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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

व्याख्या —‘श्रद्धावाननसूयश्च ..... पुण्य-कर्मणाम्’—गीताकी बातोंको जैसा सुन ले, उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसा-का-वैसा मानने-वालेका नाम ‘श्रद्धावान्’ है और उन बातोंमें कहीं भी, किसी भी विषयमें किंचिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम ‘अनसूयः’ है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो वह भी शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोको प्राप्त कर लेता है।

यहाँ दो बार ‘अपि’ पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है, अध्ययन करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है! पर जो सुन भी लेता है, वह मनुष्य भी शरीर छूटनेपर शुभ लोकोको प्राप्त हो जाता है।

मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम, प्रमाद, लिप्सा और करणापाटव—ये चार दोष होते हैं*। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता; क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये, विचारद्वारा कोई बात न जँचें, तो समझना चाहिये कि इस विषयकी समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ—इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूया-दोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूया-दोष नहीं रहता।

चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था, गदगद हो जाता था और राने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य

परिशिष्ट भाव —‘शुभौल्लोकान्प्राप्नुयात्युण्यकर्मणाम्’—श्रद्धा-भक्तिके तारतम्यसे गीताको सुननेमें तारतम्य रहता है और सुननेके तारतम्यसे श्रोताका स्वर्गादि लोकोसे लेकर भगवल्लोकतक अधिकार हो जाता है अर्थात् अधिक श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह भगवान्के धामको प्राप्त हो जायगा और कम श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह अन्य लोकोको प्राप्त हो जायगा। गीताके अध्ययन और श्रवणकी तो बात ही क्या है, गीताको रखनेमात्रका भी बड़ा माहात्म्य है! एक सिपाही था।

  • (१) वक्ता जिस विषयका प्रतिपादन करता है, उस विषयमें वह बिलकुल निःसन्देह न हो, इसे ‘भ्रम’ कहते हैं; (२) वक्ता विवेचनमें आलय्य, उपेक्षा, उदासीनता, तत्पराताकी कमी, लोग समझें या न समझें—इसकी बेपरवाह करता है, इसे ‘प्रमाद’ कहते हैं; (३) वक्ताकी रुपये-पैसे, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार, सुख-आराम आदि लौकिक-पारलौकिक कुछ भी पानेकी इच्छा है, इसे ‘लिप्सा’ कहते हैं और (४) वक्ता जिन इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, वाणी आदिसे अपने भाव प्रकट करता है, उन करणोंमें पटुता, कुशलता नहीं है और वह श्रोताकी भाषा, भाव, योग्यताको नहीं जानता, इसे ‘करणापाटव’ कहते हैं।

महाप्रभुसे शिकायत कर दी कि ‘देखिये प्रभु! वह बड़ा पाखण्ड करता है; पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है।’ चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा—‘तुम गीताका पाठ करते हो, तो क्या उसका अर्थ जानते हो!’ उसने कहा—‘नहीं प्रभु!’ फिर पूछा—‘तो फिर तुम रोते क्यों हो!’ उसने कहा—‘मैं जब ‘अर्जुन उवाच’ पढ़ता हूँ; तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं—‘ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं ‘श्रीभगवान्वाच’ पढ़ता हूँ, तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं—ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है—ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है; परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं, यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन कर-करके राजी होता हूँ।’ उसकी ऐसी श्रद्धा-भक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धा-भक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोको प्राप्त हो जाता है।

यहाँ ‘पुण्यकर्मणाम्’ पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ, अनुष्ठान आदि पुण्य-कर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है, प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बार-बार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता—नवै अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये, जिनको भगवान्का प्रेम, दर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपने-अपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक, कैलास आदि जिन दिव्य लोकोकी प्राप्ति होती है, असूया-दोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोकी प्राप्ति हो जाती है।