भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

१४६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २

अवसर तो बदलनेवाले हैं, पर मेरा स्वरूप न बदलनेवाला

है; अतः बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका सम्बन्ध

कैसे हो सकता है?

वास्तवमें देखा जाय तो फर्क न तो स्वरूपमें पड़ता

है और न शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें। कारण कि अपना

जो स्वरूप है, उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन

नहीं होता और प्रकृति तथा प्रकृतिके कार्य शरीरादि

स्वाभाविक ही बदलते रहते हैं। तो फर्क कहाँ पड़ता है?

शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण बुद्धिमें फर्क पड़ता है। जब

यह तादात्म्य मिट जाता है, तब बुद्धिमें जो फर्क पड़ता था,

वह मिट जाता है और बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

दूसरा भाव यह है कि किसीकी बुद्धि कितनी ही तेज

क्यों न हो और वह अपनी बुद्धिसे परमात्माके विषयमें

कितना ही विचार क्यों न करता हो, पर वह परमात्माको

अपनी बुद्धिके अन्तर्गत नहीं ला सकता। कारण कि बुद्धि

सीमित है और परमात्मा असीम-अनन्त हैं। परन्तु उस

असीम परमात्मामें जब बुद्धि लीन हो जाती है, तब उस

सीमित बुद्धिमें परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं

रहती-यही बुद्धिका परमात्मामें प्रतिष्ठित होना है।

कर्मयोगी क्रियाशील होता है। अतः भगवान्ने छप्पनवें

श्लोकमें क्रियाकी सिद्धि-असिद्धिमें अस्पृहा और उद्वेग-

रहित होनेकी बात कही तथा इस श्लोकमें प्रारब्धके

अनुसार अपने-आप अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त

होनेपर अभिनन्दन और द्वेषसे रहित होनेकी बात कहते हैं।

सम्बन्ध-अब भगवान् आगेके श्लोकसे 'स्थितप्रज्ञ कैसे बैठता है?' इस तीसरे प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥

इव, च = जिस तरह

कूर्मः = कछुआ

अङ्गानि = (अपने)

अंगोंको

सर्वशः = सब ओरसे

संहरते = समेट लेता है,

(ऐसे ही)

यदा = जिस कालमें

अयम् = यह (कर्मयोगी)

इन्द्रियार्थेभ्यः = इन्द्रियोंके

विषयोंसे

इन्द्रियाणि = इन्द्रियोंको (सब

प्रकारसे हटा

लेता है, तब)

तस्य = उसकी

प्रज्ञा = बुद्धि

प्रतिष्ठिता = स्थिर हो

जाती है।

व्याख्या-'यदा संहरते.....प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'-यहाँ

कछुएका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जैसे कछुआ चलता

है तो उसके छः अंग दीखते हैं-चार पैर, एक पूँछ और

एक मस्तक। परन्तु जब वह अपने अंगोंको छिपा लेता

है, तब केवल उसकी पीठ ही दिखायी देती है। ऐसे ही

स्थितप्रज्ञ पाँच इन्द्रियाँ और एक मन-इन छहोंको अपने-

अपने विषयसे हटा लेता है। अगर उसका इन्द्रियों आदिके

साथ किंचिन्मात्र भी मानसिक सम्बन्ध बना रहता है, तो

वह स्थितप्रज्ञ नहीं होता।

यहाँ 'संहरते' क्रिया देनेका मतलब यह हुआ कि वह

स्थितप्रज्ञ विषयोंसे इन्द्रियोंका उपसंहार कर लेता है अर्थात्

वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन नहीं करता।

इस श्लोकमें 'यदा' पद तो दिया है, पर 'तदा' पद

नहीं दिया है। यद्यपि 'यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः' के अनुसार

जहाँ 'यदा' आता है, वहाँ 'तदा' का अध्याहार लिया जाता

है अर्थात् 'यदा' पदके अन्तर्गत ही 'तदा' पद आ जाता

है, तथापि यहाँ 'तदा' पदका प्रयोग न करनेका एक गहरा

तात्पर्य है कि इन्द्रियोंके अपने-अपने विषयोंसे सर्वथा हट

जानेसे स्वतःसिद्ध तत्त्वका जो अनुभव होता है, वह कालके

अधीन, कालकी सीमामें नहीं है। कारण कि वह अनुभव

किसी क्रिया अथवा त्यागका फल नहीं है। वह अनुभव

उत्पन्न होनेवाली वस्तु नहीं है। अतः यहाँ कालवाचक 'तदा'

पद देनेकी जरूरत नहीं है। इसकी जरूरत तो वहाँ होती

है, जहाँ कोई वस्तु किसी वस्तुके अधीन होती है। जैसे

आकाशमें सूर्य रहनेपर भी आँखें बंद कर लेनेसे सूर्य नहीं

दीखता और आँखें खोलते ही सूर्य दीख जाता है, तो यहाँ

सूर्य और आँखोंमें कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है अर्थात्

आँखें खुलनेसे सूर्य पैदा नहीं हुआ है। सूर्य तो पहलेसे

ज्यों-का-त्यों ही है। आँखें बंद करनेसे पहले भी सूर्य वैसा

ही है और आँखें बंद करनेपर भी सूर्य वैसा ही है। केवल

आँखें बंद करनेसे हमें उसका अनुभव नहीं हुआ था। ऐसे

ही यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेसे स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका

जो अनुभव हुआ है, वह अनुभव मनसहित इन्द्रियोंका

विषय नहीं है। तात्पर्य है कि वह स्वतःसिद्ध तत्त्व