श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६६ * साधक-संजीवनी-कोश *
आनन्द (दे. रस)-१३।८
आर्जव-१३।७; १६।१; १७।१४; १८।४२
आर्जव और मार्दव-१६।२ टि.
आश्रम (ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यास)-४।१, २१;
७।३०; ८।११ परि.; १७।१४; १८।५३ टि., ५८
आश्रय और आकर्षण-४।१०
आसक्ति, विरक्ति और अनुरक्ति-१२।१८ मा.
आसन-६।११-१३
आस्तिक-नास्तिक-४।४०; ५।१८ वि.; ९।४-५ परि.,
२९; १६।५ परि., ७ टि., ८, ९; १७।३ मा., २६;
१८।४२, ५५, ७३ टि.
इ
इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ)-२।२९; ३।६;
५।८-९; ८।२२; १२।१४; १३।५, १७, २०;
१५।९, १२
श्रवणेन्द्रियकी महिमा-१०।१९ टि.; १५।९
ई
ईर्ष्या-४।२२
उ
उदारता गुण भी है, स्वरूप भी-५।७ टि.
उदासीन-६।९; १२।१६; १४।२३
उद्देश्य-उद्देश्य और फलेच्छा-३।२० मा., ३०;४।१ वि.;
५।७
उद्देश्य और कामना-३।३० वि.; ४३ टि.
उद्देश्य और रुचि-५।७
दुःखका उद्देश्य नहीं होता-७।११ परि.
उपासना-८।२१; ९।१५, २३, २४, २६ परि., अ.सा.;
१२।१, २, ३-४; १५।५ वि.; १८।१६ परि.
निर्गुणोपासनाके दो प्रकार-१२।३-४
सगुणोपासना और निर्गुणोपासना-७।१९ मा., २४
वि., ३० वि.; ८।२१; १२।३-४, ५, ६
सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और निर्गुण-उपासनाकी
कठिनताएँ-१२।५ वि.
भगवान्की तथा देवताओंकी उपासना-७।२३;
९।२२ परि., २३, २५, २६ परि., अ.सा.
उपेक्षा, उदासीनता और उपरति-२।४५; ६।२५
ऋ
ऋण-न. नि.; ३। ११, १२ मा., १९, २०, २५;
४।१८; ६।४; १२।२०; १८।१२ वि., ५८
मनुष्य देवता, पितर, पशु-पक्षी आदिका ऋणी
है-३।१२ वि., २०
भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता-१८।५८
ऋषि-५।२५
सप्तर्षि-१०।६
ए
एकता-तात्त्विक और आत्मीय एकता-७।१८ परि.
जगत्, जीव और परमात्माकी एकता-
१२।३-४ परि.; १५।७ परि.
ज्ञान और प्रेमकी एकता-१२।२ परि.
एकान्त-२।३८ परि.; ३।४ मा., ४१; ४। १६ मा.,
२६;६।९, १०, १४, २५, २६;१२।३-४;१३।१०;
१६।१; १८।११, २४, ३०, ५१-५३, ५६
क
'करना' और 'होना'-६।२५ मा.;८।१४ परि.;१०।१०
परि.; १३।३० टि.; १४।२२ वि.; १८।१२ वि.
'करना', 'होना' और 'है'-१४।२३ परि.
'करना' और 'न करना'-(दे. प्रवृत्ति और निवृत्ति)
करनेका राग (वेग)-३।४ परि.; ४।२ टि., ९ मा.,
१८, ३० वि.; ५।२; ६।१,
३, ४;७।१९; १२।१९; १४।९; १८।६, ४५, ५९
करनेका राग, पानेकी लालसा, जीनेकी इच्छा और
मरनेका भय-३।१८; ४।३; ५।५ वि.;
१८।५५ वि.
करनेका राग और पानेकी कामना-४।३० वि.
जीनेकी इच्छा और मरनेका भय-३।१२ वि.; १०।९
करण (अन्तःकरण और बहिःकरण)-प्रा.; ३।४२ मा.;
९। ३०; १२। ८; १३। २, २०, ३१ परि.;
१५।१२; १६।१; १८।१४, ७३
करणनिरपेक्ष और करणासापेक्ष-न. नि.; प्रा.; २।२९;
४। ३३ परि., ३५, ३८; ५।२०; ६।१० परि.,
२० परि., ३७ परि.; ७।३० परि.; १०।१५, १९ टि.;
१२।३-४, १२ परि.; १३।१२, २४; १५।११
मा., १५
कर्तव्य-कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात-३।१२, २३-२४
वि., २५-२६ वि.
कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता-३।४ वि., ८,
३०; ४।१५
कर्तव्य और अधिकार-न. नि.; ३।१०-११ मा.
कर्तव्य-कर्ममें शिथिलता आनेका कारण-३।९
कर्तव्य-कर्म छोड़कर भगवद्भजनमें लगनेका
फल-१८।८
भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करे-
१८।९ टि.
कर्ता-कर्ता और करण-प्रा.; ९।३०; १०।९; १८।१४, १८
कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं-५।३
जैसा कर्ता, वैसी क्रिया-९।३१ मा.; १४।१६;
१७।११; १८।२८ वि., ४८ परि.