श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
सम्बन्ध—पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘अथ’ पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था, अब आगेके श्लोकमें ‘इति’ पदसे उसकी समाप्ति करते हुए संजय इस संवादकी महिमा गाते हैं।
सज्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रीषमद्भुतं
रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजय बोले—
| इति | = इस प्रकार | च | = और | रोमहर्षणम् | = रोमांचित करनेवाला |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैंने | महात्मनः | = महात्मा | अद्भुतम् | = अद्भुत |
| वासुदेवस्य | = भगवान् | पार्थस्य | = पृथानन्दन | संवादम् | = संवाद |
| वासुदेव | अर्जुनका | अश्रीषम् | = सुना। | ||
| इमम् | = यह |
व्याख्या—‘इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः’— संजय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना, जो कि अत्यन्त अद्भुत, विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमांचित करनेवाली है।
यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें ‘अथ व्यवस्थितानुष्टुवा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः’ पदोंसे संजय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ ‘इति’ पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।
अर्जुनके लिये ‘महात्मनः’ विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं, जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं! अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता—पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता—पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। गीतामें अर्जुन जहाँ-जहाँ प्रश्न करते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने
सुना है।
‘संवादमिममश्रीषमद्भुतं रोमहर्षणम्’—इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है? शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारणा बैठी हुई है कि घर, कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधु-संन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति, अवस्था, घटना, देश, काल आदि क्यों न हो, उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं, वह परिस्थिति बढ़िया-से-बढ़िया हो या घटिया-से-घटिया, सौम्य-से-सौम्य हो या घोर-से-घोर विहित युद्ध-जैसी प्रवृत्ति हो, जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है, उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है, मुक्ति हो सकती है*। कारण कि जन्म-मरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें राग-द्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। यही इस संवादमें
- जब हर एक परिस्थितिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे ही कल्याण होता है, तब तो प्राकृत परिस्थितिका घटिया या बढ़िया होना कोई महत्त्व नहीं रखता। हाँ, उससे अलग होनेके उपाय (कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि) अलग-अलग हो सकते हैं। परन्तु इनमें राग मिटाना ही खास उपाय है; क्योंकि राग मिटनेसे द्वेष मिट जाता है और राग-द्वेषके मिटनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होना ही मुक्ति है। वास्तवमें जो बद्ध होता है, वह मुक्त नहीं होता और जो मुक्त होता है, वह मुक्त क्या होगा? क्योंकि वह तो मुक्त ही है। तो फिर मुक्त होना क्या है? वास्तवमें मुक्त होते हुए भी जिस बन्धनको स्वीकार किया है, उस बन्धनसे छूटनेका नाम ही मुक्त होना है।