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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 1274
  • विषयानुक्रमणिका *

१२७३

१३। १२ परि.; १४। २६ परि., २७ परि.;

१५। ७ परि.

ब्रह्मचर्य - ६। १४; ७। ११; ८। ११; १७। ४, १४

ब्रह्मभूत अवस्था - ६। ४७ वि.

ब्रह्मलोक - ८। १६; १४। १४ परि.; १५। २, ५

ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके दर्शनसे मुक्ति क्यों नहीं

होती ? - ८। १६

ब्रह्मलोकमें जानेवाले दो प्रकारके पुरुष - ८। १६

वि., परि.

बाह्य और आभ्यन्तर - ५। २४, २७

भक्त - कामनाको लेकर भक्तकी तीन श्रेणियाँ - ७। १६ वि.

भक्त-सम्बन्धी विशेष बात - ७। १६ वि.;

१२। १३-१४ परि.

भक्त वर्ण-आश्रम तथा शास्त्रीय विधि-निषेधसे ऊँचा

उठ जाता है - १८। ५८

भक्त किसीका भी ऋणी नहीं रहता - १८। ५८

भगवान् भी भक्तके ऋणी हो जाते हैं - १०। ११ वि.

भक्तका शरीर चिन्मय होना - ७। १९; १८। ६६ वि.

भक्तका पतन नहीं होता - ९। ३१

भक्त स्वयं होता है, शरीर नहीं - ९। ३२ मा.

भगवान् भक्तकी पूर्व इच्छा पूरी करते हैं - ११। ५४

भक्त कर्तव्य समझकर जप आदि न करें - १८। ९ टि.

भक्ति - साधन-भक्ति और साध्य-भक्ति - १२। २ परि.;

१३। १०; १८। ५० परि.

भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति या ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति ? -

१३। १०; १८। ५० परि.

भक्तिके चार रस (दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य) -

१८। ५७

भगवान्में भक्ति कैसे दृढ़ हो ? - १०। १७, १६, १८

भगवतपरायणता - २। ६१; ५। १७; ६। १४ परि.; ८। १४;

९। ३४; ११। ५५ परि.; १२। ६, २०;

१८। ५६, ५७

भगवत्प्राप्ति - भगवत्प्राप्तिकी सुगमता - ७। ३ टि.; ८। १४,

२५; ९। २, ३ वि., ६, ३२; १०। ३; १२। ९, १२;

१३। २८ मा.; १५। ११ मा.; १८। ६१ वि.

भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात - ३। २० मा.;

४। ३९ वि.; ५। १२ मा.; ११। ५४ वि.;

१२। ८ वि., १२ वि.; १५। १५ वि., २०, अ.सा.

भगवत्प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती - प्रा.; ३। २०;

४। २, ९ मा., १२; ५। ७, १२ मा., १३;

७। ३ टि.; ११। ४८, ५३; १२। १२ वि.;

१५। ४, ११, १५

भगवान्का हृदयमें अनुभव करनेका उपाय -

१३। १७

भगवत्प्राप्तिमें जाति या वर्णकी मुख्यता नहीं -

९। ३२, ३३; १८। ४४

भगवत्प्राप्तिका तात्पर्य - १२। १२ वि.

पन्द्रहवें अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके छ: उपायोंका

वर्णन - १५। २०

भगवत्प्राप्ति होनेपर कोई विकार नहीं रहता - १२। १६

भगवान् - 'भगवान्' शब्दका अर्थ - २। २

भगवान् और उनकी बनायी सृष्टिमें पक्षपात नहीं -

४। ८; ५। १८ वि.; ९। २९; १५। १७ मा.

भगवान्का दुष्टों (अज्ञान, माया आदि) से विरोध

नहीं है - ४। ८

भगवान् न्यायकारी और दयालु दोनों हैं - ८। ६

वि.; ९। ३१

भगवान् और देवता - ४। ९ परि., १२, १३;

७। २२-२३, २४ परि.; १०। २; ११। १३, ५२ परि.

भगवान् और जीव - २। १७ टि., परि.; ७। १९ परि.;

१२। ३-४ वि., परि.; १५। ११, १८

भगवान् और जगत् - ९। ४-५

भगवान्, जीव और जगत् - २। ५३; ४। ३५; ७। २८,

३०, अ. सा.; ८। ४; १२। ३-४ परि.;

१३। २; १५। १, १०, १६, २०, अ.सा.

भगवान् सबका पालन-पोषण करते हैं - १३। १४;

१५। १७ मा.

भगवान् सब मनुष्योंको खींच रहे हैं - १५। ७;

१७। १

भगवान्में सभी प्राणी आकृष्ट क्यों नहीं होते ? -

१२। १६

भगवान्की आवश्यकता क्यों है ? - ७। ३ परि.

भगवान्का सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार तथा

सगुण-साकाररूप - ७। ३० वि.; ११। १८ परि.

भगवान्के विध्यात्मक और निषेधात्मक विशेषण -

१२। ३-४ वि.

भगवान् सबके भोक्ता और मालिक कैसे ? -

९। २४ वि.

भगवान्का अवतार - ३। २३, ३३; ४। ३, ६-११;

७। १९ मा., २४, २५; ८। १५; ९। ११;

१०। २; ११। १८, ३६, ४५, ४९ परि.; १३। १४;

१४। २७ टि.; १५। २०; १८। ५५

भगवान्का जगत्-रूपसे प्रथम अवतार - ४। ९ परि.;

७। १९; ११। ४९ परि.; १८। ४६ परि.

अवतार-सम्बन्धी विशेष बात - ४। ६

अभी भगवान् अवतार क्यों नहीं ले रहे ? - ४। ७

भगवान् दुष्टोंका विनाश क्यों करते हैं - ४। ८