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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • विषयानुक्रमणिका *

१२७५

१६। २, ५ मा., ६, ७, ११ परि., १२, २१; १८। ३९

टि., ४७ वि.

भोग भोगनेमें हिंसा—३। १०-११ मा., १६;

१६। २; १८। २७

भोग भोगना अभक्ष्य-भक्षणसे भी अधिक बुरा-

६। ३६

भोग और भगवान्—५। २२

भोगके आठ प्रकार (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान,

बड़ाई और आराम)—२। ४४; १८। १२ वि.

परिग्रह (संग्रह)-का स्वरूप—१८। ५३

भोजन—सात्त्विक, राजस और तामस भोजन—१७। ७-१०

भोजनके लिये आवश्यक विचार—१७। १०

भोजनमें दृष्टिदोष दूर करनेका उपाय—१७। १०

हित, मित और मेध्य भोजन—१८। ५१-५३

युक्त आहार—६। १६-१७

मद—१६। १०

मदिरा-पानके दोष—१७। १० टि.

मन—मनको एकाग्र करनेके उपाय—६। १२, २६, ३५,

३६; १३। ७

मनको भगवान्में लगानेके उपाय—६। १०; ७। १

मन वहीं लगेगा, जहाँ स्वयं लगेगा—१०। ९

मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेके उपाय—१२। ८

मनकी एकाग्रतासे लाभ—४। २७; १२। २

मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय—१७। १६

मनकी और बुद्धिकी स्थिरता—५। १९ परि.; १८। २९

मन और चित्त—१०। ९

मनुष्य—विचारशील, पुण्यात्मा व साधारण मनुष्य—२। २

मनुष्यजन्म सब जन्मोंका आदि तथा अन्तिम जन्म है—

३। १३ टि.; ७। १९; ९। ३३

भोगी मनुष्य पशुओंसे भी नीचा—३। १६;

७। १५; १६। ६, ७ वि., १९

मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है-प्रा.; २। ४७;

४। १२; ५। १४, १५; ७। १६, २६; ८। ४

टि., ६; ११। ३४ वि.; १५। २; १८। १२ टि.,

६०, ६१, ७३ मा.

मनुष्यमात्र परमात्माके पूजनका अधिकारी है—

१८। ४६

मल-विक्षेप-आवरण—३। ३८ वि.; ४। ३३; ५। ११;

१६। १; १८। १६ परि.

महारथी—१। ६

मान-अपमान—६। ७; १४। २५; १५। ५; १६। १०

अपमान होनेमें कारण—११। ४४

मानिता—१३। ७; १६। ३

मानिता और अतिमानिता—१६। ३

सांसारिक और पारमार्थिक मानिता—१६। ३

मुक्ति—उद्धार-सम्बन्धी विशेष बात—६। ५ वि.

क्रममुक्ति और सद्योमुक्ति—८। १६ वि., परि., २३, २४

मुक्तिमें सूक्ष्म अहम्—४। ३५ परि.; ७। ५ परि., १६

टि., १८ परि., १९ परि.; १२। २ परि.;

१५। ६ परि., १० मा.; १८। ५५

जो मुक्त है, वही मुक्त होता है—१८। ७४

मृगछाला—६। ११

मृत्यु—अकाल-मृत्यु और आकस्मिक-मृत्यु—१८। १२ वि.

मरणासन्न व्यक्तिके प्रति कर्तव्य—८। ५

अन्तकालमें तत्त्वका अनुभव कैसे?—२। ७२; ८। ५

अन्तकालीन गतिके विषयमें विशेष बात—८। ६ वि.

योगबलसे शरीर छोड़ना—८। १०, १२-१३

मेरा कुछ नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिये एवं मुझे कुछ

नहीं करना है—

२। ७२ परि.; ३। ३ परि., ४३; ४। ३, २१, २२;

५। २; ७। ५ वि.; १२। १२; १५। १७ परि., २० परि.;

१८। १२, १३ टि.

मैं कौन हूँ?—१२। ८ वि.

मैं-तू-यह-वह—६। २५ परि.; ७। १९ परि.; ९। ५ परि.;

१३। ८ टि.; १५। ११ मा.; १८। २० मा.

मोह—१। २५; २। ५२, ६३, ७२; ४। ३५; ११। १;

१५। ५, १०; १८। ७३

मोह और विवेक—२। ७२

मोहके दो प्रकार—१४। २२

मौन—१०। ३८; १२। १९; १७। १६

यक्ष और राक्षस—१७। ४

यज्ञ—३। ९, १०, १२, १३, १४-१५; ४। २३-३३; ९। १६;

१०। २५; १६। १; १७। ४ परि., ११-१३; १८। ७०

द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ—४। २८, ३३, ३६;

१८। ४६, ७०

यज्ञ-सम्बन्धी विशेष बात—४। २९ वि.

यज्ञमें पशु-हिंसाका फल—१७। २२ वि.

यत्न—१५। ११

यम—(अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)—

४। २८; ९। ११ परि.; १७। १४

युग—(सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि)—

चारों युगोंमें क्रमशः धर्मका ह्रास—४। ७

युगों आदिकी गणना—८। १७ टि.; १०। ६ टि.

कलियुगमें 'दान' की मुख्यता—१७। २२

योग—'योग' शब्दके अर्थ-प्रा.; १०। ७ वि.

योगकी परिभाषा—६। २३ परि.; १८। ७५