श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
'दुःखोंके संयोगका जिसमें वियोग है, उसका नाम योग है।' ये दोनों परिभाषाएँ वास्तवमें एक ही हैं। जैसे दादकी बीमारिमें खुजलीका सुख होता है और जलनका दुःख होता है, पर ये दोनों ही बीमारी होनेसे दुःखरूप हैं, ऐसे ही संसारके सम्बन्धसे होनेवाला सुख और दुःख—दोनों ही वास्तवमें दुःखरूप हैं। ऐसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदका नाम ही 'दुःख-संयोग-वियोग' है। अतः चाहे दुःखोंके संयोगका वियोग अर्थात् सुख-दुःखसे रहित होना कहें; चाहे सिद्धि-असिद्धिमें अर्थात् सुख-दुःखमें सम होना कहें, एक ही बात है।
इस श्लोकका तात्पर्य यह हुआ कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाओंको केवल संसारकी सेवारूपसे करना है, अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे ही समता आयेगी।
बुद्धि और समता-सम्बन्धी विशेष बात
बुद्धि दो तरहकी होती है—अव्यवसायात्मिका और व्यवसायात्मिका। जिसमें सांसारिक सुख, भोग, आराम, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेका ध्येय होता है, वह बुद्धि 'अव्यवसायात्मिका' होती है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। जिसमें समताकी प्राप्ति करनेका, अपना कल्याण करनेका ही उद्देश्य रहता है, वह बुद्धि 'व्यवसायात्मिका' होती है (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)। अव्यवसायात्मिका बुद्धि अनन्त होती है और व्यवसायात्मिका बुद्धि एक होती है। जिसकी बुद्धि अव्यवसायात्मिका होती है, वह स्वयं अव्यवसायी (अव्यवसित) होता है—'बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्' (२।४१) तथा वह संसारी होता है। जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है, वह स्वयं व्यवसायी (व्यवसित) होता है—
परिशिष्ट भाव —पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तिनिरोध-रूप साधनको 'योग' कहा गया है—'योगश्चित्तवृत्ति-निरोधः' (१।२)। इस योगके परिणामस्वरूप द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१।३)। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीता 'योग' कहती है—'समत्वं योग उच्यते', 'तं विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्' (६।२३)। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वतःसिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको 'योग' कहती है। इस योग अर्थात् समतामें स्थित होनेपर फिर कभी इससे वियोग अर्थात् व्युत्थान नहीं होता, इसलिये इसको 'नित्ययोग' भी कहते हैं। चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 'निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर 'निर्विकल्प बोध' (सहजावस्था) होता है। निर्विकल्प बोध अवस्था नहीं है, प्रत्युत सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत तथा उनका प्रकाशक एवं सम्पूर्ण योग-साधनोंका फल है। अवस्था तो निर्विकल्प और सविकल्प दोनों होती है, पर बोध निर्विकल्प ही होता है। इस प्रकार गीताका योग पातंजलयोगदर्शनके योगसे बहुत विलक्षण है।
'व्यवसितो हि सः' (१।३०) तथा वह साधक होता है।
समता भी दो तरहकी होती है—साधनरूप समता और साध्यरूप समता। साधनरूप समता अन्तःकरणकी होती है और साध्यरूप समता परमात्मस्वरूपकी होती है। सिद्धि-असिद्धि, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदिमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें राग-द्वेषका न होना साधनरूप समता है, जिसका वर्णन गीतामें अधिक हुआ है। इस साधनरूप समतासे जिस स्वतःसिद्ध समताकी प्राप्ति होती है, वह साध्यरूप समता है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें 'तदा योगमवाप्यसि' पदोंसे हुआ है।
अब इन चारों भेदोंको यों समझें कि एक संसारी होता है और एक साधक होता है, एक साधन होता है और एक साध्य होता है। भोग भोगना और संग्रह करना—यही जिसका उद्देश्य होता है, वह संसारी होता है। उसकी एक व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत कामनारूपी शाखाओंवाली अनन्त बुद्धियाँ होती हैं।
मेरेको तो समताकी प्राप्ति ही करनी है, चाहे जो हो जाय—ऐसा निश्चय करनेवालेकी व्यवसायात्मिका बुद्धि होती है। ऐसा साधक जब व्यवहारक्षेत्रमें आता है, तब उसके सामने सिद्धि-असिद्धि, लाभ-हानि, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आदि आनेपर वह उनमें सम रहता है, राग-द्वेष नहीं करता। इस साधनरूप समतासे वह संसारसे ऊँचा उठ जाता है—'इहैव तैजितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः' (गीता ५।१९ का पूर्वार्ध)। साधनरूप समतासे स्वतःसिद्ध समरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है—'निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः' (गीता ५।१९ का उत्तरार्ध)।