श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
१२७६ * साधक-संजीवनी-कोश *
योग और वियोग-न. नि.; प्रा.; ६। २३; ९। ३४ वि.; १८। ५७, ७३
नित्ययोग और नित्यवियोग-२। १६ परि.; ६। २३.; ७। १८; १८। ७३ मा.
नित्ययोगमें योग, नित्ययोगमें वियोग, वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें
वियोग-१८। ५७ वि.
योग और भोग-६। ९ परि., १७; १०। १६, ४१ परि.; १८। ३९ टि.
योगके यम-नियमदि आठ अंग-९। ११ परि.; १७। १४
योगी-युञ्जान योगी और युक्त योगी-४। ५; ६। ३९; ७। २६; १४। २
योगी और भोगी-६। ४६ परि.
योगियोंकी तीन श्रेणियाँ (योगवित्, योगवित्त और योगवित्तम)-१२। १ परि.
वास्तविक योगी-६। १; १२। १४
योगक्षेम-२। ४५; ९। २२, ३१ परि.
योगमाया-४। ६
र
रस (दे. आनन्द)-
नाशवान् और अविनाशी रस-२। ५९ परि.
शान्त, अखण्ड और अनन्त-रस-६। ३ परि., ४७ वि.; ७। २ परि., ३ परि.; ८। १९ परि., १०। ११ परि., १२। २, ८ परि.; १५। ४ परि., ८ परि.; १८। ५४ परि., ६६ परि.
ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन-११। ४४
वर्णात्मक शब्दोंके दस रस-१८। १२
भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य)-१८। ५७
राग-द्वेष-रागके अनेक रूप (वासना, आसक्ति, कामना, आशा, लोभ व तृष्णा)-२। ५६; ४। १०
राग-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ३९ वि.
राग-द्वेषपर विजय पानेके उपाय-३। ३४; १८। ६०
राग-द्वेष अन्तःकरणके विकार हैं, धर्म नहीं-१२। २०
रुचि, विश्वास और योग्यता-२। ५३; ७। ३० टि.; ८। ४ वि., २१; ९। १५, १६; १२। ५, १२, १८-२० वि.; १५। ५ वि.
ल
लज्जा-१६। २
‘लेना’ और ‘देना’-३। १०-११, २१; ४। १८; ११। २९ परि.
लोक-३। २०; ७। ३० परि.; १३। ३३; १५। ७, १६, १८
लोकसंग्रह-३। २०, २५-२६; ४। २१, २५ परि., ३० वि.
लोभ-१। ३८; १४। १२, १७; १६। २१
लौकिक और अलौकिक-न. नि.; ३। ३ परि.; ४। ३५ परि., ३८ परि.; ५। ५ परि.; ६। ४७ परि.; ७। १३ परि., २४ परि., २५ परि., ३० परि.; ९। १ परि.; १०। ११ परि.; ११। ३७ परि., ४९ परि.; १२। २ परि.; १५। १६ परि., १९ परि., २० परि.; १६। ६ परि., ७ परि.; १७। २५ परि., २७; १८। ९ परि.
व
वक्ता और श्रोता-३। १; १०। १, ९, १९, ३६; १६। १; १८। ६४ सं., ६८, ७०, ७१
वक्ताके दोष-१८। ७१
व्याख्यान देनेकी कला-२। ३८ वि.
वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र)-२। ५; ३। ३५; ४। १३; ५। १८ वि.; ६। ३२; ७। ३०; ९। ३२-३३; १५। ७; १६। १०, २४; १७। १४; १८। १२, १७, ३१, ४१-४४, ४५ परि., ४७, ४८, ५८
पशु, पक्षी, वृक्ष आदिमें वर्णभेद-४। १३
गुणोंकी तारतम्यतासे वर्ण-भेद-१८। ४१
चारों वर्णोंके स्वाभाविक कर्म-१८। ४२-४४
स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य-१८। ४४
वर्ण-सम्बन्धी विशेष बात-१८। ४४
ऊँच-नीच वर्णोंमें जन्मका कारण-४। १३; १८। ४४
वर्णसंकरता-१। ४१; ३। २४ टि.; १८। ४२ परि.
वाद, जल्प और वितण्डा-१०। ३२
वाणीके दोष (भ्रम, प्रमाद, लिप्स व करणापाटव)-१८। ७१
विकारी और स्वतःसिद्ध सत्ता-२। २०; १५। ११
विचार-विचार करना और विचार उदय होना-१८। ७३ परि.
विचार करनेसे लाभ-२। ११ परि.
विवर्तवाद-९। ६ परि.
विवेक-४। ३, १६; ५। २३; ११। ४९; १३। ३४
विवेकविरोधी सम्बन्ध-२। ३० परि.
विवेक और मोह-२। ७२ वि.
विवेक और श्रद्धा-७। १२ वि.; ८। ४ वि.; १२। २०
विवेक और विश्वास-९। १९ परि.
विवेक और भाव-७। १९ मा.
विषय-३। ४३ परि.; १५। २
विषय-सेवनसे हानि-१५। २, ९, १०
वृत्ति (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा व स्मृति)-१८। ७३
- विषयानुक्रमणिका *
१२७७
वेद (ऋग्वेद-सामवेद-यजुर्वेद-अथर्ववेद)—४।३२; ९।१७; १०।२२, ३५; १३।४; १५।१, १५, १८; १७।२४
वैराग्य —२।४७ परि., ५२, ५८; ३।४ मा., ३४, ३५; ४।३३; ६।३५; १२।३-४, १८-१९ वि.; १३।८, १३ वि; १४।११; १८।८, ५१-५३, ७० वैराग्य होनेके उपाय—६।३५; १३।८ वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात—१५।३
व्यष्टि और समष्टि —३।१२, १८, २७; ५।८, ११; ७।४-५; ९।८; १३।६, २०, ३१; १४।२२ वि.; १५।३, ११ मा. १६; १८।१५
श
शकुन —१।३१ टि.
शब्द—वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्द —१०।१९; १८।१२ वि.
शब्दकी शक्ति—१०।१९ टि.; १५।९
शम —४।३३; १०।४; १८।४१
शरणगति—शरणगतिके पर्याय (आश्रय, अवलम्बन, अधीनता, प्रपत्ति और सहारा)—७।१ शरणगति-सम्बन्धी विशेष बात—७।१५ वि.; ९।३४; १८।६६ वि. शरणगतिका रहस्य—१८।६६ शरणगति और धर्म (कर्तव्य-कर्म)—१८।६६ परि.
शरीर—स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर —२।१३, २९, ३० परि.; ३।२२, ३४, ३७, ४२ मा.; ४।१४, १८; ६।१, ८; ८।४, ६; १३।१, ३३ परि.; १५।७ परि., १०, ११, १६; १८।६, १२, १३ टि., ३५ शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धि—३।४२-४३ शरीर, मन और वाणीकी सरलता—१३।७ शरीरके साथ अभेदभावसे तथा भेदभावसे सम्बन्ध—१४।५ वि.; १५।११ टि.
भक्तका शरीर चिन्मय होना—७।१९; १८।६६ वि.
शान्ति—शान्ति और परमशान्ति —६।१५ शान्तिका उपभोग न करनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति—५।१२; ६।३ परि.; १४।१९ परि.; १८।१३ टि., ५४
शाप-वरदान —७।१९; १६।१
शासन —८।९; १०।७ वि., ४१ वि.; १८।४३
शास्त्र—अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र —१।३६ टि. धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्र—२।३९ परि. सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र—७।१५ टि. शास्त्रीय मोह (मतभेद)—२।५३ शास्त्रीय दृष्टि और साधककी दृष्टि—२।७१; ३।२८; ५।१०; ७।२७
सीखना (पढ़ाई) और अनुभव करना—२।३० वि. शास्त्र पढ़े बिना कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा?—१६।२४ परि.
शिक्षा देनेकी रीति —३।२६
शुद्धि (दे. पवित्रता)—५।११ परि.; ६।४५; ८।७; १३।७; १६।३, ७, २२; १७।१४, २२ वि.; १६।२२; १८।१५, ४२ भूमिकी शुद्धि—६।११ शारीरिक, वाचिक, कौटुम्बिक और आर्थिक शुद्धि—१६।३ अन्तःकरण (मन-बुद्धि)-की शुद्धि—१।४१; ५।७; ६।१२, ३६; १३।७; १६।१; १७।१४, २२ टि.; १८।१२, १६ परि.
श्रद्धा —२।१८; ४।३३, ३९; ६।५ वि.; ७।२१; १२।२, २०; १७।२-३, २८; १८।७३ टि. श्रद्धा-सम्बन्धी विशेष बात—१७।३ मा.
श्राद्ध-तर्पण —१।४२; ९।२५ वि.; १७।४; १८।४४ ष
षड्रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर)—१६।२१
षड्विकार (उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना)—२।२०
स
संकल्प —४।१९; ५।२३; ६।२, ४।२४, २५; १२।९; १३।७; १५।९; १६।५; १८।१२ टि.
संकल्पसे हानि—६।४
संकल्पोंके त्यागके उपाय—६।४
भगवान्का संकल्प—७।१९; १६।५
संन्यासी —५।३; ६।१
संयम —१०।७ वि.
संशय —३।४०; ४।३२, ४०; १०।७ परि.; १८।१० संशय और विपर्यय—१२।१४
संसार —संसारमें परिवर्तन आवश्यक है—२।२७ परि. संसारको दो बार नहीं देख सकते—२।१६; १०।३; १३।१ संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय—१५।३
संसार अभावरूप ही है—४।२४ मा.; १३।२८ मा.; १७।२६ परि; १८।७३ मा.
संस्कार —३।६; ६।४०; ९।३०; १८।१४, ४१, ४७ वि.
सती —१६।३
सत् और असत् —२।१६; ९।१९ परि.; ११।३७; १३।१२; १६।५; १७।२६ परि., २७ परि., २८
सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन —१५।१५ वि.
सत्य - १०।४; १६।२; १७।१५
सत्-चित्-आनन्द - ३।४३ मा.; ५।३; १२।१३-१४
परि.; १३।८, १८ परि., २० परि.; १४।२ परि.;
१६।५ मा.; १८।३९ वि.
सन्त-महात्मा - अल्पआत्मा, आत्मा और महात्मा - ८।१५;
९।१३
अवधूत और आचार्य - ३।२१
सन्त-महात्मा अपने-आपको कब प्रकट करते हैं? -
४।५ टि.
महात्माओंकी महिमा - ७।१९
महात्माओंका अपने दर्जेसे नीचे उतरना - ७।१९
सन्त-कृपा - ७।१५; १६।२
सन्त-महात्मा सुखी-दुःखी नहीं होते - १६।२
महात्माओंकी आज्ञा माननेसे लाभ - १३।२५
सन्त-महात्माओंपर श्रद्धा करनेसे लाभ - ६।५ वि.
सन्त-महात्माओंमें दोषदृष्टि करनेसे हानि -
१३। २५
सन्तति-निरोध - ७।११; १८।३२ परि.
समग्र - न. नि.; २।७२ परि.; ३।३० परि.; ५।१० परि.;
६।४७; ७।१, ३ परि., ७ परि., १६ परि., २८,
२९-३०; ८।४ परि., १६ परि.; ९।४, ९ परि., १५
परि., अ. सा.; १०।१७ परि., ४० परि.; ११।४
परि., १८ परि., २२ परि., ३० परि., ३७ परि., ५१
परि., ५४ परि., ५५ परि.; १२।५ परि., ७ परि;
१३।१२ परि., १४ परि., १६ परि., १७ परि.,
१८ परि., २० परि., ३० परि.; १४।२६ परि.,
२७ परि.; १५।७ परि., १९ परि., २० परि.,
१८।५५, ६३ परि., ६५ परि.
भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी विशेष बात - ७।३०
समग्रका ज्ञान भक्तिसे ही हो सकता है -
१३। १८ परि.
समता - साधनरूप और साध्यरूप समता - २।४८; ६।२३
अन्तःकरण और स्वरूपकी समता - २।४० वि.,
४८; ४।२८; ५।९९
समता निरन्तर रहती है - ३।१९ मा.; १८।५७
समता-सम्बन्धी विशेष बात - २।४० वि., ४८ वि.;
५।९८ वि.; ६।९ वि., परि., ३२; १२।३-४
धनके बँटवारेमें समता - १२।१८; १४।२५
समता रखनेयोग्य स्थल - १२।१९; १४।२५
समाधि - प्रा.; २।३० परि.; ३।१८ मा., ३९ परि.;
४।२७; ६।१८ टि., २०, २५ परि., २६ परि., ३६
मा.; १२।१२; १३।३३ परि.; १५।११; १८।२२
टि., ३६, ३९ टि.
संप्रज्ञात व असंप्रज्ञात और सबीज व निर्बीज
समाधि - ६।२०
समाधि और निद्रा - ४।२७; १८।३९ टि.
समाधि और सुषुप्ति - ६।१९
समाधि, सुषुप्ति व मूर्च्छा भी क्रिया होती है -
३।५ परि., १८, २७; ४।१८; १५।११ टि.
जाग्रत्-सुषुप्ति और समाधि - १८।१२ टि.
समाधि भी एक कर्म है - ३।५, १८ टि.; ४।१६ मा.;
१८।११
समाधिके चार दोष - ६।२५ परि.
सहज समाधि (सहजावस्था) - प्रा./टि.; ३।५ परि.,
१८ टि.; ६।३६; १३।३३ टि.; १५।११
सम्बन्धी न रहनेपर भी सम्बन्ध रहता है - २।१४;
५।२१; ८।१९; ९।९
सर्प और नाग - १०।२९
सहिष्णुता - द्वन्द्व, वेग, परमत व परोत्कर्ष-सहिष्णुता - १८।६७
असहिष्णुता और असूया - १८।६७ टि.
साधक - साधकोंके दो प्रकार - १२।५ टि.
मस्तिष्क (विवेक)-प्रधान और हृदय (श्रद्धा)-प्रधान
साधक - ८।४ वि.
भावप्रधान और विवेकप्रधान जिज्ञासु - १३।१०
श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ - १३।२५
साधकोंके प्रति भगवान्की प्रियता - ६।४०
युक्त, युक्ततर और युक्ततम साधक - ६।४७
साधकपर खण्डन-मण्डनका असर नहीं पड़ना
चाहिये - ९।४-५ मा.
साधकके लिये साम्प्रदायिक पक्षपात बाधक
है - १२।७
साधन - साधन-सम्बन्धी विशेष बात - ३।८ मा.; ५।५
वि.; ११।२, ३४ वि., ५४; १२।१ १२ वि.;
१५।४, ७ परि.
साधनका आग्रह (राग) और तत्परता (रुचि) -
३।८ मा., ३४ टि.; १६।२
‘साधनपंचक’ - ११।५५
साधनजन्य सुखभोगसे हानि - ३।३७ टि.;
११।४७ वि.; १४।१३; १८।१३ टि., ३६
साधु - ४।८; १८।११
साधु और असाधु - ४।८
साधु पुरुष दुःख क्यों पाते हैं? - ४।८
साम्प्रदायिकता - २।५३; १२।७
सिद्धान्त - ३।३१, ३३ टि.; ७।५ परि.
मत और सिद्धान्त - ३।३१ परि.
सिद्धि (अणिमा, गरिमादि) - प्रा.; ६।१, १२, २६ परि.,
३६ मा.; ७।३ टि.; १०।१०; १२।८; १४।१;
१६।५; १८।२९, ५०
सिनेमा देखनेसे हानि - ५।२
- विषयानुक्रमणिका *
१२७९
सीमा (कालकृत और देशकृत)—१०।४०; ११।१९; १५।३ सुख (दे. दुःख)—
बाहरका और भीतरका सुख—६।७; १२।१३ बाहरके सुख-दुःखमें 'सम' तथा भीतरके सुख-दुःखसे 'रहित' होना—५।३ परि.; ६।७; १२।१८ सुख वस्तुके मनसे निकलनेसे—३।१७, ३९; १५।५ वि., १८।३९ वि., ५७ टि.
सुख पदार्थके सम्बन्ध-विच्छेदसे—३।३९; ५।२१; ६।१७; १०।४१
सबसे अधिक सुख किसको है?—६।२०; ८।१६ सुखीको देखकर प्रसन्न व दुःखीको देखकर दुःखी होना—३।३४; ५।७ वि., १८; ६।३२ परि.; १६।२
सात्विक, राजस व तामस सुख—१८।३७—३९ सुख-दुःख-सम्बन्धी विशेष बात—२।१५ वि., ४७ मा.; १३।२०, २१ परि.
सुषुप्ति —२।१३, ७१ परि.; ३।२८, ३९; ५।३, १२, २१; ७।४; ८।१९ परि.; ९।३० परि.
सुहृद और मित्र —६।९
सुष्टि-रचना —प्रा.; ३।११ परि., २२; ४।१, १३-१४; ५।१४; ७।४—६, ८, ९ परि., १२, १९, २९; ८।३, ४, १७-१८; ९।६—१०, १३, २४; १०।८, ३९ परि.; १३।५, १४, १९; १४।३, ७; १५।१ जीवकृत सुष्टि—७।५ परि.; ५।१४ परि.; ८।१८ बिन्दुज और नादज प्रजा—६।४२; १०।६ सुष्टिमें भिन्नता—७।१० परि. मनुष्यशरीरकी रचना—१८।७३ मा. सुष्टिचक्र—३।१४—१६
सेवा —सेवा-सम्बन्धी विशेष बात—३।३४ मा.; ५।७ वि.; १८।४५ वि. धनके बिना सेवा कैसे होगी?—३।३४ मा. शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सेवा—३।९ टि., १३; ६।१ सेवा और प्रेम—१५।२०, अ. सा. सेवा और विवेक—२।४७ सेवा और सेवावृत्ति—१८।४४ नौकरी, सेवा और पूजा—१८।४५ वि. सेवा और पूजा—१८।४५ वि., ४६ परि., ६५ देश-समाजकी सेवा—१२।११ सेवा लेनेसे पुण्योका नाश—१६।२
सोमलता —९।२०
स्थूल और सूक्ष्म —१४।१४
स्पृहा —२।७१; ३।३९; १४।१२; १८।४९
स्फुरणा —३।३४; ५।२३ परि.; ६।२, ४, २४, ३५; १३।७; १८।१२
स्मरण —बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य—८।७ वि. अचिन्त्यका स्मरण कैसे करें?—८।९ भगवान्का निरन्तर स्मरण कैसे हो?—८।१४ परि.
स्मृति —२।७१; ३।२८; ८।१४ परि.; १०।३४; १२।१; १५।४, १५; १८।७३ स्मृति और विस्मृति—१२।१, ८; १५।४; १८।७३ विस्मृति कबसे हुई?—१८।७३ मा. स्मृति और चिन्तन—१५।१५; १८।७३ परि.
क्लिष्ट और अक्लिष्ट स्मृति—१८।७३ स्वरूपकी व अन्तःकरणकी स्मृति—१५।१५; १८।७३ कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोगकी स्मृति—१८।७३ स्मृति-सम्बन्धी मार्मिक बात—१८।७३ मा.
'स्व' और 'पर' —३।९ टि., १९, २२, ३५ मा.; ४।१२, १८, १९; ५।१९; ६।४३ परि.; १५।६ परि.; १८।४०, ४८, ६० परि.
स्वभाव —३।३३, ३४; ५।१४; ६।४०; ७।४, २०, २८; ८।४ टि.; ९।८, १२, १३; १४।१५, १८; १६।२, ४, १९, २० वि., २४; १८।१२ वि., ४१, ४२ परि., ४४, ४७, ६०, ६१ आसुरी, राक्षसी और मोहिनी स्वभाव—९।१२ स्वभावको सुधारनेके उपाय—१८।१२ वि., ६० वि. स्वभाव-भेदका कारण—१६।२० वि. स्व-स्वभाव और पर-स्वभाव—१८।६० परि. स्वभावकी परवशता (प्रबलता)—१८।६० वि.
स्वयं —अहम्से परे स्वरूपको कैसे जानें?—३।२८ स्वयंकी स्वीकृति—९।३० परि.; १३।१५ परि. स्वयंका पुरुषार्थ—१५।७ परि. स्वयंका और बुद्धिका निश्चय—९।३०; १२।८ स्वयंमें परमात्माको देखना—४।३८, ३९; १३।२४; १५।४, ११ स्वयं सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—१३।२७ परि., ३२ परि.
स्वाध्याय —४।२८; १६।१; १७।१५
स्वाभाविक और अस्वाभाविक —७।१३ ह
हिंसा —इक्यासी प्रकारकी हिंसा—१३।७ अपने विचारकी हिंसा—१३।७ भोग भोगनेसे हिंसा—३।१०-११ मा., १६; १६।२; १८।२७ स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोहको लेकर हिंसा—१७।१४ यज्ञमें पशु-हिंसाका फल—१७।२२ वि.
हृदय —१५।१५
हृदयमें परमात्माका अनुभव करनेका उपाय—१३।१७
साधक-संजीवनीमें आयी
गीता-सम्बन्धी मुख्य बातें
१. गीतामें भक्तिकी विशेषता—न. नि.; १८। ५५ वि.
२. गीतामें आये विलक्षण श्लोक—न.नि.
३. गीताका बिना पुस्तक उलटा पाठ करनेसे शान्ति—प्रा.
४. गीतामें करणसापेक्ष शैलीवाले श्लोक—प्रा.
५. गीतामें ज्ञानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। १५
६. गीतामें 'तस्मात्' पदका प्रयोग—२। १८ टि.
७. गीतामें कर्मयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। ७१
८. गीतामें भगवान्के अज, अव्यय और ईश्वर—इन तीनों
रूपोंको जानने और न जाननेकी बात—४। ६ टि.
९. गीतामें मुख्य निवृत्तिपरक श्लोक—४। २१
१०. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगका मुख्य
श्लोक—४। २३
११. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे सम्पूर्ण
पापोंका नाश बतानेवाले श्लोक—४। २३ परि.;
७। १९; १६। ५
१२. गीतामें कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मप्राप्ति
बतानेवाले श्लोक—५। ५ परि.
१३. गीतामें सभी साधनोंकी कसौटी बतानेवाला श्लोक—
६। २२
१४. गीतामें ध्यानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—६। २८
१५. गीतामें 'महात्मा' शब्दका प्रयोग—७। १९ परि., टि.;
८। १५
१६. गीतामें केवल भक्तके लिये प्रयुक्त शब्द—७। १९
परि., टि.
१७. गीतामें सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-
साकारकी उपासनाका वर्णन—७। ३० टि.
१८. गीतामें परमात्माके विषयमें आये भिन्न-भिन्न वचनोंका
तात्पर्य—८। ४ वि.
१९. गीताके एक ही श्लोकमें सबसे अधिक (पाँच)
सम्बोधन—१०। १५
२०. गीतामें एक निश्चयकी महिमा—१०। ३६
२१. गीतामें आयी कुल विभूतियोंकी गणना—
१०। ४० परि.
२२. गीतामें 'माम्' पदका प्रयोग—१०। ४० परि.
२३. गीतामें भगवान्द्वारा कथित सबसे लम्बा (तिहत्तर
श्लोकोंका) प्रकरण—१२। २ से १४। २० तक
२४. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगमें निर्मम-
निरहंकार होनेकी बात—२। ७१; ७। ५; १२। १३
और १८। ५३
२५. गीतामें एक ही परमात्मा तीन प्रकारसे वर्णन—
१३। १२ परि.
२६. गीतामें विभूति-वर्णन—१५। १५ वि.
२७. गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (प्रकृति, जीव
और परमात्मा)—का एक साथ वर्णन—१५। १६ टि.
२८. गीतामें क्षर (जगत्), अक्षर (जीव) और पुरुषोत्तम
(परमात्मा)—का तीनों लिंगोंमें वर्णन—१५। १६ टि.;
७। १९ परि.
२९. गीतामें दैवी-सम्पत्तिका वर्णन—१६। ६
३०. गीतामें 'सत्त्व-रज-तम' के वर्णनमें व्यतिक्रम—
१८। ७-९
३१. गीतामें कई रीतियोंसे प्रकृतिद्वारा होनेवाली क्रियाओंका
वर्णन—१८। १४ टि.
३२. गीतामें तीनों योगोंमें भगवत्प्रेम—१८। १५ वि.
३३. गीतामें भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व—१८। ६२
३४. गीतामें आये भक्तिपरक श्लोक—१८। ६३ टि.
३५. गीताके तीसरे अध्यायमें कर्तव्य-पालनकी आवश्यकता
बतानेवाले श्लोक—१८। ६६ टि.
३६. गीतामें अनन्यभक्तिकी महिमा—१८। ६६
३७. गीतामें भगवान्के लिये तीन बार 'अच्युत' सम्बोधन
देनेका अभिप्राय—१८। ७३
साधक-संजीवनीमें आयी
व्याकरण-सम्बन्धी बातें
अज्ञान—५।१५ अनार्यजुष्टम्—२।२ टि. अनुश्रुथम्—१।४४ टि. अनेकजन्मसंसिद्धः—६।४५ टि. अन्न—३।१४ टि. अश्चत्य—१५।१ टि. अश्रद्धया—१७।२८ असुर—११।२२ टि.; १६।५ मा. अश्रद्धानाः—१।३ टि. अहमादिश्च मध्ये च भूतानामन्त एव च—१०।२० टि. आब्रह्मभुवनात्—८।१६ टि. आसुरी—१६।४ टि. इदम्, एतत्, अदस् और तत्— १३।१; ११।४६ टि. इन्द्रशत्रु—२।४० टि. इष्टकाम—३।१०-११ टि. ऋषि—५।२५ एतद्योनीनि भूतानि—७।६ टि. एकवचनकी बलवता—७।१५ टि. एनम्—२।१९ टि. कर्मकर्तृ-प्रयोग—१।१३ टि.; २।६७ टि. काम—३।३७ टि. कामसंकल्पवर्जिताः—४।१९
कालेन—४।३८ टि. किम्—१।१ कुरुष्व—७।२७ कूटस्थ—६।८ टि. कृतम्—७।२८ टि. केवलैः—५।११ टि. क्षत्रिय—१८।४३ क्षेत्र—१३।१ टि. क्षेत्रज्ञ—१३।१ टि. गच्छन्ति—२।५१ परि. चातुर्वर्ण्यम्—४।१३ टि. जगत्—७।५ टि., ६ 'जाति' और 'कृति'—४।१४ परि. तस्मात्—२।१८ टि. 'तृष्णासंगसमुद्भवम्'—१४।७ दुर्लभतर—६।४२ टि. देहवृद्धिः—१२।५ टि. देशे काले च पात्रे च—१७।२० टि. दोषवत्—१८।३ टि. धार्तराष्ट्रणाम्—१।१९ टि. न वेदयज्ञाध्ययनैर्.....—११।४८ पश्य—१।४-५; ११।८ प्रकृति—४।२४ टि.; १७।३ मा.; १८।११ मा. प्रारब्ध—१८।१२ टि.
'ब्रह्मणः', 'अमृतस्य' आदि—१४।२७ भक्तिमान्—१२।१९ भगवान्—२।२ टि. भाषा—२।५४ टि. भुज्—३।१२ टि. भुङ्क्ते—३।१२ टि. 'भू', 'अस्' और 'विद्'—२।१६ परि. 'मच्चित्तः' और 'मच्चिताः'— १८।६४ टि. मनुष्याणां सहस्रेषु—७।३ टि. महिमानं तवेदम्—११।४१ टि. मा शुचः—१६।५ टि. यत्र, यम् और यस्मिन्—६।२३ टि. यदा-तदा—२।५८ यस्तु—१८।११ टि. योग—प्रा. १।४-५ टि. लिंग—७।१९ परि.; १०।२० टि. शरीर—१३।१ टि. षष्ठिका प्रयोग—१०।२१ संसार—४।२४ टि. संन्यास—५।६ टि.; १८।१ समास—१०।३३ स्त्री—७।११ टि. स्वाध्याय—१६।१
‘साधक-संजीवनी’ में मूल गीताके पाठभेद—
१. 'यन्मनोजनुविधीयते' (२।६७)—अन्य गीतापाठमें 'यन्मनोजनु विधीयते' ऐसा पाठ मिलता है। २. 'प्रतिजानीहि' (१।३१)—अन्य गीतापाठमें 'प्रति जानीहि' ऐसा पाठ मिलता है। ३. 'शठोजैष्कृतिकः' (१८।२८)—अन्य गीतापाठमें 'शठो नैष्कृतिकः' ऐसा पाठ मिलता है। ४. 'य इदं परमम्' (१८।६८)—अन्य गीतापाठमें 'य इमं परमम्' ऐसा पाठ मिलता है।
साधक-संजीवनीमें आयी
कहानियाँ
१. त्वष्ट्यद्वारा इन्द्रका वध करनेके लिये यज्ञ करना—१। ४० टि.
२. ब्रह्माजीके द्वारा तीन 'द' (दमन, दान, दया)-का उपदेश (बृहदारण्यकोपनिषद्)—३। १४
३. वर्षा न होनेपर किसान-बालकोंका हल चलाना और परिणामस्वरूप वर्षा होना—३। १४
४. फजीती और बदमाश—३। ३९ वि.
५. प्रज्ञाचक्षु सन्तका मन्दिर जाना—६। ४४
६. ध्रुवकी कथा—७। १६
७. एक वैरागी बाबाद्वारा सोनेकी मूर्ति बेचना—७। १९
८. संतको चोर समझकर लाठी मारना—७। १९
९. एक साधु और गोपियोंमें वार्ता—७। १९
१०. चौरासीका चक्कर (द्वार आनेपर सिरपर खुजली आना)—९। ३
११. नामदेवजीका घी लेकर कुत्तेके पीछे भागना—९। २४ टि.
१२. नामदेवजीके द्वारा प्रेतका उद्धार—९। २५ टि.
१३. कर्णपिशाचिनीकी उपासनासे दुर्गति—९। २५ वि.
१४. भावपूर्वक लगाये हुए भोगको भगवान् अवश्य स्वीकार करते हैं—९। २६ वि.
१५. सत्यकामका गुरुके आज्ञापालनसे कल्याण—१३। २५ परि.
१६. भगवान्द्वारा यक्षरूपसे इन्द्रका अभिमान दूर करना—१५। १२ परि.
१७. अतिथि-सत्कार करनेसे कपोत-कपोतीका कल्याण (महाभारत)—१६। ६ टि.
१८. धनसे जीवन नहीं चलता—१६। ११
१९. एक सुनारकी कहानी (पापका फल भोगना ही पड़ता है)—१८। १२ टि.
२०. श्यामलाल और रामलालकी कहानी (फौजदारी और दीवानी कोर्ट)—१८। १२ वि.
२१. धर्मका पालन सुख पानेकी इच्छासे नहीं किया जाता—१८। १२ टि.
२२. बनिया और चमार (पाप भगवान्के अपित नहीं होते)—१८। १२ वि.
२३. वेदव्यासजीके द्वारा कलियुगको, स्त्रियोंको तथा शूद्रोंको श्रेष्ठ बताना—१८। ४४
२४. विभीषणके प्रति भगवान् श्रीरामकी शरणागत-वत्सलता—१८। ६६
२५. माँ इधर क्यों आयी, उधर क्यों नहीं गयी?—१८। ६६ टि.
२६. वृक्षकी महिमा है या लता की? इसका हनुमान्जी द्वारा उत्तर—१८। ६६ वि.
२७. एक प्रज्ञाचक्षु सन्तकी घटना—१८। ६६ वि.
२८. बकरीद्वारा सिंहकी शरण लेना—१८। ६६ वि.
२९. कुलटा स्त्री और मौलवी—१८। ६६ वि.
३०. भगवान्का 'फनन्य' भक्त—१८। ६६ वि.
