श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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हिन्दी पद्यानुक्रमणिका
| अ अंतहूँ तोहि तजैगे ..... ५१ १२ अरिखल बिस्व यह ..... १२१ १४ अग्या सम न सुसाहिब ..... १८१ ४४ अनारंभ अनिकेत ..... १२१ १६ अरथ न धरम ..... १८१ ६६ अरिहुक अनभल ..... ४१ ८ अवसि देखिअहिं ..... १३१ १७ अस बिचारि हरि भगत ..... १०१ ११ आ आजु जो हरिहिं न सस्त्र ..... ९१ ३१; १११ २६ आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा ..... ८१ १५ आनन रहित सकल रस ..... १३१ १४ इ इमि कुपंथ पग ..... ११ १९ इष्टदेव मम बालक ..... १८१ ६६ ई ईस्वर अंस जीव ..... १४१ ५; १६१ २२ उ उत्तम के अस बस ..... ९१ २२ उदय केत सम ..... ३१ १६ उपजा ग्यान चरन ..... २१ २७ उमा राम सम हित ..... १०१ १ उमा राम सुभाउ ..... ४१ ९, १४; ७१ २१ उमा संत कइ इहइ ..... १२१ ४, १५ उर प्रेरक रघुबंस ..... १८१ ६६ ऊ ऊधौ! मन माने की बात ..... १८१ ६६ ए एहि तन कर फल ..... ३१ १०, ३४; ७१ १९ एक बानि करुनानिधान ..... १११ ५४; १२१ १४; १८१ ५६ एक भरोसो एक बल ..... १११ ५४; १८१ ६६ क कपट गाँठ मन में ..... १६१ १ कबहुँक करि करना ..... ७१ २६; १६१ ६ करहिं जोहारु भेंट ..... ४१ ६ | कह रघुपति सुनु ..... ९१ ३३ कह हनुमंत विपति ..... ७१ १६ काँच कटोरो कुम्भ ..... ११ २ काजु हमार तासु हित ..... ४१ ११ काम अछत सुख ..... ३१ ३७, ३९ कामिहि नारि पिआरि ..... १५१ ९ काहू के बल भजन ..... १८१ ६६ कुछ श्रद्धा कुछ दुष्टता ..... ४१ ४० कोई हरिजन ऊबरे ..... १८१ ६६ कोटि विप्र बध ..... ७१ २६; ९१ ३० कोयला होय नहीं ..... १८१ ६४ ख खोज पकड़ सँठे रहो ..... १८१ ६६ ग गई मारन पूतना ..... १८१ ६६ गूढ़उ तत्त्व न साधु ..... ४१ ५; १०१ १ गोधन गजधन बाजिधन ..... १२१ १४ घ घर गुरु गृह प्रियसदन ..... ९१ २६ च चलती चक्की देखकर ..... १८१ ६६ चहुँ दिसि आरति ..... १३१ १३ चाख चाख सब छाड़िया ..... १५१ ९ चाह गयी चिन्ता मिटी ..... ३१ ३९ चित्र लिखे जनु ..... ४१ ६ चिदानंद मय देह ..... ४१ ९; १११ ५२ चिन्ता दीनदयाल को ..... १८१ ६६ चेतन अमल सहज ..... ४१ १०; ९१ ३१; १३१ ८ छ छिति जल पावक ..... २१ २७ ज जगत प्रकास्य प्रकासक ..... १५१ ६ जथा अनेक बेध धरि ..... १११ ४९ जन अवगुन प्रभु मान ..... १८१ ५६ जन्म कोटि लागि ..... ३१ ८ जब द्रवै दीनदयालु ..... ६१ ४२ जब लागि गज बल ..... १५१ ४ |
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