श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- विषयानुक्रमणिका *
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वेद (ऋग्वेद-सामवेद-यजुर्वेद-अथर्ववेद)—४।३२; ९।१७; १०।२२, ३५; १३।४; १५।१, १५, १८; १७।२४
वैराग्य —२।४७ परि., ५२, ५८; ३।४ मा., ३४, ३५; ४।३३; ६।३५; १२।३-४, १८-१९ वि.; १३।८, १३ वि; १४।११; १८।८, ५१-५३, ७० वैराग्य होनेके उपाय—६।३५; १३।८ वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात—१५।३
व्यष्टि और समष्टि —३।१२, १८, २७; ५।८, ११; ७।४-५; ९।८; १३।६, २०, ३१; १४।२२ वि.; १५।३, ११ मा. १६; १८।१५
श
शकुन —१।३१ टि.
शब्द—वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्द —१०।१९; १८।१२ वि.
शब्दकी शक्ति—१०।१९ टि.; १५।९
शम —४।३३; १०।४; १८।४१
शरणगति—शरणगतिके पर्याय (आश्रय, अवलम्बन, अधीनता, प्रपत्ति और सहारा)—७।१ शरणगति-सम्बन्धी विशेष बात—७।१५ वि.; ९।३४; १८।६६ वि. शरणगतिका रहस्य—१८।६६ शरणगति और धर्म (कर्तव्य-कर्म)—१८।६६ परि.
शरीर—स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर —२।१३, २९, ३० परि.; ३।२२, ३४, ३७, ४२ मा.; ४।१४, १८; ६।१, ८; ८।४, ६; १३।१, ३३ परि.; १५।७ परि., १०, ११, १६; १८।६, १२, १३ टि., ३५ शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धि—३।४२-४३ शरीर, मन और वाणीकी सरलता—१३।७ शरीरके साथ अभेदभावसे तथा भेदभावसे सम्बन्ध—१४।५ वि.; १५।११ टि.
भक्तका शरीर चिन्मय होना—७।१९; १८।६६ वि.
शान्ति—शान्ति और परमशान्ति —६।१५ शान्तिका उपभोग न करनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति—५।१२; ६।३ परि.; १४।१९ परि.; १८।१३ टि., ५४
शाप-वरदान —७।१९; १६।१
शासन —८।९; १०।७ वि., ४१ वि.; १८।४३
शास्त्र—अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र —१।३६ टि. धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्र—२।३९ परि. सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र—७।१५ टि. शास्त्रीय मोह (मतभेद)—२।५३ शास्त्रीय दृष्टि और साधककी दृष्टि—२।७१; ३।२८; ५।१०; ७।२७
सीखना (पढ़ाई) और अनुभव करना—२।३० वि. शास्त्र पढ़े बिना कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा?—१६।२४ परि.
शिक्षा देनेकी रीति —३।२६
शुद्धि (दे. पवित्रता)—५।११ परि.; ६।४५; ८।७; १३।७; १६।३, ७, २२; १७।१४, २२ वि.; १६।२२; १८।१५, ४२ भूमिकी शुद्धि—६।११ शारीरिक, वाचिक, कौटुम्बिक और आर्थिक शुद्धि—१६।३ अन्तःकरण (मन-बुद्धि)-की शुद्धि—१।४१; ५।७; ६।१२, ३६; १३।७; १६।१; १७।१४, २२ टि.; १८।१२, १६ परि.
श्रद्धा —२।१८; ४।३३, ३९; ६।५ वि.; ७।२१; १२।२, २०; १७।२-३, २८; १८।७३ टि. श्रद्धा-सम्बन्धी विशेष बात—१७।३ मा.
श्राद्ध-तर्पण —१।४२; ९।२५ वि.; १७।४; १८।४४ ष
षड्रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर)—१६।२१
षड्विकार (उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना)—२।२०
स
संकल्प —४।१९; ५।२३; ६।२, ४।२४, २५; १२।९; १३।७; १५।९; १६।५; १८।१२ टि.
संकल्पसे हानि—६।४
संकल्पोंके त्यागके उपाय—६।४
भगवान्का संकल्प—७।१९; १६।५
संन्यासी —५।३; ६।१
संयम —१०।७ वि.
संशय —३।४०; ४।३२, ४०; १०।७ परि.; १८।१० संशय और विपर्यय—१२।१४
संसार —संसारमें परिवर्तन आवश्यक है—२।२७ परि. संसारको दो बार नहीं देख सकते—२।१६; १०।३; १३।१ संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय—१५।३
संसार अभावरूप ही है—४।२४ मा.; १३।२८ मा.; १७।२६ परि; १८।७३ मा.
संस्कार —३।६; ६।४०; ९।३०; १८।१४, ४१, ४७ वि.
सती —१६।३
सत् और असत् —२।१६; ९।१९ परि.; ११।३७; १३।१२; १६।५; १७।२६ परि., २७ परि., २८
सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन —१५।१५ वि.