श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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टि.; १७।१ टि. सात्त्विकताका तात्पर्य—१७।११ गुणोंकी तारतम्यतासे चार वर्ण—१८।४१ वि. गुरु—२।७, २९; ४।३, ३४; ६।५ परि.; ७।५ टि., २१ परि.; ९।२६; १०।४१ वि.; १२।५ वि.; १३।७; १७।१४; १८।६४ परि. गुरु-सम्बन्धी विशेष बात—१३।७ गुरु और राजा—१०।४१ वि. गुरुकी आवश्यकता ज्ञानमार्गमें—१३।७ गुरु कैसा हो?—१३।७ भगवान् सबके आदिगुरु हैं—४।१ गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम और परमगुह्य विषय—९।१ परि.; १८।६२, ६३ टि. च चन्द्रलोक और चन्द्रमण्डल—८।२५; १५।१३ चित्तकी पाँच अवस्थाएँ (मूह, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध)—६।१८ टि., ३६; १३।२४ चिन्ता—पारमार्थिक और सांसारिक चिन्ता—१६।११ चिन्तासे हानि—२।११ चिरंजीवी—१।८ टि. च्युत साधन—६।२५ परि.; १३।८ चेतन और जड़—७।२० टि. चेतनता और जड़ता—१६।५ परि. चौरासी लाख योनियों—३।१०-११ परि.; ७।२८ वि.; १०।३९ परि.; १४।४ परि. ज जन्म-मरणका कारण—२।२२ वि., ४०; ५।१२; ७।२९; ८।१४, १९, २७; ९।३; १३।२१, २६ परि., २८; १५।१ परि., २, ५; १६।५ मा.; १८।१६ टि., ५५ वि., ५८, ७४ जन्म-मरण कबसे शुरू हुआ?—प्रा.; ७।१३ शास्त्रकी दृष्टिसे 'अज्ञान' और साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका कारण—३।२८; ५।१०; ७।२७ जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति—५।३; १३।१; १८।१२ वि. जाग्रत्-सुषुप्ति—१८।१२ टि. ३९ जाग्रत्-सुषुप्ति और समाधि—१८।१२ टि. जाति—४।१४ परि.; ७।५ परि., १० परि. जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे?—१८।४४ भक्तोंमें जातिभेद नहीं—१८।४४, ६६ वि. ज्ञानना और मानना—प्रा.; ३।३, ३० वि.; ५।२९; ७।२, १२, १९; ८।४ वि.; १०।३ परि., ७ टि.; १३।१५; १५।१९ मान्यतासे मान्यता मिटती है—२।१४ टि.; ५।२१ जिज्ञासा—५।३ परि.; ६।४४; ७।४-५, १६; १५।७ परि.;
१८।१, ७० भोगेच्छा और जिज्ञासा—७।४-५ कामना और जिज्ञासा—७।१६ मा. जिज्ञासु—जिज्ञासु और मुमुक्षु—७।१६ परि. भावप्रधान और विवेकप्रधान जिज्ञासु—१३।१० जीव—जीव ईश्वरका अंश है, ब्रह्मका नहीं—१५।७ परि. जीव भगवान्का अंश है, कार्य नहीं—७।६ ज्ञान—५।१५-१६; १०।४, १२-१३ परि., ३८, ४१ परि.; १३।२, १७; १८।१८, १९ अपने ज्ञानका अनादर—२।२२ टि. ज्ञानके आठ अंतरंग साधन—४।३३ ज्ञानके तीन अधिकारी—४।३४ ज्ञान और विज्ञान—३।४१; ६।८; ७।२, ६, ३० परि.; ९।१, ४-५ परि., ९।अ. सा.; १८।४२ ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात—७।२ वि.; ९।१ वि., २ आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान—४।३५ परि., ३८ परि.; ६।३० परि., ३४ परि.; ९।१ परि.; १०।३२ सात्त्विक ज्ञान और तत्त्वज्ञान—१४।६ परि.; १८।२० आवृत और अनावृत ज्ञान—८।२३ इन्द्रियोंका ज्ञान और बुद्धिका ज्ञान—५।२८; १३।१७ ज्ञान दोषी नहीं होता—२।१४; १२।१३; १३।६ वि.; १४।२४; १८।१२ वि. नफा-नुकसान आदिमें फर्क है, ज्ञानमें कोई फर्क नहीं—१३।८ टि.; १५।९ साधन-ज्ञान और साध्य-ज्ञान—१३।१० तत्त्वज्ञान होनेके लक्षण—१३।६ वि., ७ क्या ज्ञानयोगका साधक भक्ति भी करता है?—१३।१० ज्ञानकी भूमिकाएँ—१४।२६ संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर—२।६९ परि.; ३।२८ परि., ४३ मा.; ४।१८; ७।१३, २७ परि.; ९।३४ वि.; १०।३; १३।२; १५।३; १८।३१ त तप—३।३५; ४।२८; १०।५; १६।१; १७।१७—१९; १८।१५, ४२, ६७ ज्ञानतप—४।१० शारीरिक तप—१७।१४ वाणी-सम्बन्धी तप—१७।१५ मानसिक तप—१७।१६ आसुरी तप—१७।७ तादात्म्य—३।२७ परि., ४२-४३ मा.; ७।४-५, २९; ९।३२ मा.; १३।६, ६, २०, २१ परि., २८, ३३ परि.; १४।२०; १५।३; १६।५ मा.; १८।११, १२ वि. तादात्म्य-ममता-कामना—३।३७ वि.; ९।१०; १४।५;