श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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कर्ता सात्त्विक-राजस-तामस होता है, कर्म नहीं—१४।१६
कर्ता और भोक्ता (कर्तृत्व और भोक्तृत्व)—२।२०; ३।१९, २७ परि., २८ मा., ४२-४३; ४।१३, १७ परि., १८ परि., २० परि., २३ वि., ३७; ५।२, ८-९, १३, १४, २०, २९; ६।१; ७।५ परि., १९, २७; ९।२४; १०।८ परि.; १३।२०, २१, २३, ३१, ३२, ३३-३४; १४।२२, २३ परि.; १५।१०; १६।५ मा.; १८।१३, १५, १६, १७
कर्ता और भोक्ता कौन है?—५।८-९; १३।३१ परि.; १८।१६ परि.
कर्म —संचित, प्रारब्ध व क्रियमाण कर्म—३।१३ टि., ३७ परि.; ४।१९, ३७; ५।१२; १८।१२ वि. तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका उपाय—१८।१२ वि. शुभ (वहित) और अशुभ (निषिद्ध) कर्म—३।३८ वि.; ८।४; ९।२८; ११।२९ परि.; १२।१२ वि., १७; १८।१०, १२ वि., ४७ लौकिक और पारमार्थिक कर्म—१७।२७ सात्त्विक कर्म और अकर्म—१८।२३ भगवत्सम्बन्धी कर्म—८।७ वि.; १२।६; १८।४४ जनार्मभक कर्म और भोगदायक कर्म—१८।४१ वि. वहित तथा नियत कर्म—३।८; १८।७, २३, ४७ विहितकी अपेक्षा निषेधकी मुख्यता—१२।१२ वि. बिना इच्छाके कर्म क्यों करें?—५।१२ कर्मके पाँच प्रकार (नित्य, नैमित्तिक, काम्य, प्रायश्चित और आवश्यक)—१८।२-३ टि. कर्म, क्रिया (चेष्टा) और लीला—३।२९ टि., ३३; ४।९ परि., १३-१४ परि., २३ परि.; ५।८-९; १८।१२, १५, १८
क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—१८।१६ टि. क्रिया, कर्म और कर्मयोग—१४।७ टि.; ४।२३ परि. कर्म करते हुए कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटे?—३।१९ कर्मोंकी आसक्तिसे छूटनेका उपाय—६।४; १४।७, १२ अपने लिये कुछ न करना—३।९ मा., १०-११ मा., १२, १३, १७, १८ मा., २२, २६ वि., परि., २७; ४।२, ३, १६ वि., १८, ३० परि., ३३, ४१; ५।२, १०; ६।१, ८; ७।१९; १२।१२; १७।२५; १८।२१, १६ परि., ४६ परि.
क्रिया और भाव —३।२१, २८ मा.; ५।३; ७।१५ वि.; १४।१४; १६।२३; १७।१० वि., १६ टि., २८; १८।४५ परि., ४८ परि. जैसा भाव, वैसी क्रिया—२।५६; ४।१६; १६।१६ परि., १७।११ कर्मोंका फल-अंश और संस्कार-अंश—१६।२०
वि.; १८।१२ वि., ४७ वि. कर्म-सम्बन्धी विशेष बात—१८।१२ वि.; १८।४१ वि.
कर्मोंकी सिद्धिके पाँच हेतु—१८।१३-१४ स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य—१८।४४, ४७ कर्मोंमें आसक्ति और अभिरति—१८।४५ परि.
कर्मफल —२।४७; ३।३७ परि.; ४।१४, २०; ५।११, १४; ६।१; ८।१६ परि.; १२।११, १२; १७।११, १२, २५, २८; १८।२-३, ६, ११, १२ वि., २४ दृष्ट, अदृष्ट, प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल—५।१२; १७।२२ वि.; १८।६, १२ वि. शुभ और अशुभ कर्मफल—९।२८ परि. इष्ट, अनिष्ट और मिश्र कर्मफल—१८।१२ वि. कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात—१२।१२; १८।११ कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात—१७।२१ वि.
कर्मयोग —कर्मयोग कर्मजन्य कैसे नहीं है?—४।१२ कर्मयोगमें त्यागकी सुगमता—५।२; १२।१२ कर्मयोगी साधकोंके दो प्रकार—३।७ कर्मयोगीका शरीर-निर्वाह कैसे होगा?—३।१२ वि. कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिटता है?—३।१९ कर्म और कर्मयोगी—३।१९ वि.; ६।३ परि. भगवान्ने सूर्यको कर्मयोगका उपदेश क्यों दिया?—४।१
कर्मयोगका सिद्धान्त ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको भी अपनाना पड़ेगा—४।२ कर्मयोग ज्ञानयोगसे श्रेष्ठ है—५।२ कर्मयोग-सम्बन्धी विशेष बात—४।१६ वि., मा.; ३८ वि. कर्मविज्ञान और योगविज्ञान—२।३९ परि.; ४।३८
कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग —न. नि.; प्रा.; २।४१, ५४, ५९ परि., ७१; ३।अव., ३, ३० परि., ३५ मा.; ४।२, १६ वि., २३, ३९ परि.; ५।२ परि., ३, ५ परि., १०; ६।४, ५, ३० परि., ३७ परि., ४७; ७।३ परि., ४, ५, १९, ३० परि.; ८।१५ वि.; ९।१ परि., २ परि., ३०, अ. सा.; १०।११ परि., ४१ परि.; १२।२ परि., १३-१४ परि.; १३।२४ परि.; १४।२७ परि.; १५।२ टि., ५, ७ वि., १५, १६, २०; १६।२, ५; १७।३ मा.; १८।४६, ४९ परि., ५० परि., ५५ वि., ६६ परि., ६९ परि., ७३
कर्मयोग और ध्यानयोग—२।४३; ६।१८, २०, ३३; १२।१२ कर्मयोग और भक्तियोग—२।६१ परि.; ३।३४; ६।४; १२।३-४., ११; १८।१२ वि., ४६ वि., ६०, ६३ कर्मयोग और ज्ञानयोग—२।२०, ३१ परि., ३९, ७२; ३।३, ४, ७, ८, २८ वि.; ४।१५ परि., २१, २३,