३१. एक अनभिज्ञ बालकका व्याख्यान—१८। ७०
३२. गीता पासमें रखनेसे चुड़ैलसे छुटकारा—१८। ७१
✥ ✥ ✥
उद्भूत
श्लोकानुक्रमणिका
| अ अंगहीनाश्रोत्रियषण्डशुद्रवर्जम् ..... ७।११ अग्निदो गरदृश्चैव ..... १।३६ अग्नीं प्रास्ताहुतिः ..... १७।१३ अजानन् दाहात्प्यं पतति ..... ११।२९ अज्ञस्यार्थप्रबुद्धस्य ..... ५।२ अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणम् ..... १३।१ अणोरणीयान् महतो ..... २।४०; १४।३ अतत्यजन्तो मृगयन्ति ..... १५।४ अतस्त्वरज्यायो लिंगाच्च ..... ६।४७ अतिपरिचयादवज्ञा ..... १८।६२ अत्यन्तकोपः कटुका च ..... १६।२० अथ कोऽयं परिणामः ..... ३।२० अद्वयं मूर्तिमत् ..... २।२० अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्या ..... ७।३० अध्यापनमध्येयनं यजनम् ..... १८।४६ अनित्याशुचिदुःखानात्मसु ..... ५।१५ अनुकूलवेदीयं सुखम् ..... ६।७ अनुग्रहाय भूतानाम् ..... ४।८ अनुभवजन्यं ज्ञानम् ..... २।७१ अनुभूतविषयासम्प्रमोषः ..... ३।२८; १८।७३ अनेकसंशयोच्छेदि ..... ३।३५ अन्तर्गृहगताः काश्चिद् ..... २।६५ अन्तःस्वभावभोक्ता ..... १७।१७ अन्नमयं हि सोम्य ..... १७।१० अन्नाद्धयेव खलिवमानि ..... ३।१४ अपरिग्रहस्थैर्यं ..... ४।५ अपवित्रः पवित्रो वा ..... १।२ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता ..... १३।१४ अभिद्वरति मामीश ..... ७।१६ अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः ..... १५।१३ अयमात्मा ब्रह्म ..... ७।३० अयमुत्तमोऽयमधमो जाल्या ..... १५।१७ अयोध्या मथुरा माया ..... ८।५ अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे ..... २।७ अवश्यमेव भोक्तव्यम् ..... १८।१२ अविद्यास्मिताराग ..... १८।६६ अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र ..... १८।४४ अश्वत्थामा बलिव्यासो ..... १।८ असंगो ह्ययं पुरुषः .. २।१७; ४।२३; १३।२१; १५।३ असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा ..... १८।६६ अस्मिन्ल्लोके वर्तमानः ..... ५।५ | अहमन्महमन्महमन्मन् ..... ७।६ अहमनादोऽहमनादोऽहमनादः ..... ७।६ अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् ..... ९।१९; १३।१३ अहं करोति वृथाभिमानः ..... १५।१२ अहं भक्तपराधीनः ..... ८।१९; ९।३१; १५।७ अहं हि वचनाद् राज्ञः ..... ४।११ अहिंसा परमो धर्मः ..... १।३६ अहिंसासत्यास्तेय ..... ४।२८; १७।१४ अहो अमीषां किमकारि ..... १६।६ अहो बकी यं स्तनकालकूटम् ..... १८।६६ अहो बत श्वपचोऽतो ..... १८।४४ अहो माया महामोही ..... १८।७३ आ आकाशात्पतितं तोर्यं यथा ..... ९।२३ आगते स्वागतं कुर्याद् ..... १६।१ आगमोऽपः प्रजा देशः ..... १४।१८ आचारहीनं न पुनन्ति ..... १८।४४ आतायिनायान्तम् ..... १८।६६ आत्मापि चायम् ..... ३।१२ आत्मानं चेद् विजानीयात् ..... १३।२० आत्मारामाश्र मुनयो ..... १२।१६ आत्मेव तदिदं विश्वम् ..... ७।६ आत्मेवेदं सर्वम् ..... ७।३० आदावन्ते च ..... २।२८; ४।२३ आदौ स्वर्णाश्रमवर्णिताः ..... ४।३४ आद्यन्तयोरेस्य यदेव ..... २।२८ आद्योऽवतारः पुरुषः ..... ४।१; ११।४९; १८।४६ आनिन्द्योन्यधिक्रियते ..... ९।३२ आरोग्यं भास्करादिच्छेत् ..... ९।१९ आशा नाम मनुष्याणाम् ..... १६।१२ आशिलष्य वा पादरताम् ..... १८।६६ आसुपेरामृते कालम् ..... १६।२२ आहारनिद्राभयमैथुनानि ..... ५।१५ आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः ..... १७।१० इ इच्छयाऽऽतपुषः ..... ९।११ इदं गुणमयं विद्धि ..... १०।३९ इदं ब्रह्मणे न मम ..... ३।११ इदमस्तु सन्निकृष्टे ..... ११।४६ इयं सोमकला नाम ..... ९।२० इहासने शुष्यतु मे ..... ६।२५ |
|---|
१२८४
- साधक-संजीवनी-कोश *
ई ईश्वरप्रणिधानाद्वा ..... १३।१० ईर्ष्याभयक्रोधसमन्वितेन ..... १७।१०
उ उत्तमा सहजावस्था ..... ३।१८ उत्पत्तिं प्रलयं चैव ..... ६।३९ उपसंहर विश्वात्मन्तदो ..... ४।९ उभौ मे दक्षिणी पाणौ ..... ११।३३
ऊ ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख ..... १५।१
ऋ ऋतामृताभ्यां जीवेतु ..... १८।४४
ए एकमेव तु शुद्रस्य ..... १८।४६ एकाकी न रमते ..... ४।११; ८।१९; १८।५७, ७३ एको दशसहस्राणि ..... १।६ एतद् धनंजयो वाच्यो ..... २।३ एतन्मैथुनमप्यङ्गम् ..... १७।१४ एतावानेव योगेन ..... ५।३ एते वेदविदो मुख्या ..... १०।६ एवं विमूशय सुधियो ..... ८।५ एवं स्वभक्त्यो राजन् ..... १०।९; १८।१२ एवमुक्तस्तु कृष्णेन ..... १।१०; ४।३ एष ते सजयो राजन् ..... ११।४९ एष ह्येव साधु कर्म ..... ५।१४ एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मीणा ..... १२।१६
ओ ॐ तत्सदिति मन्त्रेण ..... १७।२३
क कफवातादिवोषेण ..... ६।४७ करोति सोमवृक्षोऽपि ..... ९।२० कर्णस्त्वचं शिबिर्मासम् ..... १६।२ कर्तव्यदीक्षां च ..... प्रा. कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः ..... १४।२ कर्मणा बध्यते जन्तुः ..... २।४९; ५०; ३।९, २०; ४।३; ९।९; १२।१०
कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै ..... १६।४ कर्मयोगस्तु कामिनाम् ..... ३।१७, २८, ३८ कलेवरं वा तद्दस्म ..... ८।५ कवले कवले कुर्वम् ..... १७।१० काठिन्यं विषये कुर्याद् ..... १८।५७ कामबन्धनमेवैकम् ..... ३।४० कामाद् द्वेपाद् भयात् ..... ४।११; ७।१८; १८।६६ कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा ..... ९।१४
कार्पण्यवृत्तिः स्वजनेषु ..... १६।२० किं जन्मना सकलवर्ण ..... १८।६६ कुपात्रदानाच्च भवेद्विरदो ..... १७।२० कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि ..... ७।१५ कृषिवाणिज्यगोरक्षं कुसीदम् ..... १८।४४ कृष्णानुग्रहदायिका सकरुणा ..... प्रा. कृष्णे पक्षे प्रगलति ..... ९।२० केवलेन हि भावेन ..... ९।३२ क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो ..... १६।४ क्वेद्वग्निर्वाविगणिताण्ड ..... ११।१५ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः ..... ८।९; १३।१२; १५।१७
ख खं वायुमर्गिनं सलिलम् ..... ७।३०
ग गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु ..... ४।१० गायन्ति देवाः किल ..... १६।६ गावो विश्वस्य मातरः ..... १६।६ गीताध्ययनशीलस्य ..... ४।२९ गीतायाः पुस्तकं यत्र ..... १८।७० गुणरहितं कामनारहितम् ..... १८।५५ गोप्यः कामाद् भयात् ..... १८।६६ गोप्यस्तपः किमचरन् ..... ४।६ गृहीत इव केशेषु ..... ८।५ गृहेषु पण्डिताः केचित् ..... ४।१९
च चक्षुषा सजयो राजन् ..... ११।४९ चतुर्भुजश्च वैकुण्ठ ..... ११।५१ चाण्डालोऽपि मुनेः ..... १८।४४ चिन्ता चितासमा ..... १।२९ चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय ..... १६।११
ज जगदव्यापारवर्जम् ..... प्रा. जानामि धर्मं न च ..... ३।३६ जपो होमः प्रतिष्ठा ..... १७।२३ जायतेऽस्ति विपरिणमते ..... ३।३५ ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः ..... १८।७८
त तत्क्षम्यतां स भगवान् ..... ८।५ ततः पुनः शान्तोदितौ ..... ३।५ ततस्तं प्रियमाणं तु ..... ६।४७ ततेदन्तावगाहि ..... २।१३ तत्सुखे सुखित्वम् ..... ६।४७ तत्सुष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ..... ७।१०; १०।११ तत्र स्थितौ यन्त्रोऽभ्यासः ..... १२।१२
- उद्भूत श्लोकानुक्रमणिका *
१२८५
तथा न ते माधव तावका: ..... ९।३१; १८।६६ तदक्षरं वेदयते यस्तु ..... १५।११ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ..... प्रा.; ६।२३ तदाहं बृहद्यप्यामि ..... १।२० तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो ..... २।६७ तद्य इह रमणीयचरणा ..... ९।३२ तद्विज्ञानार्थं स ..... ४।३४ तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ..... १८।६६ तन्मया: ..... ४।१० तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति ..... १५।११ तमेव परमात्मानम् ..... २।६५ तव कथामृतं तपजीवनम् ..... १६।१ तव पुत्रे गते स्वर्गे ..... ११।४९ तस्माज्जातिस्मरा लोके ..... २।१३ तस्मात् केनाप्युपायेन ..... ३।३४ तस्मिंस्तज्जेन भेदाभावात् ..... ७।१८; ९।२९; १०।९ तस्मिन्नस्तमिते भौष्मे ..... १।१२ तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ..... १५।१२ तस्या: कन्द: कलयतितराम् ..... ९।२० तस्यारविन्दनयनस्य ..... ४।९ तावत् कर्माणि कुर्वति ..... ४।१५; ५।५; १८।५० तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि ..... १२।१६ तुणादपि सुनीचेन ..... ६।४७ ते नाधीतश्रुतिगणा ..... १०।११; १८।६६ ते समाधावुपसर्गा ..... प्रा. त्रिभुवनविभवहेतवे ..... १८।६६ त्रैलोक्यसौभागमिदं च ..... ११।५१ त्वदीयं वस्तु गोविन्द ..... ३।३४; ६।३२; ९।२४; २७ त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुण: ..... ११।५१ त्वया संधार्यते लोकस्त्वया ..... ४।१ त्वयि धृतासव: ..... १०।९ त्वं गति: सर्वसाइख्यानाम् ..... ४।१ त्वं तु राजन् मरिष्ट्येति ..... २।११; १८।२२ त्वं ब्रह्म परमं व्योम ..... ४।९ त्वं भानो जगतरचश्चतुस्त्वमात्मा ..... ४।१
