श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ५५ ]
- साधक-संजीवनी *
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कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार कर्म होते रहते हैं, जो दूसरोंके लिये आदर्श होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसी बातको भगवान्ने चौथे अध्यायमें कहा है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए निर्लिप्त रहता है और निर्लिप्त रहते हुए ही कर्म करता है—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ’ (४।१८)।
भगवान्ने तिरपनवें श्लोकमें योगकी प्राप्तिमें बुद्धिकी दो बातें कही थीं—संसारसे हटनेमें तो बुद्धि निश्चल हो और परमात्मामें लगनेमें बुद्धि अचल हो अर्थात् निश्चल कहकर संसारका त्याग बताया और अचल कहकर परमात्मामें स्थिति बतायी। उन्हीं दो बातोंको लेकर यहाँ ‘यदा ’ और ‘तदा ’ पदसे कहा गया है कि जब साधक कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाता है और अपने स्वरूपमें ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। तात्पर्य है कि जबतक कामनाका अंश रहता है, तबतक वह साधक कहलाता है और जब कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब वह सिद्ध कहलाता है। इन्हीं दो बातोंका वर्णन भगवान्ने इस अध्यायकी समाप्तिक्रिया है; जैसे—यहाँ ‘प्रजहति यदा कामान्सर्वान् ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और फिर ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। छप्पनवें श्लोकके पहले भागमें (तीन चरणोंमें)
परिशिष्ट भाव —एक विभाग अस्थिर बुद्धिवालोंका है और एक विभाग स्थिर बुद्धिवालोंका है। अस्थिर बुद्धिवालोंकी बात तो पहले इकतालिसर्वसे चौवालीसवें श्लोकतक कह दी, अब स्थिर बुद्धिवालोंकी बात पचपनवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक कहते हैं। जिस समय साधक सांसारिक रुचिका त्याग करके अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उस समय वह स्थिर बुद्धिवाला कहा जाता है।
जिसका परमात्माका उद्देश्य होता है, उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली होती है; क्योंकि परमात्मा भी एक ही है। परन्तु जिसका संसारका उद्देश्य होता है, उसकी बुद्धि असंख्य कामनाओंवाली होती है; क्योंकि सांसारिक वस्तुएँ असंख्य हैं (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसवाँ श्लोक)।
समताकी प्राप्तिके लिये बुद्धिकी स्थिरता बहुत आवश्यक है। पातंजलयोगदर्शनमें तो मनकी स्थिरता (वृत्तिनिरोध) को महत्त्व दिया गया है, पर गीता बुद्धिकी स्थिरता (उद्देश्यकी दृढ़ता) को ही महत्त्व देती है। कारण कि कल्याणप्राप्तिमें मनकी स्थिरताका उतना महत्त्व नहीं है, जितना बुद्धिकी स्थिरताका महत्त्व है। मनकी स्थिरतासे लौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, पर बुद्धिकी स्थिरतासे पारमार्थिक सिद्धि (कल्याणप्राप्ति) होती है। कर्मयोगमें बुद्धिकी स्थिरता ही मुख्य है। अगर मनकी स्थिरता होगी तो कर्मयोगी कर्तव्य-कर्म कैसे करेगा? कारण कि मन स्थिर होनेपर बाहरी क्रियाएँ रुक जाती हैं। भगवान् भी योग (समता) में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं—‘योगस्थः कुरु कर्माणि ’ (२।४८)।
‘प्रजहति ’ और ‘कामान्सर्वान् ’ पद देनेका तात्पर्य है कि किंचिन्मात्र भी कामना न रहे, पूरा-का-पूरा त्याग हो जाय। कारण कि यह कामना ही परमात्मप्राप्तिमें खास बाधक है।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है?’ इस दूसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं।
संसारका त्याग और ‘स्थितधीर्मुनिः ’ पदसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सत्तावनवें और अठ्ठावनवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उनसठवें श्लोकके पहले भागमें संसारका त्याग बताया और ‘परं दृष्ट्वा ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। साठवें श्लोकसे इकसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘युक्त आसीत मत्परः ’ आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बासठवेंसे पैसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। छाल्ठवेंसे अड़सठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उनहत्तरवें श्लोकमें ‘या निशा सर्वभूतानाम् ’ तथा ‘यस्यां जाग्रति भूतानि ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और ‘तस्यां जाग्रति संयमी ’ तथा ‘सा निशा पश्यतो मुनेः ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सत्तरवें और इकहत्तरवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘स शान्तिमधिगच्छति ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बहत्तरवें श्लोकमें ‘नैनौ प्राप्य विमुहति ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और ‘ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ’ आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी।