श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
श्रीभगवान् बोले—
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | प्रजहाति | = भलीभाँति | तुष्टः | = सन्तुष्ट रहता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| यदा | = जिस कालमें | ||||
| (साधक) | त्याग कर | ||||
| देता है (और) | तदा | = उस कालमें | |||
| (वह) | |||||
| मनोगतान् | = मनमें आयी | आत्मना | = अपने-आपसे | स्थितप्रज्ञः | = स्थिरबुद्धि |
| सर्वान् | = सम्पूर्ण | आत्मनि | = अपने-आपमें | उच्यते | = कहा |
| जाता है। | |||||
| कामान् | = कामनाओंका | एव | = ही |
व्याख्या—[गीताकी यह एक शैली है कि जो साधक जिस साधन (कर्मयोग, भक्तियोग आदि) के द्वारा सिद्ध होता है, उसी साधनसे उसकी पूर्णताका वर्णन किया जाता है। जैसे, भक्तियोगमें साधक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं—ऐसे अनन्य-योगसे उपासना करता है (बारहवें अध्यायका छठा श्लोक); अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें द्वेष-भावसे रहित हो जाता है (बारहवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें साधक स्वयंको गुणोंसे सर्वथा असम्बद्ध एवं निलिप्त देखता है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण गुणोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। ऐसे ही कर्मयोगमें कामनाके त्यागकी बात मुख्य कही गयी है; अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है—यह बात इस श्लोकमें बताते हैं।]
‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’—इन पदोंका तात्पर्य यह हुआ कि कामना न तो स्वयंमें है और न मनमें ही है। कामना तो आने-जानेवाली है और स्वयं निरन्तर रहनेवाला है; अतः स्वयंमें कामना कैसे हो सकती है? मन एक कारण है और उसमें भी कामना निरन्तर नहीं रहती, प्रत्युत उसमें आती है—‘मनोगतान्’; अतः मनमें भी कामना कैसे हो सकती है? परन्तु शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिसे तादात्म्य होनेके कारण मनुष्य मनमें आनेवाली कामनाओंको अपनेमें मान लेता है।
‘जहाति’ क्रियाके साथ ‘प्र’ उपसर्ग देनेका तात्पर्य है कि साधक कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देता है, किसी भी कामनाका कोई भी अंश किंचिन्मात्र भी नहीं रहता। अपने स्वरूपका कभी त्याग नहीं होता और जिससे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, उसका भी त्याग नहीं होता। त्याग उसीका होता है, जो अपना नहीं है, पर उसको अपना मान लिया है। ऐसे ही कामना अपनेमें नहीं है, पर उसको अपनेमें मान लिया है। इस मान्यताका त्याग करनेको ही यहाँ ‘प्रजहाति’ पदसे कहा गया है।
यहाँ ‘कामान्’ शब्दमें बहुवचन होनेसे ‘सर्वान्’ पद उसीके अन्तर्गत आ जाता है, फिर भी ‘सर्वान्’ पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी कामना न रहे और किसी भी कामनाका कोई भी अंश बाकी न रहे।
‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’—जिस कालमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है अर्थात् अपने-आपमें सहज स्वाभाविक सन्तोष होता है।
सन्तोष दो तरहका होता है—एक सन्तोष गुण है और एक सन्तोष स्वरूप है। अन्तःकरणमें किसी प्रकारकी कोई भी इच्छा न हो—यह सन्तोष गुण है और स्वयंमें असन्तोषका अत्यन्ताभाव है—यह सन्तोष स्वरूप है। यह स्वरूपभूत सन्तोष स्वतः सर्वदा रहता है। इसके लिये कोई अभ्यास या विचार नहीं करना पड़ता। स्वरूपभूत सन्तोषमें प्रज्ञा (बुद्धि) स्वतः स्थिर रहती है।
‘स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते’—स्वयं जब बहुशाखाओंवाली अनन्त कामनाओंको अपनेमें मानता था, उस समय भी वास्तवमें कामनाएँ अपनेमें नहीं थीं और स्वयं स्थितप्रज्ञ ही था। परन्तु उस समय अपनेमें कामनाएँ माननेके कारण बुद्धि स्थिर न होनेसे वह स्थितप्रज्ञ नहीं कहा जाता था अर्थात् उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव नहीं होता था। अब उसने अपनेमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर दिया अर्थात् उनकी मान्यताको हटा दिया, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है अर्थात् उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव हो जाता है।
साधक तो बुद्धिको स्थिर बनाता है। परन्तु कामनाओंका सर्वथा त्याग होनेपर बुद्धिको स्थिर बनाना नहीं पड़ता, वह स्वतः-स्वाभाविक स्थिर हो जाती है।
कर्मयोगमें साधकका कर्मसे ज्यादा सम्बन्ध रहता है। उसके लिये योगमें आरूढ़ होनेमें भी कर्म कारण हैं—‘आरूढक्षोभुनैर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)। इसलिये कर्मयोगीका कर्मके साथ सम्बन्ध साधक-अवस्थामें भी रहता है और सिद्धावस्थामें भी। सिद्धावस्थामें