द
दानमेकं कलौ युगे ..... १७।२२ दिवि वा भुवि वा ..... १८।६६ दीर्घायुषो मन्त्रकृत ..... १०।६ दुर्लभो मानुषो देहो ..... ६।४२ दु:सहप्रेच्छविरह ..... २।६५ देवर्षिभूतापनूणां पितुणां न ..... १८।५८ देहाभिमाननि सर्वे दोषा: ..... १२।५ देहाभिमाने गलिते ..... ६।३४; १३।८
दोषबुद्ध्योभयातीतो ..... १८।१० दोषेण तीत्रो विषय: ..... १५।२ द्यौ: सचन्द्रार्कनक्षत्रा ..... १५।१२ द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्यु: ..... ३।३० द्वा सुपणीं सयुजा ..... ७।२२; ३०; १५।१६ द्वितीयाह्वे भयं भवति ..... १८।६६ द्विभुजो राधिकान्तो ..... ११।५१ द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे ..... १५।१७ द्वैतं मोहाय बोधत्वागजाते ..... १२।२; १८।५७ द्वैताद्वैतमहामोह: ..... १८।७३
ध
धनानि भूमौ पशवश्च ..... १५।३ धर्मसंरक्षणार्थाय ..... ३।२२; ४।९ धर्मस्य प्रभुरच्युत: ..... ४।८ धर्मार्थसहिता वाच: ..... १८।७६ धर्मोरक्षति रक्षित: ..... ३।३५
न
न खलु गोपिकानन्दनो ..... १०।११ न गोप्रदानं न महीप्रदानम् ..... १६।१ न जातु काम: ..... ३।३९; १५।९ न तत्र सूर्यो भाति ..... १५।६ न तस्य प्राणा ..... ५।१७ न तत्समश्चाभ्यधिकश्च ..... १५।१ न तथा मे प्रियतम ..... १८।६४ न दैत्यं न पलायनम् ..... २।१ न निरोधो न चोत्पत्तिर्न ..... ७।२६ न पारमेष्ठं न ..... १०।१०; १८।६६ न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजाम् ..... १०।११ न मे स्तेनो जनपदे ..... ४।२ न यत् पुरस्तादुत ..... २।२८ न यत्र श्रवणादीनि ..... ११।३६ नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो ..... १०।४०; १८।४६ न वार्यपि प्रयच्छेत्तु ..... १८।४४ न वासुदेवभक्तानामशुभम् ..... ९।३१ न विदु: सोम ते ..... १५।१३ न शक्यं तन्मया ..... न.नि.; १०।१; १८।७६ न शुद्धा भगवद्भक्ता ..... १८।४४ न श्ववृत्या कदाचन ..... १८।४४ न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ..... १।३६ नागयोनौ यदा चैव ..... ४।९ नाततायिवधे दोषो ..... १।३६; १८।६६ नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ..... १०।१५ नायमात्मा प्रवचनेन ..... १५।११ नारायणं नमस्कृत्य ..... १।१४
१२८६
साधक-संजीवनी-कोश
| नास्ति तेषु जातिविद्या..... | १८। ६६ |
|---|---|
| नास्त्यकृतः कृतेन..... | १५। १५ |
| नास्याब्रह्मवित् कुले..... | ६। ४२ |
| नित्यदा ह्यंग भूतानि..... | २। १६ |
| निरपेक्षं मुनिं शान्तम्..... | १२। १६ |
| निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषो..... | ४। ६ |
| निवृत्तिरपि मूढस्य..... | ४। १९ |
| नीचवत् सेवेत सदगुरुम्..... | ४। ३४ |
| नुदेहमाद्यं सुलभम्..... | ७। १९ |
| नेत्रवेदखयुग्मे हि..... | १८। ७८ |
| नेह नानास्ति किंचन..... | ७। ३० |
| नैव वाचा न मनसा..... | १५। ११ |
| नोद्यं वा परिहारो वा..... | ७। ८ |
प
| पंचं चैव महावीर्याः..... | १। ४६ |
|---|---|
| पंचांगयुक्तपंचदशच्छदाद्या..... | ९। २० |
| परिणामतापसंस्कार..... | ५। २२ |
| परित्राणाय साधूनां सेवाम्..... | ८। १५ |
| परित्राणां पवित्रं यः..... | ४। १०, ३८; |
| १०। ११-१२; १२। १६ | |
| पशुबुद्धिमिमां जहि..... | १३। २८ |
| पशूनां रक्षणम्..... | १८। ४६ |
| पाठक्रमार्थक्रमो बलीयान्..... | ६। ११ |
| पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतम्..... | १८। ५७ |
| पाषण्डिनो विकर्मस्थान्..... | १८। ४४ |
| पाहि पाहि महायोगिन्..... | ७। १६ |
| पितामहवचः श्रुत्वा..... | ४। ९ |
| पितृगोत्री यथा कन्या..... | १८। ६६ |
| पित्रोः सम्पश्यतोः..... | ४। ९ |
| पिवन्त इव चक्षुर्भ्याम्..... | ४। ६ |
| पुस्तवे स्त्रीत्वे विशेषे..... | १८। ६६ |
| पुरा शक्रेण मे दत्तम्..... | ११। ३५ |
| पुरोधसां वसिष्ठोऽहम्..... | १०। ३९ |
| पुरुषान् परं किंचित्सा..... | ७। ७ |
| पूर्वेषामपि गुरु..... | ११। ३७; १५। १२; १७। ३ |
| पृथिव्यां तिष्ठन् यो..... | १५। १२ |
| प्रकाशक्रियास्थितिशीलम्..... | १४। ७; १८। २८ |
| प्रकाशं वा प्रकाशं वा..... | १। १० |
| प्रजानां रक्षणम्..... | १८। ४६ |
| प्रजानामेव भूतर्थं स..... | ४। २ |
| प्रतिकूलवेदीन्यं दुःखम्..... | ६। ७ |
| प्रयतिष्ये तथा कर्तुम्..... | १। ४ |
| प्राप्तव्यमर्थं लभते..... | १८। १२ |
| प्रियवाक्यप्रदानेन..... | १७। १५ |
ब
| बहवो मत्पदं प्राप्ताः..... | १८। ६६ |
|---|---|
| बहु स्यां प्रजायेय..... | ७। १०; १। ५, ७, ८, २४; |
| १०। २०; १४। ७ | |
| बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो..... | ९। ३१ |
| ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति..... | ५। २० |
| ब्रह्मणा सह ते सर्वे..... | ८। २४ |
| ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति..... | ५। २०, २४; ९। ३२ |
| ब्राह्मणस्य हि देहोऽयम्..... | १८। ४४ |
| ब्रूयुः स्निग्धस्य..... | १०। १ |
भ
| भक्तभक्तिमान्..... | ४। ८ |
|---|---|
| भक्त्यर्थं कल्पितम्..... | ७। १८ |
| भक्त्या सजातया भक्त्या..... | ७। ३०; १२। २ |
| भजिता क्वथिता धाना..... | १६। ५ |
| भावग्राही जनार्दनः..... | ९। ३० |
| भगवानपि ता राज्ञीः..... | ४। ६ |
| भावाद्वैतं सदा कुर्यात्..... | ५। १८ |
| भुज् पालनाभ्यवहारयोः..... | ३। १२ |
| भृद्गीपवर्षसरिदद्दिनभः..... | ७। ३० |
| भूमनिन्द्राप्रशंसासु..... | १२। ५ |
| भृत्यापराधे सर्वत्र..... | १८। ६६ |
| भोगा न भुक्ता वयमेव..... | १५। ९ |
| भोगे रोगभयं कुले..... | १६। १ |
म
| मत्सेवार्थां तु निर्गुणा..... | १४। २६ |
|---|---|
| मन एव मनुष्याणाम्..... | ६। ३४ |
| मनसा वचसा दृष्ट्या..... | ७। १२, १९, ३० |
| मनस्येकं वचस्येकम्..... | १६। १ |
| मनस्वी कार्यार्थी..... | ३। ८; १६। ३ |
| मन्त्रो हीनः स्वरतो..... | २। ४० |
| मन्त्रिकेतं तु निर्गुणम्..... | १४। २६ |
| ममतामेध्यद्वीपितः..... | ४। १० |
| मयानुकूलेन नभस्वतेरितम्..... | ७। २६ |
| मया परोक्षं भजता..... | ६। ४० |
| मरीचिरगिराश्चात्रिः..... | १०। ६ |
| मल्लानामशनिर्नुणां नरवरः..... | ७। २५ |
| महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च..... | ६। ४२ |
| महापातकयुक्ता वा..... | ८। ५ |
| मा कश्चिद् दुःखभागभवेत्..... | ३। ३४ |
| मात्रा स्वस्वा दुहित्रा..... | २। ६० |
| मागांस्त्रयो मया प्रोक्ताः..... | प्रा. |
| मागांस्त्रयो मे विख्याता..... | प्रा. |
| मागंप्रयाते मणिलाभवन्मे..... | ११। ५२ |
- उद्भूत श्लोकानुक्रमणिका *
१२८७
मायां तु प्रकृतिं विद्यान् ..... १३। २० मायां न सेवे भद्रं ते ..... १८। ७६ मा यात पान्थाः ..... १८। ६६ मुक्तोपसुष्यव्यपदेशात् ..... ७। ३; १५। ४ मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि ..... १८। २८ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः ..... ७। ४ मूलाभावे कुतः शाखा..... ४। ३६ मृगमीनसज्जनानाम् ..... ११। १५ मृगा मृगैः सङ्गमुन्मज्जन्ति ..... १७। ७ मृतानां बान्धवा ..... २। ११ मृत्योः स मृत्युं गच्छति ..... ७। ३० मैत्रीकरणमुदितोपेक्षणाम् ..... ११। १३ मोक्षस्य काङ्क्षा यदि वै ..... १५। २ प्रियते रुदताम् ..... २। १३
य
यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते ..... १०। ३९ यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् ..... १६। ३ यतस्तदीयाः ..... १८। ६६ यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति ..... ११। १६ यत् पृथिव्यां ब्रीहियवम् ..... १५। ९ यत्र गीताविचारश्च ..... १८। ७० यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प ..... १८। ४४ यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः ..... २। ३९ यथा वज्रगोपिकानाम् ..... ७। १६ यदा गन्धर्वयोर्नौ ..... ४। ९ यदा त्वहं देवयोर्नौ ..... ४। ९ यदा सर्वप्रमुच्यते ..... ३। ४३ यदि भीमाजुनौ कृष्ण ..... १। ४६ यद्वावि तद्भवत्येव ..... १८। १२ यन्नखेन्द्रुरचिब्रह्म ..... १४। २७ यन्मनसा न मनुते ..... ६। २५ यमनियमासनप्राणायाम ..... १७। १४ यस्तु यस्यादिरन्तरश्च ..... २। २८ यस्य भासा सर्वमिदम् ..... १३। १७ यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तम् ..... १८। ४४ यः कश्चनेशो बलिनो ..... ७। २८ या दोहनेऽवहनने ..... ७। १७ या यस्य प्रकृतिः ..... ७। २० यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ..... १६। ११ यावत् सर्वेषु भूतेषु ..... ९। ५; ११। २० यावद्वत्सपवत्सकाल्पक ..... ६। ३० यावद्भि तौक्षण्या सूच्या ..... १। १ यावानहं यथाभावो ..... १८। ५५ यधि तुरगरजोविधूप ..... १८। ४६
