श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
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पातंजलयोगदर्शनके योगका अधिकारी वह है, जो मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला नहीं है, प्रत्युत विशिप्त वृत्तिवाला है। परन्तु भगवान्की प्राप्ति चाहनेवाले सब-के-सब मनुष्य गीताके योगके अधिकारी हैं। इतना ही नहीं, जो मनुष्य भोग और संग्रहको महत्त्व न देकर इस योगको ही महत्त्व देता है और इसको प्राप्त करना चाहता है—ऐसा योगका जिज्ञासु भी वेदोंमें वर्णित सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है—‘जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते’ (गीता ६।४४)।
सम्बन्ध—उत्तालीसवेंसे अडतालीसवें श्लोकतक जिस समबुद्धिका वर्णन हुआ है, सकामकर्मकी अपेक्षा उस समबुद्धिकी श्रेष्ठता आगेके श्लोकमें बताते हैं।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्भनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
| बुद्धियोगात् | = बुद्धियोग (समता) | धनञ्जय | = हे धनंजय! (तू) | हि | = क्योंकि |
|---|---|---|---|---|---|
| की अपेक्षा | बुद्धौ | = बुद्धि (समता) | फलहेतवः | = फलके हेतु | |
| कर्म | = सकामकर्म | का | बननेवाले | ||
| दूरेण | = दूरसे (अत्यन्त) ही | शरणम् | = आश्रय | कृपणाः | = अत्यन्त |
| अवरम् | = निकृष्ट हैं। (अतः) | अन्विच्छ | = ले; | दीन हैं। |
व्याख्या—‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात्’— बुद्धियोग अर्थात् समताकी अपेक्षा सकामभावसे कर्म करना अत्यन्त ही निकृष्ट है। कारण कि कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं तथा उन कर्मोंके फलका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु योग (समता) नित्य है; उसका कभी वियोग नहीं होता, उसमें कोई विकृति नहीं आती। अतः समताकी अपेक्षा सकामकर्म अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।
सम्पूर्ण कर्मोंमें समता ही श्रेष्ठ है। समताके बिना तो मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं तथा उन कर्मोंके परिणाममें जन्मते-मरते और दुःख भोगते रहते हैं। कारण कि समताके बिना कर्मोंमें उद्धार करनेकी ताकत नहीं है। कर्मोंमें समता ही कुशलता है। अगर कर्मोंमें समता नहीं होगी तो शरीरमें अहंता-ममता हो जायगी और शरीरमें अहंता-ममता होना ही पशुबुद्धि है। भागवतमें शुक्देवजीने राजा परीक्षितसे कहा है—‘त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।’ (१२।५।२) अर्थात् हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा।
‘दूरेण’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे प्रकाश और
अन्धकार कभी समकक्ष नहीं हो सकते, ऐसे ही बुद्धियोग और सकामकर्म भी कभी समकक्ष नहीं हो सकते। इन दोनोंमें दिन-रातकी तरह महान् अन्तर है। कारण कि बुद्धियोग तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकामकर्म जन्म-मरण देनेवाला है।
‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’— तू बुद्धि (समता) की शरण ले। समतामें निरन्तर स्थित रहना ही उसकी शरण लेना है। समतामें स्थित रहनेसे ही तुझे स्वरूपमें अपनी स्थितिका अनुभव होगा।
‘कृपणाः फलहेतवः’— कर्मोंके फलका हेतु बनना अत्यन्त निकृष्ट है। कर्म, कर्मफल, कर्मसामग्री और शरीरादि करणोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना ही कर्मफलका हेतु बनना है। अतः भगवान्ने सैतालीसवें श्लोकमें ‘मा कर्मफलहेतुर्भूः’ कहकर कर्मोंके फलका हेतु बननेमें निषेध किया है।
कर्म और कर्मफलका विभाग अलग है तथा इन दोनोंसे रहित जो नित्य तत्त्व है, उसका विभाग अलग है। वह नित्य तत्त्व अनित्य कर्मफलके आश्रित हो जाय—इसके समान निकृष्टता और क्या होगी ?
परिशिष्ट भाव— योगकी अपेक्षा कर्म दूरसे ही निकृष्ट हैं अर्थात् कल्याणकारक नहीं हैं। जैसे पर्वतसे अणु बहुत दूर है अर्थात् अणुको पर्वतके पास रखकर दोनोंकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसे ही योगसे कर्म बहुत दूर है अर्थात् योग और कर्मकी तुलना नहीं की जा सकती। कर्मोंमें योग ही कुशलता है—‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (गीता २।५०),