवम्'—१४।७ दुर्लभतर—६।४२ टि. देहवृद्धिः—१२।५ टि. देशे काले च पात्रे च—१७।२० टि. दोषवत्—१८।३ टि. धार्तराष्ट्रणाम्—१।१९ टि. न वेदयज्ञाध्ययनैर्.....—११।४८ पश्य—१।४-५; ११।८ प्रकृति—४।२४ टि.; १७।३ मा.; १८।११ मा. प्रारब्ध—१८।१२ टि.

'ब्रह्मणः', 'अमृतस्य' आदि—१४।२७ भक्तिमान्—१२।१९ भगवान्—२।२ टि. भाषा—२।५४ टि. भुज्—३।१२ टि. भुङ्क्ते—३।१२ टि. 'भू', 'अस्' और 'विद्'—२।१६ परि. 'मच्चित्तः' और 'मच्चिताः'— १८।६४ टि. मनुष्याणां सहस्रेषु—७।३ टि. महिमानं तवेदम्—११।४१ टि. मा शुचः—१६।५ टि. यत्र, यम् और यस्मिन्—६।२३ टि. यदा-तदा—२।५८ यस्तु—१८।११ टि. योग—प्रा. १।४-५ टि. लिंग—७।१९ परि.; १०।२० टि. शरीर—१३।१ टि. षष्ठिका प्रयोग—१०।२१ संसार—४।२४ टि. संन्यास—५।६ टि.; १८।१ समास—१०।३३ स्त्री—७।११ टि. स्वाध्याय—१६।१

‘साधक-संजीवनी’ में मूल गीताके पाठभेद—

१. 'यन्मनोजनुविधीयते' (२।६७)—अन्य गीतापाठमें 'यन्मनोजनु विधीयते' ऐसा पाठ मिलता है। २. 'प्रतिजानीहि' (१।३१)—अन्य गीतापाठमें 'प्रति जानीहि' ऐसा पाठ मिलता है। ३. 'शठोजैष्कृतिकः' (१८।२८)—अन्य गीतापाठमें 'शठो नैष्कृतिकः' ऐसा पाठ मिलता है। ४. 'य इदं परमम्' (१८।६८)—अन्य गीतापाठमें 'य इमं परमम्' ऐसा पाठ मिलता है।