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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक ७१ ]

  • साधक-संजीवनी *

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दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता, केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुए गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठी-मीठी स्मृति बार-बार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है, ऐसा मैं मान लेता हूँ।

विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुत-से लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दस-पन्द्रह मिनटका एक बहुत बढ़िया व्याख्यान सिखाया। साथ ही दंगसे उठना, बैठना, खड़े होना, इधर-उधर ऐसा-ऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जोंकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायें-बायें देखने लगा और बोलनेकी जैसी-जैसी रिवाज है, वैसे-वैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था, उसको

परिशिष्ट भाव —भगवान् ज्ञानयज्ञको द्रव्यमय यज्ञसे भी श्रेष्ठ मानते हैं—‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप’ (गीता ४।३३)। जब गीताके अध्ययनका ही इतना माहात्म्य है तो फिर उसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या?

सम्बन्ध —जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके, वह क्या करे? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभौल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्म्मणाम् ॥ ७१ ॥

श्रद्धावान्= श्रद्धावान्नरः= मनुष्य (इस गीता-ग्रन्थको)मुक्तः= शरीर छूटनेपर
= औरशृणुयात्, अपि= सुन भी लेगा,पुण्यकर्म्मणाम्= पुण्यकारियोंके
अनसूयः= दोषपूर्वितसे रहितसः= वहशुभान्= शुभ
यः= जोअपि= भीलोकान्= लोकोंको
प्राप्नुयात्= प्राप्त हो जायगा।
  • गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै ॥

सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।

गोपाला गोपिका वापि नारदोद्भवपार्षदैः। सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥

यत्र गीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम्। तत्राहं निश्चितं पृथिवि निवसामि संदेव हि ॥