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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 1271

१२७० * साधक-संजीवनी-कोश *

१५। २, ३, ६; १८। १२ वि.

पशु, देवता आदिमें भी तादात्म्य-ममता-कामना-

१५। २

प्रेमकी प्राप्ति होनेपर तादात्म्यका सर्वथा नाश-

१५। ३ वि.

तीर्थस्थान-४। ९; ८। ५; १२। १६; १६। ७

त्याग-३। ३९; ६। २५ परि.; ९। २७ परि.; १२। ३-४,

१२; १६। २; १८। १-११, ६६

कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात-

१२। १२ वि.

त्यागसे नया प्रारब्ध-१८। १२

त्रिपुटी-१५। ११ मा.

भोक्ता, भोग और भोग्य-३। ४२

अनुभविता, अनुभव और अनुभाव्य-५। २०

ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय-१८। १८

ध्याता, ध्यान और ध्येय-६। २०

प्रकाशक, प्रकाश और प्रकाश्य-१३। १७

उपासक, उपास्य और उपासना-१४। २६

प्रमाण, प्रमाता और प्रमेय-१८। ७३ टि.

द्रष्टा, दृश्य और दर्शन-२। १२, २९; ४। ३५;

६। ३१ परि.; ७। १९ परि.; १३। १; १४। १३ मा.

दृश्य द्रष्टाके किसी अंशमें रहता है-१३। १ वि.

दम-४। ३३; १०। ४; १६। १; १८। ४२

दम्भ (दिखावटीपन)-१३। ७; १६। ४, १०; १७। ५, १२, १८

दो प्रकारका दम्भ-१६। ४

दया-(दे. कृपा)-

भगवान्की, सन्त-महात्माओंकी, साधकोंकी और

साधारण मनुष्योंकी दया-१६। २

न्याय और दया-८। ६

दर्प (घमण्ड)-१६। ४; १८। ५३

दर्प और अभिमान-१६। ४ टि.

दान-१६। १; १७। २०-२२; १८। ४३

अभयदान और उसके दो भेद-१६। १

दान देनेवालेकी अधोगति नहीं होती-१७। २२

दान-सम्बन्धी विशेष बात-१७। २२ वि.

दार्शनिक मतभेद-३। ३१ परि.; ४। ३५ परि.; ६। ३१

परि.; ७। १९ परि.; ८। १७ परि.; १२। २ परि.;

१५। ३, ६ परि., १०; १८। ६, ५४ परि.

दिनचर्या कैसी हो?-६। १७ वि.

दिव्यदृष्टि-११। ८, ४७, ४८, ४९; १८। ७५ परि.

संजय और अर्जुनकी दिव्य दृष्टि कबतक रही?-

११। ४९

दुर्भाव और दुराचार-१६। २० टि.

दुःख (दे. सुख)-

परिणामदुःख, तापदुःख तथा संस्कारदुःख-५। २२

आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक

दुःख-७। १६ मा.

दुःखका कारण कौन?-५। २२ परि.

धर्मात्मा पुरुष दुःख क्यों पाते हैं?-१८। १२

दुःखका भोग और दुःखका प्रभाव-५। २२

परि.; १३। ८ परि.

दृष्टि-आध्यात्मिक और भौतिक दृष्टि-२। ५ टि.

दृष्टिदोष-१७। १० वि.

देवता-३। ११-१२; १४। १४, १८ वि.; १५। २; १७। १४

तैंतीस कोटिके देवता (बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह

रुद्र और दो अश्विनीकुमार)-११। ६; १७। ४, १४

मर्त्य देवता और आजान देवता-८। १६

देवताओंके दिन-रात आदिकी गणना-८। १७ टि., २४

स्वर्गमें भी उच्च, मध्यम व कनिष्ठ श्रेणी-

१७। २२ टि.

स्वर्गमें भी दुःख, ईर्ष्या, अभिमान-१७। २२ वि.;

१८। ३८

दैवी और आसुरी सम्पत्तिका मूल-११। ४९; १६। ५;

१८। ६२ परि.

आसुरी सम्पत्तिका मूल-१६। २३ टि.

दोष-काम-क्रोधादि दोषोंको मिटानेका उपाय-

१४। १३ मा.

काम-क्रोधादि मिटनेके तीन लक्षण-५। २६

दोष अपनेमें नहीं हैं-५। २३; १३। ६, ८, ११;

१२। २०; १४। १३ मा., २२ परि., २५ परि.;

१५। ५ वि., १०; १६। ५ मा.; १८। ३९, ६१ वि.

दोषदृष्टि-१। ३९; ३। ३१; ९। १; १३। २५; १५। २०;

१६। १, २; १८। ६७, ७१

द्वन्द्व-३। ४२ मा.; २। ४५; ४। २२; ५। ३, २८;

७। २७, २८; १२। १७ परि.; १५। ५ वि.

द्वन्द्वोंके अनेक प्रकार-७। २८

व्यावहारिक और आध्यात्मिक द्वन्द्व-१५। ५ वि.

द्वैत-अद्वैत-४। ६; ६। ३१; ७। १७, १८; १२। ३-४;

१५। ११ मा.; १८। ६६ वि., ७३

परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं-

१८। ६१ वि.

भक्तिमें अद्वैत-न. नि.; ९। १९ परि.; १२। २ परि.

धन-रुपयोंकी महत्ता माननेसे हानि-३। २१ वि., ३९,

४१; ६। ४१; ७। १५; १०। ८ परि.; १५। ४, १५

वि.; १७। ३; १८। ३४, ५७, ६६ वि.