श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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धन बढ्नेसे दरिद्रता बढना—३।३९ धनके त्यागसे सुख—३।३९ धनकी शुद्धि—१६।३ धनके बिना भी जीवन-निर्वाह—१६।११; १८।१२ वि. धनके बिना सेवा कैसे होगी?—३।३४ मा. क्या चोरीसे भी धन मिल सकता है?—१८।१२ भगवान्के बिना लक्ष्मीका वाहन उल्लू—१८।६६ वि. धन और धर्म—१८।३४ टि.
धर्म — कुलधर्म और जातिधर्म—१।४३ 'धर्म' में कुधर्म, अधर्म और परधर्म—३।३५ परि. धर्म-पालन करतेहुए मरनेसे कल्याण कैसे?—३।३५ स्वधर्म-परधर्म—२।३१; ३।९, ३५, ४२ मा.; ४।१, १८; ५।८-९ वि.; ८।१९; ९।३; १८।४७, ४८ स्वधर्म और परधर्म-सम्बन्धी मार्मिक बात—३।३५ धर्ममय युद्ध १८।४३ टि. स्वधर्मके दोष—१८।४८
धृति (धैर्य)—६।२५; १६।३; १०।३४; १३।६; १८।२६, २९, ३३-३५, ४३, ५१-५३ ध्यानयोग —५।२६, २७-२८; ६।१०-२८; १८।५१-५३ ध्यान-सम्बन्धी मार्मिक बात—६।२५ ध्यानयोग और कर्मयोग—६।२० वि. ध्यानयोगके दो प्रकार—६।२५ परि. ध्यानयोगका अन्तिम फल—६।३४ परि.
न
नमस्कार किसे किया जाता है? —११।३७ नरक — योनिविशेष और स्थानविशेष नरक—१५।२; १४।१८; १६।५ मा. नरकका यातनाशरीर—१६।१६ टि.
नामजप —३।२१ वि., २६; ६।३५; ७।१; १०।२५; १२।९; १५।७; १७।१० वि., १५, २३-२४ निद्रा —५।२१; ६।१६-१७; १४।८, १७; १८।५५ युक्तिनिद्रा और अतिनिद्रा ६।१६-१७; १८।३९ वि. सात्त्विक मनुष्योंकी निद्रा—६।१६
निन्दा-स्तुति —१२।१९; १४।२४ निर्विकल्पता —१३।८ निर्विकल्प अवस्था और निर्विकल्प बोध—प्रा.; २।४८ परि., ७२ टि.; ६।१५; १४।२ परि.; १८।१७ न्याय —देहली-दीपक-न्याय—९।३३ टि. अरुन्धतीन्याय—१०।४१ परि.; १५।२० सं. बीजवृक्षन्याय—१४।७, १७ 'प्राप्ती सत्यां निषेधः'—१६।८ टि., २३
प
पञ्चकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और
आनन्दमय कोश)—१३।१ पञ्चगव्य —१८।४४ वि. पञ्चतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)— ७।४, ८, ९ पञ्चदेव (विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य)—१७।४, १४ पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश)— २।२३; १३।५, २०, ३२; १५।९ पञ्चीकृत महाभूत—१३।५ पञ्चमहायज्ञ (ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ)—३।१२ वि. परलोक —१६।८ टि. परिग्रह —४।५, २१; १८।५३ पवित्रता (दे. शुद्धि) ४।१०, ३८; ५।१८ वि.; ७।१५ वि., २८; ८।७; ९।२, १७, ३०, ३१, ३२; १०।१२-१३ परि., ३१; १२।१६; १४।१४ परि.; १८।५, २७, ६७ पागलपन —७।१६ टि.; १५।९ टि.; १८।१२ वि. सीधा-सफल पागल व चतुर पागल—१८।१२ वि. पाठ-क्रमसे अर्थ-क्रम बलवान् —६।११ टि. पातञ्जलयोगदर्शन और गीता —प्रा.; २।४८ परि., ५५ परि., ६।२३, ३६ परि.; १४।७; १८।२८ वि., ७३ पातिव्रतधर्म —३।३५; ७।१२; ९।२६, ३०; १०।४१; १२।१; १७।४, १४; १८।६६ पाप — पापका फल भोगना ही पड़ता है— १८।१२ वि. पापीका उद्धार जल्दी होता है—७।१५; ९।३३ मा. पापी भगवान्में कैसे लगेगा?—७।१५, २८ वि.; ९।३० पाप भजनमें बाधक नहीं—७।२८ वि. डेढ़ पाप और डेढ़ पुण्य—७।२८ पारुष्य (कठोरता)—१६।४ पितर —१।४२ परि.; ८।२४; ९।२५; ११।२२; १७।४ आजान पितर और मर्त्य पितर—१।४२ टि. पिशुनता (चुगली)—१६।२ पीपल —१०।२६; १५।१ पुनर्जन्म —३।४१; ४।१; २।५१; ५।१२, १७; ६।३७ परि., ४०, ४२; ८।६, १५, १६, १९, २५; १३।२१, २३; १४।३, १५, १६, १७, १८, २०; १५।२, ४, ८, ९, १०, ११, टि.; १६।८ टि., २० वि.; १८।४७, ६० पुनर्जन्मके दुःख—८।१५ जीव लौटकर संसारमें क्यों आता है?—८।१६ वि. पुनर्जन्मका कारण—८।१६ परि., २३; ९।३ अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार 'शरीर' की और कर्मके अनुसार 'भोगों' की प्राप्ति—१४।१५, १८ पूर्वजन्म —२।१३; ४।५; ६।४०; १०।३४; १८।१२ वि., ४७ वि.