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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1264

श्लोक ७८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२६३

दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।

गीताभरमें 'पार्थ' सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्‌को 'पार्थ' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी 'कृष्ण' सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें 'कृष्ण' सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्‌के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई है। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए संजयने भी 'कृष्ण' और 'पार्थ' ये दोनों नाम लिये हैं।

'तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम'—लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति—ये सब 'श्री' शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान्‌ कृष्ण हैं, वहाँ श्री रहेगी ही।

'विजय' नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षत्र-ऐश्वर्य रहेगे ही।

ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण होंगे, वहाँ

'विभूति'—ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामर्थ्य आदि सबके-सब भगवदगुण रहेंगे ही; और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे, वहाँ 'धृवा नीति'—अटल नीति, न्याय, धर्म आदि रहेंगे ही।

वास्तवमें श्री, विजय, विभूति और धृवा नीति—ये सब गुण भगवान्‌में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन—ये दोनों जहाँ रहेंगे, वहाँ अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त माधुर्य, अनन्त सौशील्य, अनन्त सौजन्य, अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।

धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है, उसका उत्तर संजय यहाँ सम्यक्‌ रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अंगीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः॥ नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे*। संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्त्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'मोक्षसन्त्यासयोग' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

जिसमें मोक्षका भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्तिका वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायका नाम 'मोक्षसन्त्यासयोग' रखा गया है।

अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (१) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके आठ, श्लोकोंके नौ सौ नवासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग एक हजार तेरह है।

(२) इस अध्यायमें 'अथाष्टादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके पचीस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ छियाने और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ छिहत्तर है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें चार उवाच हैं—दो 'अर्जुन उवाच', एक 'श्रीभगवानुवाच' और एक 'संजय उवाच'।

अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके अठहत्तर श्लोकोंमेंसे बारहवें, छियालीसवें और बावनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तेईसवें, बत्तीसवें, सैंतीसवें, इकतालीसवें, पैतालीसवें, छप्पनवें और सत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; तैंतीसवें, छत्तीसवें, सैंतालीसवें और पचहत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; तेरहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'रण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; अड़तीसवें और चौंसठवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; उनचासवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; और तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनसठ श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

  • विक्रमसंवत्सरे २०४२ (दो हजार बयालीस)।