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः ..... ९। ३१; १८। ५८ ये मृताः सहसा ..... २। १३ येयं राधा यश्च कृष्णो ..... ४। ६ ये ये हताश्रद्धघरेण ..... ४। ८ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ..... प्रा.; ६। १०; २३ योगासत्रयो मया प्रोक्ता ..... न.नि.; प्रा.; ५। १; २ योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा ..... १३। २८
र
रगात् कामः प्रभवति ..... ३। ४० रागो लिंगमबोधस्य ..... २। ४७ रूपं दृश्य लोचनं दृक् ..... १३। १
ल
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदम् ..... ७। १९ लालने ताडने ..... ९। २८; १८। १२ लोकवतु लीलाकैवल्यम् ..... ४। १४ लोकाभिरामां स्वतनुम् ..... ४। ९
व
वंशीधरं तोत्त्रधरं नमामि ..... प्रा. वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ..... ७। २६ वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वम् ..... ५। १०; ११। ५ वरं ममेव मरणं मद्भक्तो ..... १८। ६६ वाग् गद्गदा द्रवते ..... ७। १९ वाचं तां वचनाहंस्य ..... १८। ७६ वासना यस्य यत्र स्यात् ..... ८। ६ विकर्म यच्चोत्पतितम् ..... ७। २८; ९। २८ विज्ञातरमरे केन ..... ४। ३८; १०। १५; १५। ११ विद्याधरा मनुष्येषु ..... १८। ६६ विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ..... १८। ३२ विनिष्क्रामति कृच्छ्रेण ..... २। १३ विपदः सन्तु नः ..... ६। ३५ विप्राद् द्विषड्गुणयुता ..... १८। ४४ विमुच्यति यदा कामान् ..... ३। ४३ विशेषानुग्रहश्च ..... १८। ५८ विषयान् ध्यायतश्चित्तम् ..... १२। ८ वीतरमृहाणामपि मुक्तिभाजाम् ..... ९। २९ वृद्धा नारी पतिव्रता ..... ६। ३ वैवाहिको विधिः स्त्रीणाम् ..... ३। १४ व्याप्रस्तुष्यति काने ..... १८। १२ व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य ..... १८। ६६ व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम् ..... १०। ३७ व्युत्थाननिरोधसंस्कार ..... ३। ५
श
शब्दशकेरचिन्त्यत्वात् ..... १०। १९ शय्यासानटनविकल्पन ..... ११। ४१
१२८८
*साधक-संजीवनी-कोश *
शरीरं व्याधिमन्दिरम् ..... १३१ ८ शिष्यते शेषसंज्ञः ..... ७१ १०; १९; १०१ २० शूद्रे तु यद् भवेत्लक्ष्म ..... १८१ ४४ शौचसन्तोषतपः ..... १३११०; १७११४ शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा ..... १६१३; १७११४ श्लेष्माश्रु बान्धवैर्मुक्तम् ..... २१ ११ श्रद्धया देयमश्रद्धयादेयम् ..... १७१ २२ श्रवणं कीर्तनं विष्णोः ..... १२१ २ श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे ..... ८१ ४; १६१ १८ श्रुत्वा स्मृष्ट्वा च ..... ५१ ७ श्रूयतां धर्मसर्वस्वम् ..... ३१ ३४
स
संख्यानं परमाणूनां कालेन ..... १०१ ४० संगः सर्वात्मना त्याज्यः ..... १३१ १० संचारः पदयोः प्रदक्षिणाविधिः ..... ९१ १४ संजयो मुनिकल्पस्तु ..... ११ १ संजीवनी साधकजीवनीयम् ..... प्रा. संसारधर्मैरविमुह्यमानः ..... ३१ ३५; ९१ ३ संस्कारमात्रज्ञं ज्ञानम् ..... १८१ ७३ स एव पापिष्ठतमो ..... ११ ३६ सकलमिदमहं च ..... ७१ १९ सकृदेव प्रपन्नाय ..... १६११; १८१ ६४ सतामयं सारभूतां निसर्गी ..... १०१ ९ सतां हि सन्देहपदेषु ..... ३१ ३४; १२१ १४ सति मूले तद्विपाको ..... १८१ ४७ सत्यं दया तपो ..... १७१ २२ सत्यं ब्रूयात् प्रियम् ..... १७१ १५ सत्सङ्ग्रेन हि दैतेया ..... १८१ ६६ सदा सन्तुष्टमनसः सर्वाः ..... १२१ १३ सदेव सोम्येदमग्र ..... ७१ १९ सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति ..... ७१ १९; १८१ ५७ सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः ..... १८१ १२ सप्तैते सप्तभिश्चैव ..... १०१ ६ समत्वमाराधनमच्युतस्य ..... ६१ ९; १८१ ५७ समवतीं परेतारद् ..... ५१ १८ सम्मीलने नयनयौनीहि ..... ७१ २८ सर्वं खलिर्वद् ब्रह्म ..... ४१ २४; ७१ ३०; ..... १३१ १४ सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य ..... ६१ २५; ७१ १९; ९१५; १२१ २०
सर्वजानपदांजित्वा ..... ११ १५ सर्वार्थतैकाग्रतयोः ..... ३१ ५ सर्वे च देवा ..... १०१ ४० सर्वे देवाश्च ऋषयो ..... १८१ ७० सर्वे भवन्तु सुखिनः ..... ५१ १८; १५१ ३ सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति ..... १५१ १ सा काष्ठा सा परा गतिः ..... ६१ २१; १८१ ७८ साङ्गोपाङ्गानपि यदि ..... १५१ १५ साधकतमं करणम् ..... १३१ ३१ साधवो न्यासिनः शान्ता ..... १२१ १६ सामान्यशास्त्रो न्यूनम् ..... ७१ १५ सालोक्यसाष्टिसामीप्य ..... १०१ ११ सुग्रीवो हनुमानुक्षो ..... १८१ ६६ सुखमैन्द्रियकं राजन् ..... १८१ १२ सुपात्रदानाच्च भवेद्ब्रह्माढ्यो ..... १७१ २० सुहृदः सर्वदहिनाम् ..... ४१ ११; ५१ २९; ६१ ९; ..... १२१ १३; १८१ १२ सूर्य आत्मा जगतस्तत्स्थुपश्च ..... ४१ १ सूर्याचन्द्रमसौ धाता ..... ४१ १ सुष्टिरिस्थित्यन्तकरणाद् ..... १३१ १६ सेवा श्ववृत्तिराख्याता ..... १८१ ४४ स्तेनो हिरण्यस्य ..... १७१ १० स्तोत्राणि सर्वा गिरः ..... ९१ १४ स्थानाद् बीजाद् ..... १७१ १४ स्थान्युपनिमन्त्रणे ..... प्रा. स्मरणं कीर्तनं केलिः ..... १७१ १४ स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु ..... ११ ३६ स्वतन्त्रः कर्ता ..... १३१ ३१ स्वधर्मस्थो यजन् ..... ५१ ५ स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य ..... १८१ ६६ स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते ..... ७१ २०; १८१ १२ स्वसवाही विदुषोऽपि ..... १२१ १५; १८१ ६६ स्वर्गास्थितानामिह जीवलोक ..... १६१ २०
ह
हरिर्यर्थेकः पुरुषोत्तमः ..... १०१ १५ हरिः शरणमेवं हि ..... १०१ ६ हरे राम हरे राम ..... १७१ १० हितपरिमितभोजी ..... १७१ १६ हृदि प्राणः स्थितो ..... ४१ २९
हिन्दी पद्यानुक्रमणिका
| अ अंतहूँ तोहि तजैगे ..... ५१ १२ अरिखल बिस्व यह ..... १२१ १४ अग्या सम न सुसाहिब ..... १८१ ४४ अनारंभ अनिकेत ..... १२१ १६ अरथ न धरम ..... १८१ ६६ अरिहुक अनभल ..... ४१ ८ अवसि देखिअहिं ..... १३१ १७ अस बिचारि हरि भगत ..... १०१ ११ आ आजु जो हरिहिं न सस्त्र ..... ९१ ३१; १११ २६ आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा ..... ८१ १५ आनन रहित सकल रस ..... १३१ १४ इ इमि कुपंथ पग ..... ११ १९ इष्टदेव मम बालक ..... १८१ ६६ ई ईस्वर अंस जीव ..... १४१ ५; १६१ २२ उ उत्तम के अस बस ..... ९१ २२ उदय केत सम ..... ३१ १६ उपजा ग्यान चरन ..... २१ २७ उमा राम सम हित ..... १०१ १ उमा राम सुभाउ ..... ४१ ९, १४; ७१ २१ उमा संत कइ इहइ ..... १२१ ४, १५ उर प्रेरक रघुबंस ..... १८१ ६६ ऊ ऊधौ! मन माने की बात ..... १८१ ६६ ए एहि तन कर फल ..... ३१ १०, ३४; ७१ १९ एक बानि करुनानिधान ..... १११ ५४; १२१ १४; १८१ ५६ एक भरोसो एक बल ..... १११ ५४; १८१ ६६ क कपट गाँठ मन में ..... १६१ १ कबहुँक करि करना ..... ७१ २६; १६१ ६ करहिं जोहारु भेंट ..... ४१ ६ | कह रघुपति सुनु ..... ९१ ३३ कह हनुमंत विपति ..... ७१ १६ काँच कटोरो कुम्भ ..... ११ २ काजु हमार तासु हित ..... ४१ ११ काम अछत सुख ..... ३१ ३७, ३९ कामिहि नारि पिआरि ..... १५१ ९ काहू के बल भजन ..... १८१ ६६ कुछ श्रद्धा कुछ दुष्टता ..... ४१ ४० कोई हरिजन ऊबरे ..... १८१ ६६ कोटि विप्र बध ..... ७१ २६; ९१ ३० कोयला होय नहीं ..... १८१ ६४ ख खोज पकड़ सँठे रहो ..... १८१ ६६ ग गई मारन पूतना ..... १८१ ६६ गूढ़उ तत्त्व न साधु ..... ४१ ५; १०१ १ गोधन गजधन बाजिधन ..... १२१ १४ घ घर गुरु गृह प्रियसदन ..... ९१ २६ च चलती चक्की देखकर ..... १८१ ६६ चहुँ दिसि आरति ..... १३१ १३ चाख चाख सब छाड़िया ..... १५१ ९ चाह गयी चिन्ता मिटी ..... ३१ ३९ चित्र लिखे जनु ..... ४१ ६ चिदानंद मय देह ..... ४१ ९; १११ ५२ चिन्ता दीनदयाल को ..... १८१ ६६ चेतन अमल सहज ..... ४१ १०; ९१ ३१; १३१ ८ छ छिति जल पावक ..... २१ २७ ज जगत प्रकास्य प्रकासक ..... १५१ ६ जथा अनेक बेध धरि ..... १११ ४९ जन अवगुन प्रभु मान ..... १८१ ५६ जन्म कोटि लागि ..... ३१ ८ जब द्रवै दीनदयालु ..... ६१ ४२ जब लागि गज बल ..... १५१ ४ |
|---|
१२९० * साधक-संजीवनी-कोश *
जाके डर सुर ................................... १। १९
जाति पाँति कुल धर्म .......................... ९। ३३
जानि लखन सम ............................. १८। ७०
जासु सत्यता तें जड़ ................. १२। ३; १३। २८
जाहि न चाहिअ .............................. १८। ६६
जाहि लगन लगी ............................. १८। ६६
जित देखौं तित स्याममई ..................... ७। १९
जिन्ह कें रही भावना .......................... ७। २५
जिमि प्रतिलाभ ....................... ३। ३७; ७। २०;
....................................... १४। ७; १५। ५; १८। २७
जे ग्यान मान बिमत ........................... ९। ३१
जेन केन बिधि दीन्हें ......................... १७। २२
जो अपराधु भगत ............................... ४। ८
जो जाको शरणो गहें ......................... १८। ६६
जो दस बीस पचास ........................... ३। ३९
जौं नर होइ चराचर ........................... ७। १५
त
तजउँ न नारद ................................... ३। ८
