श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी-कोश *
यत्— भीतरकी लगन, जिसे पूर्ण किये बिना चैनसे न रहा जाय, 'यत्' कहलाती है। (१५।११)
योग—(१)—१. 'युजिर् योगे'—समरूप परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध, २. 'युज समाधी'—चित्तकी स्थिरता अर्थात् समाधिमें स्थिति, और ३. 'युज संयमन'—संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव। (प्रा.) (२) जीवका भगवान्के साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, उसका नाम 'योग' है। (१८।७५)
योगक्षेम—(१) अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम 'योग' है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम 'क्षेम' है। (२।४५ टि.; १।२२)
(२) 'योग' नाम भगवान्के साथ सम्बन्धका है और 'क्षेम' नाम जीवके कल्याणका है। (१।२२)
राग— संसारके पदार्थोंका मनपर जो रंग चढ़ जाता है, उसको राग कहते हैं। (२।५६)
लज्जा— शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम करनेमें संकोच होना। (१६।२)
लोक—(१) इसके तीन अर्थ होते हैं—१. मनुष्यलोक आदि लोक, २. उन लोकोंको रहनेवाले प्राणी, और ३. शास्त्र (वेदोंके अतिरिक्त सब शास्त्र)। (३।२०) (२) जिनके साथ जीवकी तात्त्विक एकता अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम 'लोक' है। (१५।७)
वर्णसंकर— पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो सन्तान पैदा होती है, वह 'वर्णसंकर' कहलाती है। [परस्परविरुद्ध धर्मोंका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको 'संकर' कहते हैं।] (१।४१)
व्यभिचार— जीव परमात्माका अंश है, इसलिये परमात्माके सिवाय कहीं भी जाना 'व्यभिचार' है और केवल परमात्माकी तरफ चलना 'अव्यभिचार' है। (१८।३३ परि.)
शम—(१) मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे हटाना। (४।३३) (२) मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय—इस प्रकार मनके निग्रहको 'शम' कहते हैं। (१८।४२)
श्रद्धा—(१) ईश्वर, शास्त्र आदिपर पूज्यभावपूर्वक प्रत्यक्षसे भी अधिक विश्वास करना। (४।३३)
(२) जिसे हम अपने अनुभवसे नहीं जानते, पर पूर्वके स्वाभाविक संस्कारोंसे, शास्त्रोंसे, सन्त-महात्माओंसे सुनकर पूज्यभावसहित विश्वास कर लेते हैं, उसका नाम 'श्रद्धा' है। (१७।३ मा.)
सत्य— अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे जैसा सुना, देखा, पढ़ा, समझा और निश्चय किया है, उससे न अधिक और न कम— वैसा-का-वैसा प्रिय शब्दोंमें कह देना। (१६।२)
संकल्प— सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर मनमें जो तरह-तरहकी स्फुरणाएँ होती हैं, उन स्फुरणाओंमेंसे जिस स्फुरणामें प्रियता, सुन्दरता और आवश्यकता दीखती है, वह स्फुरणा 'संकल्प' का रूप धारण कर लेती है। (१६।२४)
संन्यास— अच्छी तरहसे रखनेका नाम 'संन्यास' है— 'सम्यक् न्यासः संन्यासः।' तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम 'संन्यास' है। (१८।१)
सुहृद् और मित्र— जो माताकी तरह ही, पर ममतरहित होकर बिना किसी कारणके सबका हित चाहनेके और हित करनेके स्वभाववाला होता है, उसको 'सुहृद्' कहते हैं और जो उपकारके बदले उपकार करनेवाला होता है, उसको 'मित्र' कहते हैं। (६।९)
स्पृहा—(१) शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका नाम 'स्पृहा' है। (२।७१)
(२) जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम 'स्पृहा' है। (१८।४९)
स्वाध्याय— अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठन-पाठनका नाम 'स्वाध्याय' है। वास्तवमें तो 'स्वस्य अध्यायः (अध्वयनम्) स्वाध्यायः' के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही 'स्वाध्याय' है। (१६।१)
स्वाभिमान— दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता देखनेसे 'अभिमान' होता है और अपने कर्तव्यको देखनेसे 'स्वाभिमान' होता है कि मैं साधन-विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ। अभिमान होनेपर तो मनुष्य साधन-विरुद्ध काम कर बैठेगा, पर स्वाभिमान होनेपर उसको साधन-विरुद्ध काम करनेमें लज्जा होगी। (१७।३ परि.)
संकेत-सूची:— अव.—अवतरणिका, अ.सा.—अध्यायका सार, टि.—टिप्पणी, दे.—देखें, न.नि.—साधक-संजीवनी परिशिष्टका नम्र निवेदन, परि.—परिशिष्ट, पु.—पुष्पिका, प्रा.—प्राकथन, मा.—मार्मिक बात, वि.—विशेष बात, सं.—सम्बन्ध।
॥ श्रीहरिः ॥
श्रद्धेय स्वामी
रामसुखदासजी महाराजके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ एवं शीघ्र
कल्याणकारी पुस्तकें
- १-गीता-साधक-संजीवनी (हिन्दी-टीका) बृहदाकार, ग्रन्थाकार, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी एवं बंगला अनुवाद भी
- २-साधक-संजीवनी (परिशिष्ट)
- ३-गीता-दर्पण—(हिन्दी, मराठी, बंगला, गुजराती)
- ४-साधन-सुधा-सिन्धु
- ५-गीता-ज्ञान-प्रवेशिका
- ६-गीता-माधुर्य—(संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, कन्नड, मराठी, गुजराती, असमिया, उर्दू, नेपाली, बंगला, उड़िया)
- ७-कल्याण-पथ
- ८-जित देखुं तित तू
- ९-भगवत्प्राप्ति सहज है
- १०-सुन्दर समाजका निर्माण
- ११-मानसमें नाम-वन्दना
- १२-जीवनका कर्तव्य
- १३-कल्याणकारी प्रवचन— (हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, बंगला)
- १४-नित्ययोगकी प्राप्ति
- १५-भगवत्प्राप्तिकी सुगमता— (हिन्दी, अंग्रेजी, कन्नड)
- १६-भगवान्से अपनापन
- १७-वास्तविक सुख
- १८-साधन और साध्य
- १९-तात्त्विक प्रवचन— (हिन्दी, गुजराती)
- २०-तत्त्वज्ञान कैसे हो?
- २१-किसान और गाय
- २२-जीवनोपयोगी प्रवचन
- २३-जीवनका सत्य— (हिन्दी, अंग्रेजी)
- २४-अमृत बिन्दु
- २५-भगवन्नाम
- २६-साधकोंके प्रति
- २७-सत्संगकी विलक्षणता
- २८-मातृशक्तिका घोर अपमान (तमिल, बंगला)
श्रीमद्भगवद्गीता
सा ध क
सं जी व नी
Code 6
श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हरेक दर्शनकेअलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।
परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो—इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोंके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।
परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
—प्रकाशक
गीताप्रेस, गोरखपुर — २७३००५
फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३०