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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 1277

१२७६ * साधक-संजीवनी-कोश *

योग और वियोग-न. नि.; प्रा.; ६। २३; ९। ३४ वि.; १८। ५७, ७३

नित्ययोग और नित्यवियोग-२। १६ परि.; ६। २३.; ७। १८; १८। ७३ मा.

नित्ययोगमें योग, नित्ययोगमें वियोग, वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें

वियोग-१८। ५७ वि.

योग और भोग-६। ९ परि., १७; १०। १६, ४१ परि.; १८। ३९ टि.

योगके यम-नियमदि आठ अंग-९। ११ परि.; १७। १४

योगी-युञ्जान योगी और युक्त योगी-४। ५; ६। ३९; ७। २६; १४। २

योगी और भोगी-६। ४६ परि.

योगियोंकी तीन श्रेणियाँ (योगवित्, योगवित्त और योगवित्तम)-१२। १ परि.

वास्तविक योगी-६। १; १२। १४

योगक्षेम-२। ४५; ९। २२, ३१ परि.

योगमाया-४। ६

रस (दे. आनन्द)-

नाशवान् और अविनाशी रस-२। ५९ परि.

शान्त, अखण्ड और अनन्त-रस-६। ३ परि., ४७ वि.; ७। २ परि., ३ परि.; ८। १९ परि., १०। ११ परि., १२। २, ८ परि.; १५। ४ परि., ८ परि.; १८। ५४ परि., ६६ परि.

ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन-११। ४४

वर्णात्मक शब्दोंके दस रस-१८। १२

भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य)-१८। ५७

राग-द्वेष-रागके अनेक रूप (वासना, आसक्ति, कामना, आशा, लोभ व तृष्णा)-२। ५६; ४। १०

राग-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ३९ वि.

राग-द्वेषपर विजय पानेके उपाय-३। ३४; १८। ६०

राग-द्वेष अन्तःकरणके विकार हैं, धर्म नहीं-१२। २०

रुचि, विश्वास और योग्यता-२। ५३; ७। ३० टि.; ८। ४ वि., २१; ९। १५, १६; १२। ५, १२, १८-२० वि.; १५। ५ वि.

लज्जा-१६। २

‘लेना’ और ‘देना’-३। १०-११, २१; ४। १८; ११। २९ परि.

लोक-३। २०; ७। ३० परि.; १३। ३३; १५। ७, १६, १८

लोकसंग्रह-३। २०, २५-२६; ४। २१, २५ परि., ३० वि.

लोभ-१। ३८; १४। १२, १७; १६। २१

लौकिक और अलौकिक-न. नि.; ३। ३ परि.; ४। ३५ परि., ३८ परि.; ५। ५ परि.; ६। ४७ परि.; ७। १३ परि., २४ परि., २५ परि., ३० परि.; ९। १ परि.; १०। ११ परि.; ११। ३७ परि., ४९ परि.; १२। २ परि.; १५। १६ परि., १९ परि., २० परि.; १६। ६ परि., ७ परि.; १७। २५ परि., २७; १८। ९ परि.

वक्ता और श्रोता-३। १; १०। १, ९, १९, ३६; १६। १; १८। ६४ सं., ६८, ७०, ७१

वक्ताके दोष-१८। ७१

व्याख्यान देनेकी कला-२। ३८ वि.

वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र)-२। ५; ३। ३५; ४। १३; ५। १८ वि.; ६। ३२; ७। ३०; ९। ३२-३३; १५। ७; १६। १०, २४; १७। १४; १८। १२, १७, ३१, ४१-४४, ४५ परि., ४७, ४८, ५८

पशु, पक्षी, वृक्ष आदिमें वर्णभेद-४। १३

गुणोंकी तारतम्यतासे वर्ण-भेद-१८। ४१

चारों वर्णोंके स्वाभाविक कर्म-१८। ४२-४४

स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य-१८। ४४

वर्ण-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ४४

ऊँच-नीच वर्णोंमें जन्मका कारण-४। १३; १८। ४४

वर्णसंकरता-१। ४१; ३। २४ टि.; १८। ४२ परि.

वाद, जल्प और वितण्डा-१०। ३२

वाणीके दोष (भ्रम, प्रमाद, लिप्स व करणापाटव)-१८। ७१

विकारी और स्वतःसिद्ध सत्ता-२। २०; १५। ११

विचार-विचार करना और विचार उदय होना-१८। ७३ परि.

विचार करनेसे लाभ-२। ११ परि.

विवर्तवाद-९। ६ परि.

विवेक-४। ३, १६; ५। २३; ११। ४९; १३। ३४

विवेकविरोधी सम्बन्ध-२। ३० परि.

विवेक और मोह-२। ७२ वि.

विवेक और श्रद्धा-७। १२ वि.; ८। ४ वि.; १२। २०

विवेक और विश्वास-९। १९ परि.

विवेक और भाव-७। १९ मा.

विषय-३। ४३ परि.; १५। २

विषय-सेवनसे हानि-१५। २, ९, १०

वृत्ति (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा व स्मृति)-१८। ७३