श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कर्म करनेकी आज्ञा देनेके बाद अब भगवान् कर्म करते हुए सम रहनेका प्रकार बताते हैं।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
| धनञ्जय | = हे धनंजय ! | असिद्धिमें | कर्माणि | = कर्मोंको |
|---|---|---|---|---|
| (तू) | समः | = सम | कुरु | |
| सङ्गम् | = आसक्तिका | भूत्वा | = होकर | समत्वम् |
| त्यक्त्वा | = त्याग करके | योगस्थः | = योगमें स्थित | योगः |
| सिद्ध्यसिद्धयोः | = सिद्धि- | हुआ | उच्यते |
व्याख्या—‘सङ्गं त्यक्त्वा’ —किसी भी कर्ममें, किसी भी कर्मके फलमें, किसी भी देश, काल, घटना, परिस्थिति, अन्तःकरण, बहिःकरण आदि प्राकृत वस्तुमें तेरी आसक्ति न हो, तभी तू निलिप्ततापूर्वक कर्म कर सकता है। अगर तू कर्म, फल आदि किसीमें भी चिपक जायगा, तो निलिप्तता कैसे रहेगी ? और निलिप्तता रहे बिना वह कर्म मुक्तिदायक कैसे होगा ?
‘सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा’ —आसक्तिके त्यागका परिणाम क्या होगा ? सिद्धि और असिद्धिमें समता हो जायगी।
कर्मका पूरा होना अथवा न होना, सांसारिक दृष्टिसे उसका फल अनुकूल होना अथवा प्रतिकूल होना, उस कर्मको करनेसे आदर-निरादर, प्रशंसा-निन्दा होना, अन्तःकरणकी शुद्धि होना अथवा न होना आदि-आदि जो सिद्धि और असिद्धि है, उसमें सम रहना चाहिये*।
कर्मयोगीकी इतनी समता अर्थात् निष्कामभाव होना चाहिये कि कर्मोंकी पूर्ति हो चाहे न हो, फलकी प्राप्ति हो चाहे न हो, अपनी मुक्ति हो चाहे न हो, मुझे तो केवल कर्तव्य-कर्म करना है। साधकको असंगताका अनुभव न हुआ हो, उसमें समता न आयी हो, तो भी उसका उद्देश्य असंग होनेका, सम होनेका ही हो। जो बात उद्देश्यमें आ
जाती है, वही अन्तमें सिद्ध हो जाती है। अतः साधनरूप समतासे अर्थात् अन्तःकरणकी समतासे साध्यरूप समता स्वतः आ जाती है—‘तदा योगमवाप्यसि ’ (२।५३)।
‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ —सिद्धि-असिद्धिमें सम होनेके बाद उस समतामें निरन्तर अटल स्थित रहना ही ‘योगस्थ’ होना है। जैसे किसी कार्यके आरम्भमें गणेशजीका पूजन करते हैं, तो उस पूजनको कार्य करते समय हरदम साथमें नहीं रखते, ऐसे ही कोई यह न समझ ले कि आरम्भमें एक बार सिद्धि-असिद्धिमें सम हो गये तो अब उस समताको हरदम साथमें नहीं रखना है, राग-द्वेष करते रहना है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि समतामें हरदम स्थित रहते हुए ही कर्तव्य-कर्मको करना चाहिये।
‘समत्वं योग उच्यते’ —समता ही योग है अर्थात् समता परमात्माका स्वरूप है। वह समता अन्तःकरणमें निरन्तर बनी रहनी चाहिये। आगे पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि ‘जिनका मन समतामें स्थित हो गया है, उन लोगोंने जीवित अवस्थामें ही संसारको जीत लिया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है; अतः उनकी स्थिति ब्रह्ममें ही है।’
‘समताका नाम योग है’ —यह योगकी परिभाषा है। इसीको आगे छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें कहेंगे कि
- इस विषयमें श्रीशंकराचार्यजी महाराज (गीता २।४८ की व्याख्या करते हुए) कहते हैं—
‘योगस्थः सन् कुरु कर्माणि केवलमीश्वरार्थं तत्रापीश्वरो मे तुष्यन्ति सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ! फलतृष्णाशून्येन क्रियमाणे कर्माणि सत्त्वशुद्धिज्ञा ज्ञानप्राप्तिलक्षणं सिद्धिस्तद्व विपर्ययज्ञा असिद्धिस्तयोः सिद्ध्यसिद्धयोरपि समस्तुत्यो भूत्वा कुरु कर्माणि। कोऽसौ योगो यत्रस्थः कुर्वित्युक्तमिदमेव तत् सिद्ध्यसिद्धयोः समत्वं योग उच्यते।’
‘हे धनंजय ! योगमें स्थित होकर केवल ईश्वरके लिये कर्म कर। उसमें भी ‘ईश्वर मेरेपर प्रसन्न हो जाय’—इस संग (कामना) को छोड़कर कर्म कर। फलतृष्णारहित पुरुषके द्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरणकी शुद्धिसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्तिका न होना) असिद्धि है। ऐसी सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर। वह कौन-सा योग है, जिसमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहा है ? यही जो सिद्धि और असिद्धिमें सम होना है, इसीको योग कहते हैं।’