तजि मद मोह कपट ........................... ७। १५
तदपि करहिं सम बिषम ....................... ९। २९
तन बिनु परस ................................ १३। १४
तारा बिकल देखि ............................. २। २७
तुम्हरिहि कृपाँ ....................... १०। १४; १५। २०
तेज कृसानु रोष ............................... ३। १६
त्यागी शोभा जगत में ......................... ४। १९
तेरे भावे जो करे ............................. १३। ८
द
दरिया दूषण दास ............................. ४। ११
दरिया हरि किरपा .............................. ४। ६
दुस्सासन की भुजा ............................. ४। ६
देस काल दिसि ............................... ३। २०
द्रुपद सुता निरबल ............................. ४। ६
ध
धर्म तें बिरति .......................... ३। १९; १५। ३
धर्मसील बिरक्त ................................ ७। ३
धान नहीं धीणों ........................ १६। ११; १८। १२
न
न कुछ हम हँसके सीखे ...................... १३। ७
नगन मूरति बाल गुपाल ...................... १८। ६६
नर तन सम नहिं ....................... ७। १९; ८। ६
नरक स्वर्ग अपबर्ग ................. ७। १९; ८। ६; १५। २
नवधा भगति कहउँ ..................... १६। ३; १८। ४७
नव महँ एकउ ................................. १६। ३
नाग असुर सुर .................................. ४। ६
नारायन बौरी भई डोलै ....................... १८। ६६
निज अग्यान राम पर ......................... १५। २०
निज इच्छाँ प्रभु ................................. ४। ९
निज प्रभुमय देखहिं....७। १९; १२। १३, १४, १५; १६। ३
निरखि निषादु नगर .......................... १८। ७०
निर्गुन रूप सुलभ ............................... ७। २
नीच नीच सब तर गये ....................... १८। ४५
प
पर दुख दुख........३। ३४; ५। १८; ६। ३२; १६। २
पर द्रोही पर दार ............................... ३। १६
पाग भाग वाणी ................................. १४। ४
पापवंत कर सहज ............................. १६। ७
पुरुष नपुंसक नारि ........................... १२। १४
प्रगट चारि पद ............................... १७। २२
प्रगट सो तनु ................................... २। २७
प्रारब्ध पहले रचा ............................ १६। ११
प्रेम भगति जल बिनु ... १२। २; १३। १८; १६। ३; १८। ५५
ब
बँध्यो बिषय सनेह ते ......................... ७। ३०
बरन धर्म नहिं आश्रम ........................ १७। २८
बरु भल बास नरक ........................... १६। १९
बहुरि बंदि खल गन ....................... १२। १३-१४
बिगरी जनम अनेक ........................... १५। ७
बिधि बस सुजन ............................... ६। ४०
बिना बिचारे जो करै ......................... १८। २५
बिनु पद चलइ ................................ १३। १४
बिप्र धेनु सुर .................................... ४। ९
बिषय करन सुर .............................. १३। १७
बुझै न काम अगिनि .......................... ३। ३७
भ
भए प्रगट कृपाला .............................. ४। ९
भगति पच्छ हठ करि ......................... १८। ६६
- हिन्दी पद्यानुक्रमणिका *
१२९१
भगति हीन नर सोहड़..... ९। ३३ भले पधारे लम्बकनाथ ..... ९। २५
म
मति अति नीच..... ६। ४४ मनुवाँ तो चहुँ दिसि..... ३। २६ मम दरसन फल ..... ४। ६; ७। ३०; १०। ११; १२। ७ ममता मल जरि ..... ४। १०; ५। ११; १८। ४६, ६६ मम हृदय भवन..... १६। २२ महादेव अवगुन भवन ..... १८। ६६ मिटी न मनकी वासना..... ४। ३० मुरदे को हरि ..... १६। ११ मूर्ति मधुर मनोहर ..... ४। ६ मेरे तो गिरधर गोपाल ..... १२। ६ मैं अरु मोर तोर ..... १०। ४१ मैं तो हूँ भगतन का ..... १५। ७; १८। ५७ मैं नर-राची ना लखी ..... १८। ६६ मोरें अधिक दास पर ..... ७। २१ मोरें प्रौढ़ तनय सम ..... १२। ५, २०
य
यह बिनती रघुबीर ..... १८। ६६ यह हमारि अति ..... ३। १६ यहि दरबार दीनको आदर ..... ७। १८ या ब्रजरस की परस ..... १८। ६६
र
रहति न प्रभु चित..... ४। ११; ६। ४४; ७। १५; ९। ३०; १८। ५६, ६६ राम कीन्ह चाहहिँ ..... ९। ३४; १८। ६६ राम मरे तो मैं ..... १६। १ रोम रोम प्रति लागे..... ४। ६; १०। ४२; ११। ७, १५ राम सच्चिदानंद दिनेसा ..... १३। १२
ल
लाभु कि किछु हरि ..... १५। २०
श
शोक उसीका कीजिये ..... २। २७ श्रुति सेतु पालक ..... ४। ८
स
संकर सहज सरूप ..... प्रा. संसृत मूल सूलप्रद नाना ..... ७। १५
सकल प्रकार भगति..... १८। ४७ सनमुख होइ जीव मोहि.... ७। १५, २६, २८; ९। २९, ३०; १६। ५; १७। २२; १८। ६६ सब कर परम प्रकासक ..... १३। १७ सब जानत प्रभु प्रभुता..... न. नि. सब ते सो दुर्लभ ..... ७। ३ सब मम प्रिय सब ..... ९। २९; १८। ६६ सबहि मानप्रद आपु अमानी..... १२। १३-१४; १३। ७ सहज प्रकासरूप भगवाना ..... १३। १२ सहज बिरागरूप मनु ..... ४। ६ सातवँ सम मोहि मय ..... ९। २९ साधन धाम मोच्छ ..... १८। ४७ सासति करि पुनि ..... १८। ६४ सीम कि चाँपि सकइ ..... ९। ३१ सुनहु तात माया कृत ..... १४। २२ सुनहु भरत भावी ..... ४। ३ सुनु खगेस नहिं कछु ..... १०। ३४ सुनु मुनि तोहि कहउँ ..... १२। ५ सुनु सुरेस रघुनाथ ..... ४। ८ सुमति कुमति सब केँ ..... ९। ३०; १६। ६; १८। १४ सून बीच दसकंधर ..... १। १९ सेवक सुत पति मातु ..... १८। ६६ सेवक बिषय बिबर्ध ..... १५। २ सेवहिं लखनु सीय ..... ५। १८ सो दससीस स्वान..... १। १९ सोइ अतिसय प्रिय ..... १६। ३ सोइ जानइ जेहि..... ४। ६; ७। २५; १०। १४; १५। २०
ह
हम भरि जन्म ..... ४। ६ हरि-डर, गुरु-डर ..... १६। १ हरि दुरलभ नहिं जगत में ..... ८। १४ हरि अनंत हरि कथा ..... १०। ४० हरि से तू जनि हेत कर ..... ८। १४ हेतु रहित जग जुग..... ४। ८; ५। २९; १२। १३; १८। ६६ है सो सुन्दर है सदा ..... १५। ११ होइहि सोइ जो राम..... १८। ६६
नामानुक्रमणिका
| अ अंगद—४।११ अंगिरा—१०।१२-१३ अगस्त्य—२।२४ अग्निदेव—१।१४; १०।२३; १५।१२ अजामिल—६।४०; ८।५; ९।३० अर्जुन—२।३ टि.; ४।१, ३, ११; ५।१; १०।१ परि., १६, ३७; ११।४१-४२; १६।५ मा.; १८।५८, ६६ वि., ७४ अर्यमा—१०।२९ अश्वपति—४।२ इ इन्द्र—१।१४; ३।१४; ६।३२; ७।१९; ८।१६; ९।२०, २२ परि.; १०।२२, २७; ११।३५; १५।१२; १६।२; १७।२२ उ उतंक—३।२२ परि.; ४।९ उत्तरा—७।१६ उद्भव—२।३८; ७।१६; १०।३९; १८।६४, ६६, ७६ परि. उर्वशी—१६।५; १८।३६ क कंस—७।२७ कपिल—१०।२६ करमाबाई—९।३२ करमेली—९।३२ कर्ण—११।२६ टि.; १८।६६, ७३ कर्णपिशाचिनी—९।२५ वि. काकभुशुण्डि—१०।३४; १८।६६ वि. कामधेनु—१०।२८ कुन्ती—१।११; ३।१६; ६।३५; ९।३२ कुबेर—१०।२३ कौसल्या—११।४७; १८।७७ ख खाण्डववन—१।१४ ग गंगा—३।३४; ४।११; ८।५; १०।३१; १२।१६; १५।३, ६, ८; १८।१७ परि., ४५, ४६ परि., ६१ गजेन्द्र—७।१६; ९।२६, ३२ | गणेश—४।१८ परि.; ९।३ परि. गन्धर्व—११।२२ गरुड—१०।३०; १८।६६ वि. गोपियाँ—२।६५; ४।६; ६।४०; ७।१६, १७, २७; ९।३२; १०।९, ११ वि., परि.; ११।२४; १८।६६ वि. गोवर्धन—१।१४; ४।६; ११।३३ च चन्द्रमा—७।८; १०।२१; १५।१२, १३ चित्ररथ—१०।२६ चैतन्य महाप्रभु—१८।७१ ज जटायु—९।३२ जनक—३।२०; ४।२, ६; १०।४-५ जयद्रथ—११।३४ त तारा—२।२७ तुकाराम—१८।६६ वि. तुलसीदास—१२।१३-१४ परि.; १८।६६ तुलाधार—९।३२ तृणावर्त—४।६ द दधीचि—६।३२; १०।२८; १६।२ दमयन्ती—२।२४ दशरथ—४।११ दुर्योधन—१।२, १०, १९; ३।३६ दुष्यन्त—३।३४ टि.; १२।१४ देवहूति—९।३२ देवी—४।१६ द्रोणाचार्य—१।३८; २।४; ११।२६ टि. द्रौपदी—४।६; ७।१६; ९।३ परि. २६, ३२; १२।५ वि.; १८।१२, ६६ वि. ध ध्रुव—७।१६; ११।५४ न नन्द-उपनन्द—१।१४ नर नारायण—२।२५ नल—३।३४ नामदेव—९।२४ टि., २५ टि. | नारद—३।११; ७।१९; १०।१२-१३, २६ निषादराज—७।२२; ९।३२; १८।७० प पंचजन—१।१५ पार्वती—५।१२; १२।८; १५।१२; १८।६६ वि. पूतना—४।६; १८।६६ वि. प्रह्लाद—१०।३०; ११।४९; १३।७ वि. फ फूलीबाई—९।३२ ब बद्रीनारायण—१।४६; १६।३ बलराम—६।३० बिल्वमंगल—६।४०; ७।२७ बृहस्पति—१०।२४, ४१ ब्रह्मा—३।१०-११, १४; ४।६; ६।३०; ७।३०; ८।१६, १७, १८, २०, २२, २४; ९।७, १७; १०।६, ३३ टि.; ११।१५; १३।१६; १४।३; १५।१ ब्रह्मा-विष्णु-महेश—११।१५; १३।१६ भ भरत मुनि—६।४०; १४।१५ भीष्मपितामह—१।१२; २।४; ३।३४; ८।२५ वि.; ९।३१; ११।२६ टि., ४७; १८।४६ भृगु—१०।१२-२३, २५ म मधुसूदनाचार्य—७।३० वि. मनु—५।१२; १०।६ मरुत—१०।२१; ११।६ मार्कण्डेय—१०।१२-१३ मीराबाई—७।१९; ९।३२; १८।६६ वि. य यमराज—८।१६; ९।५; १०।२९; ११।३९ यशोदा—११।१३, ४७; १८।६६ वि., ७७ याज्ञवल्क्य—२।२४ युधिष्ठिर—१८।१२, ४४ र रत्नदेव—९।२६ |
|---|
- पारिभाषिक शब्दावली *
१२९३
राधा (श्रीजी)—४।६;६।३१;९।३४
राम—३।२६,३४;४।६,९,११;
७।२२;२०।४-५,३१;
१८।४६ परि.,६६ वि.
रावण—१।१९;१६।१
रुक्मिणी—४।६
ल
लक्ष्मण—५।१८ वि.;१८।७०
लक्ष्मी—१८।६६ वि.
व
वरुण—१०।२९;११।३९
वसिष्ठ—१०।४१
वामन—१०।२१
वाराह—६।११
वाल्मीकि—९।३०
वासुकि—१०।२८
विदुर—९।३२
विदुरानी—४।११ परि.;९।२६
विभीषण—७।२२;११।५४;
१८।६६ वि.
