श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- विषयानुक्रमणिका *
१२७३
१३। १२ परि.; १४। २६ परि., २७ परि.;
१५। ७ परि.
ब्रह्मचर्य - ६। १४; ७। ११; ८। ११; १७। ४, १४
ब्रह्मभूत अवस्था - ६। ४७ वि.
ब्रह्मलोक - ८। १६; १४। १४ परि.; १५। २, ५
ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके दर्शनसे मुक्ति क्यों नहीं
होती ? - ८। १६
ब्रह्मलोकमें जानेवाले दो प्रकारके पुरुष - ८। १६
वि., परि.
बाह्य और आभ्यन्तर - ५। २४, २७
भ
भक्त - कामनाको लेकर भक्तकी तीन श्रेणियाँ - ७। १६ वि.
भक्त-सम्बन्धी विशेष बात - ७। १६ वि.;
१२। १३-१४ परि.
भक्त वर्ण-आश्रम तथा शास्त्रीय विधि-निषेधसे ऊँचा
उठ जाता है - १८। ५८
भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता - १८। ५८
भगवान् भी भक्तके ऋणी हो जाते हैं - १०। ११ वि.
भक्तका शरीर चिन्मय होना - ७। १९; १८। ६६ वि.
भक्तका पतन नहीं होता - ९। ३१
भक्त स्वयं होता है, शरीर नहीं - ९। ३२ मा.
भगवान् भक्तकी पूर्व इच्छा पूरी करते हैं - ११। ५४
भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करें - १८। ९ टि.
भक्ति - साधन-भक्ति और साध्य-भक्ति - १२। २ परि.;
१३। १०; १८। ५० परि.
भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति या ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति ? -
१३। १०; १८। ५० परि.
भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य) -
१८। ५७
भगवान्में भक्ति कैसे दृढ़ हो ? - १०। १७, १६, १८
भगवतपरायणता - २। ६१; ५। १७; ६। १४ परि.; ८। १४;
९। ३४; ११। ५५ परि.; १२। ६, २०;
१८। ५६, ५७
भगवत्प्राप्ति - भगवत्प्राप्तिकी सुगमता - ७। ३ टि.; ८। १४,
२५; ९। २, ३ वि., ६, ३२; १०। ३; १२। ९, १२;
१३। २८ मा.; १५। ११ मा.; १८। ६१ वि.
भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात - ३। २० मा.;
४। ३९ वि.; ५। १२ मा.; ११। ५४ वि.;
१२। ८ वि., १२ वि.; १५। १५ वि., २०, अ.सा.
भगवत्प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती - प्रा.; ३। २०;
४। २, ९ मा., १२; ५। ७, १२ मा., १३;
७। ३ टि.; ११। ४८, ५३; १२। १२ वि.;
१५। ४, ११, १५
भगवान्का हृदयमें अनुभव करनेका उपाय -
१३। १७
भगवत्प्राप्तिमें जाति या वर्णकी मुख्यता नहीं -
९। ३२, ३३; १८। ४४
भगवत्प्राप्तिका तात्पर्य - १२। १२ वि.
पन्द्रहवें अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके छ: उपायोंका
वर्णन - १५। २०
भगवत्प्राप्ति होनेपर कोई विकार नहीं रहता - १२। १६
भगवान् - 'भगवान्' शब्दका अर्थ - २। २
भगवान् और उनकी बनायी सृष्टिमें पक्षपात नहीं -
४। ८; ५। १८ वि.; ९। २९; १५। १७ मा.
भगवान्का दुष्टों (अज्ञान, माया आदि) से विरोध
नहीं है - ४। ८
भगवान् न्यायकारी और दयालु दोनों हैं - ८। ६
वि.; ९। ३१
भगवान् और देवता - ४। ९ परि., १२, १३;
७। २२-२३, २४ परि.; १०। २; ११। १३, ५२ परि.
भगवान् और जीव - २। १७ टि., परि.; ७। १९ परि.;
१२। ३-४ वि., परि.; १५। ११, १८
भगवान् और जगत् - ९। ४-५
भगवान्, जीव और जगत् - २। ५३; ४। ३५; ७। २८,
३०, अ. सा.; ८। ४; १२। ३-४ परि.;
१३। २; १५। १, १०, १६, २०, अ.सा.
भगवान् सबका पालन-पोषण करते हैं - १३। १४;
१५। १७ मा.
भगवान् सब मनुष्योंको खींच रहे हैं - १५। ७;
१७। १
भगवान्में सभी प्राणी आकृष्ट क्यों नहीं होते ? -
१२। १६
भगवान्की आवश्यकता क्यों है ? - ७। ३ परि.
भगवान्का सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार तथा
सगुण-साकाररूप - ७। ३० वि.; ११। १८ परि.
भगवान्के विध्यात्मक और निषेधात्मक विशेषण -
१२। ३-४ वि.
भगवान् सबके भोक्ता और मालिक कैसे ? -
९। २४ वि.
भगवान्का अवतार - ३। २३, ३३; ४। ३, ६-११;
७। १९ मा., २४, २५; ८। १५; ९। ११;
१०। २; ११। १८, ३६, ४५, ४९ परि.; १३। १४;
१४। २७ टि.; १५। २०; १८। ५५
भगवान्का जगत्-रूपसे प्रथम अवतार - ४। ९ परि.;
७। १९; ११। ४९ परि.; १८। ४६ परि.
अवतार-सम्बन्धी विशेष बात - ४। ६
अभी भगवान् अवतार क्यों नहीं ले रहे ? - ४। ७
भगवान् दुष्टोंका विनाश क्यों करते हैं - ४। ८