विश्वामित्र—४।११
विश्वेदेव—११।२२
विष्णु—७।३०;१०।२१;११।१५,
१७,४६,५१-५२;१३।१६
वृन्दावन—११।४९ परि.
वेदव्यास—१।१ अव.;१०।१२-१३,
३७;११।९ परि.;१८।४४,७५
श
शंकर—१०।२३,२५;११।१५;१३।१६
शंकराचार्य—२।४८
शक्टासुर—४।६
शकुन्तला—१२।१४
शतरूपा—५।१२;१२।८
शबरी—९।२६,३२;१८।४७ वि.
शिशुपाल—७।२७
शुकदेव—४।२
शुक्राचार्य—१०।३७
शेषनाग—१०।२९
स
संजय—१।१,१०;९।३२;११।९,
४९;१८।७५-७७
संभाजी—६।२१
संवर्तक—१४।२
सत्यकाम—१३।२५ परि.
सदन कसाई—९।३०
सनकादि—४।९;५।१९;७।१९;
१०।६,९,१२-१३
सप्तऋषि—१०।६
समाधि—९।३२
साध्य—११।२२
सीता—२।५;४।६;१६।१;
१८।६६ वि.
सुग्रीव—७।२२
सुनयना—१०।४-५
सुमेरु—१०।२३
सूरदास—१८।६६ वि.
सूर्य—४।१;७।८;९।१९;१०।२१;
१३।२९,३३;१५।६,१२
स्कन्द (कार्तिकेय)—१०।२४
ह
हनुमान्—१।२०;२।५;१८।६६ वि.
हरिश्चन्द्र—३।३४,३५
हिमालय—१०।२५
पारिभाषिक शब्दावली
(साधक-संजीवनीके अनुसार)
अक्षौहिणी सेना—एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ,
२१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०९,३५०
पैदल सैनिक होते हैं। (१।३ टि.)
अन्न—प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है,
वह 'अन्न' कहलाता है। (३।१४)
अभिमान—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल,
सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर अपनेमें बड़प्पनका
अनुभव होना। (१६।४)
अमर्ष—किसीके उत्कर्ष (उन्नति)-को सहन न करना।
(१२।१५)
अर्पण—आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना
'अर्पण' कहलाता है। (९।२७ परि.)
असुर—जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही
जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोग—
'असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुराः।' (१६।५)
अहंकृति—शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको
लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होना
'अहंकृति' है। (१८।१७)
अहंस्फूर्ति—गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको
अपने होनेपन (सत्तामात्र)-का भान होता है,
इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। (१८।१७)
अहिंसा—(१) मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको
किंचिन्मात्र भी दुःख न देना। (१३।७)
(२) शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा
किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको
तथा अनिष्ट न चाहना। (१६।२)
आततायी—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें
शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला,
जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण
करनेवाला—ये छः आततायी कहलाते हैं। (१।३६)
आधि और व्याधि—मनकी चिन्ता 'आधि' (मानसिक
रोग) है और शरीरका रोग 'व्याधि' (शारीरिक
रोग) है। आधि भी दो तरहकी होती है—
१. पागलपन और २. चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग
आदि। (७।१६ टि.;१८।१२)
आर्जव—शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और
१२१४
- साधक-संजीवनी-कोश *
मनमें छल, कपट, छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधा-सादापन हो, उसका नाम 'आर्जव' है। (१८।४२)
आसक्ति —अपने स्वरूपसे विजातीय (जड़) पदार्थोंके प्रति आकर्षण। (३।१९)
ईश्वर —'ईश्वर' शब्द सगुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—शासन करनेवाला। (१५।१७)
उदासीन —उत्+आसीन अर्थात् ऊपर बैठा हुआ, तटस्थ, पक्षपातसे रहित। (१२।१६)
उद्देग —मनका एकरूप न रहकर हलचलयुक्त हो जाना। (१२।१५)
ऋषि —'ऋषु' धातुका अर्थ है—ज्ञान। उस ज्ञान (विवेक) को महत्त्व देनेवाले 'ऋषि' कहलाते हैं। (५।२५)
करण —पाणि, पाद, वाक्, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मन्द्रियाँ और श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, रसना और प्राण—ये पाँच ज्ञानन्द्रियाँ—ये दस 'बहिःकरण' हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार—ये तीन 'अन्तःकरण' हैं। (१८।१४)
कर्तव्य —(१) कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसको कर सकते हैं और जिसको अवश्य करना चाहिये। (३।१९)
(२) केवल दूसरोंके हितके लिये किया जाने-वाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है, वह कर्तव्य नहीं होता, प्रत्युत कर्ममात्र होता है। (४।३१)
काम —(१) वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख चाहनेका नाम 'काम' है। (३।३७ परि.)
(२) नाशवान् संसारमें थोड़ी भी महत्त्वबुद्धिका होना 'काम' है। (३।३९)
कामना —अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाह 'कामना' है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं, उनको 'वासना' कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होना 'स्मृह' है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखना 'आसक्ति' है। वस्तुमिलनेकी सम्भावना रखना 'आशा' है और अधिक वस्तु मिल जाय—यह 'लोभ' या 'तृष्णा' है। वस्तुकी इच्छा अधिक बढ़नेपर 'याचना' होती है। ये सभी 'काम' के ही रूप हैं। (३।३९)
कारक पुरुष —जो महापुरुष भगवान्को प्राप्त हो चुके हैं और भगवद्भ्राममें विराजते हैं, वे 'कारक पुरुष' कहलाते हैं। (४।८ टि.)
कूटस्थ —जो कूट (अहरन) की तरह स्थित रहता है—'कूटवत् तिष्ठतीति कूटस्थः।' (६।८)
क्षण —कमलके पत्तेपर सूर्य मारी जाय तो सूर्यके दूसरी तरफ निकलनेमें तीन क्षण लगते हैं—पहले क्षणमें
स्पर्श, दूसरे क्षणमें छेदन और तीसरे क्षणमें पार निकलना (१५।१ टि.)
क्षमा —बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराध सह लेना और उसको माफ कर देना। (१६।३)
गति —इसके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। (७।१८ परि.)
चेतन और जड़ —जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह 'चेतन' है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह 'जड़' है। (७।२० टि.)
जगत् —जो परिवर्तनशील है, उसको जगत् कहते हैं—'गच्छतीति जगत्।' (७।६)
जाति —'जाति' शब्द 'जनि प्रादुर्भावै' धातुसे बनता है, जो जन्मसे जातिको सिद्ध करता है। कर्मसे तो 'कृति' शब्द होता है, जो 'डुकृञ् करणे' धातुसे बनता है। हाँ, जातिकी पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेसे ही होती है। (४।१४ परि.)
तप —भूख-प्यास, सरदी-गरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूख-प्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवन-निर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना 'तप' है। (१६।१२)
दम —(१) इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाना। (४।३३) (२) जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें, तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें, तब वहाँसे हटा लें—इस प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना 'दम' है। (१८।४२)
दम्भ —मान, बड़ाई, पूजा, ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये, अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम 'दम्भ' है। (१६।४)
दया —(१) दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावना। (१६।२)
(२) भक्तलोग भगवान्की दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना 'कृपा' है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना 'दया' है। (१६।२)
दर्प (घमण्ड) —धन-वैभव, जमीन-जायदाद, मकान-परिवार आदि ममतावाली चीजोंको लेकर अपनेमें बड़प्पनका अनुभव होना। (१६।४)
दान —लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन
- पारिभाषिक शब्दावली *
१२१५
वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वित्तीण कर देना। (१६।१)
दन्द्र — एक ही विषयमें, एक ही वस्तुमें दो भाव कर लेना। (२।४५ टि.)
धर्म — (१) 'धर्म' नाम दो बातोंका है—(क) दान करना, प्याऊ लगाना, अन्नक्षेत्र खोलना आदि परोपकारके कार्य करना और (ख) वर्ण-आश्रमके अनुसार शास्त्रविहित अपने कर्तव्य-कर्मका तत्परतासे पालन करना। (२।४०)
(२) धर्म कहो चाहे कर्तव्य कहो, एक ही बात है। (२।३९ परि.)
धृति (धैर्य)—(१) किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१६।३)
(२) बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण-शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।२९)
(३) अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति, विचार आदिको दृढ़, अटल रखनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।३३)
नैष्कर्म्य —जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते, उस स्थितिको 'नैष्कर्म्यता' कहते हैं। (३।४)
पण्डित —सत्-असत्-विवेकवती बुद्धिका नाम 'पण्डा' है। वह 'पण्डा' जिनकी विकसित हो गयी है, वे 'पण्डित' हैं। (२।११)
परमात्मा —'परमात्मा' शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। (१५।१७)
परलोक —मरनेके बाद जो जन्म होता है, वह चाहे मृत्युलोकमें हो, चाहे किसी अन्य लोकमें हो, चाहे मनुष्य, पशु-पक्षी आदि किसी योनिविशेषमें हो, वह सब 'परलोक' ही है। (१६।८ टि.)
परिग्रह —ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना। (४।५)
पिशुनता (चुगली)—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना। (१६।२)
प्रकृति —जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको 'प्रकृति' कहते हैं—प्रकृषेण करणं (भावेल्युट्ट) इति प्रकृतिः।' (१८।११)
प्रमाद —(१) करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करना। (१४।७)
(२) बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल-तमाशे आदि कार्यमें लगना। (१४।१३)
भय —इष्टके वियोग और अनिष्टके संयोगकी आशंकासे होनेवाले विकारको 'भय' कहते हैं। (१२।१५)
भूत-प्रेत —जो भूतयोनिमें चले गये हैं, उन्हें 'भूत' कहते हैं और जो मर गये हैं, उन्हें 'प्रेत' कहते हैं। (१७।४)
भोग —शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय, शरीरका आराम, मान और नामकी बड़ाई—इन (आठों) के द्वारा सुख लेनेका नाम 'भोग' है। (२।४४)
मद —हमारे पास इतनी विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि है—इस बातको लेकर नशा-सा आ जाना 'मद' है। (१६।१०)
महात्मा —महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा। (७।१९ परि.)
महारथी —जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण है और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, वह वीर पुरुष 'महारथी' कहलाता है। (१।६)
मान-बड़ाई —शरीरका आदर-सत्कार होनेसे जो सुख होता है, वह 'मान' का सुख है। नामकी प्रशंसा, वाह-वाह होनेसे जो सुख होता है, वह 'बड़ाई' का सुख है। (१८।१२)
मार्दव —बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना। (१६।२)
मोह —शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीर-सम्बन्धी माता-पिता, भाई-भौजाई, स्त्री-पुत्र, वस्तु, पदार्थ आदिमें ममता करना 'मोह' है। (२।५२)
यक्ष-राक्षस —'यक्ष' में धन-संग्रहकी मुख्यता और 'राक्षस' में दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। (१७।४)
यज्ञ —(१) गीताके अनुसार कर्तव्यमात्रका नाम 'यज्ञ' है। (३।९)
(२) निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम 'यज्ञ' है। (३।१४)
यज्ञशेष —यज्ञकी सिद्धिके बाद स्वतः अवशिष्ट रहनेवाला 'योग' अपने लिये होता है। यह योग (समता) ही यज्ञशेष है। (३।१३)
यज्ञार्थ कर्म —दूसरोंको सुख पहुँचाने तथा उनका हित करनेके लिये जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। (३।९)